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राव जैताजी राठौड़
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फ़रवरी 2021
फ़रवरी 2021
राव जैताजी राठौड़ एक महान राजपूत योद्धा थें । उन्होंने आज से लगभग 500 साल पहले अदम्य साहस, वीरता, पराक्रम एवं बलिदान का वो अध्याय लिखा था, जो सदियो तक विश्व मानवता को स्वाभिमान, पराक्रम और बलिदान के लिए प्रेरित करता रहेगा ।
गिरी सुमेल के युद्ध में उन्होंने अपने शौर्य,साहस और बलिदान का परिचय दिया । सन् 1544 ई० में लड़ा जाने वाला यह युद्ध, दिल्ली के सुल्तान- शेर शाह सूरी और जोधपुर के शाशक राव मालदेव के तरफ से राव जैता और कुम्पा के बीच हुआ । इस युद्ध में राजपूतों की सेना सिर्फ 8,000 की रही, जबकि शेर शाह सूरी के पास 80,000 का एक विशाल फौज था । लेकिन फिर भी राजपूतों की छोटी से सेना ने शेर शाह सूरी के 36,000 सैनिको को मौत के घाट उतार दिया और अंत में राव जैता और राव कुम्पा वीर गति को प्राप्त हुए ।Medieval India: From Sultanat to the Mughals Part - II By Satish Chandra pg.80.
युद्ध के बाद शेरशाह के खुद के शब्द थे -
"बोल्यो सूरी बैन यूँ, गिरी घाट घमसाण,
मुठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण।"
अर्थात : "आज मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए पूरा हिंदुस्तान खो देता ।"Mahajan, V.D. (1991, reprint 2007). History of Medieval India, Part II, New Delhi: S. Chand, 81-219-0364-5, p.43
राजपुरोहितों का योगदान
इस युद्ध में राजपूतों के साथ राजपुरोहितों का भी योगदान रहा । प्रताप सिंह राजपुरोहित और और उदयसिंह राजपुरोहित जैसे कई और राजपुरोहित युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । उनको सिंह उपनाम इसी युद्ध के बाद मिला ।
सन्दर्भ
श्रेणी: राजपूत योद्धा