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411 REFERENCE · Wikipedia

शब्दानुशासन

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thumb|upright=1.25|सिद्धहेम शब्दानुशासन संस्कृत में आचार्य हेमचंद्र ने समस्त व्याकरण वांड्मयका अनुशीलन कर शब्दानुशासन एवं अन्य व्याकरण ग्रंथों की रचना की। पूर्ववर्ती आचार्यों के ग्रंथो का सम्यक अध्ययन कर सर्वाङ्ग परिपूर्ण उपयोगी एवं सरल व्याकरण की ‍रचना कर संस्कृत और प्राकृत दोनों ही भाषाओं को पूर्णतया अनुशासित किया है। हेमचंद्रने 'सिद्धहेम' नामक नूतन पंचांग व्याकरण तैयार किया जिसके पाँच अंग ये हैं- ( १ ) मूलपाठ, ( २ ) धातुपाठ, (३ ) गणपाठ, ( ४ ) उणादिप्रत्यय, एवं ( ५ ) लिङ्गानुशासन। इस व्याकरण ग्रन्थ का श्वेतछत्र सुशोभित दो चामर के साथ चल समारोह हाथी पर निकाला गया। ३०० लेखकों ने ३०० प्रतियाँ 'शब्दानुशासन' की लिखकर भिन्न-भिन्न धर्माध्यक्षों को भेंट देने के अतिरिक्त देश-विदेश, ईरान, सिंहल, नेपाल भेजी गयी। २० प्रतियाँ काश्मीर के सरस्वती भाण्डार में पहुंची। ज्ञानपंचमी (कार्तिक सुदि पंचमी) के दिन परीक्षा ली जाती थी। आचार्य हेमचंद्र संस्कृत के अन्तिम महावैयाकरण थे। अपभ्रंश साहित्य की प्राचीन समृद्वि के सम्बध में विद्वान उन पदों के स्रोत की खोज में लग गये। १८००० श्लोक प्रमाण बृहदवृत्ति पर भाष्य कतिचिद दुर्गापदख्या व्याख्या लिखी गयी। इस भाष्य की हस्तलिखित प्रति बर्लिन में है। इन्हें भी देखें हिन्दी शब्दानुशासन -- किशोरीलाल वाजपेयी द्वारा रचित हिन्दी का व्याकरण-ग्रन्थ बाहरी कड़ियाँ आचार्य हेमचन्द्र और उनका शब्दानुशासन सिद्धहेम व्याकरण में वाक्यविन्यास पद्धति का विश्लेषण श्रेणी:संस्कृत श्रेणी:व्याकरण