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ओंकारनाथ ठाकुर
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ओंकारनाथ ठाकुर Omkarnath Thakur 1997 stamp of India.jpg पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर पण्डित solo_singer yes 1897 06 24AIR Archives: Pt Omkarnath Thakur http://prasarbharati.gov.in/Archives/AIR+Archives/Pt+Omkarnath+Thakur.htm Prasar Bharati 5 अप्रैल 2021 7 जुलाई 2011 https://web.archive.org/web/20110707045240/http://prasarbharati.gov.in/Archives/AIR+Archives/Pt+Omkarnath+Thakur.htm dead जहाज, खम्भात (गुजरात) बड़ौदा राज्य, बॉम्बे प्रेसिडेन्सी yes 1967 12 29 1897 06 24 मुम्बई, महाराष्ट्र गायन हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत संगीत शिक्षक, संगीतविद् 1918–1960 के दशक तक विष्णु दिगंबर पलुस्कर
ओंकारनाथ ठाकुर (1897–1967) भारत के शिक्षाशास्त्री, संगीतज्ञ एवं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीतकार थे। उनका सम्बन्ध ग्वालियर घराने से था।
उन्होने वाराणसी में महामना पं॰ मदनमोहन मालवीय के आग्रह पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में संगीत के आचार्य पद की गरिमा में वृद्धि की। वे तत्कालीन संगीत परिदृष्य के सबसे आकर्षक व्यक्तित्व थे। पचास और साठ के दशक में पण्डितजी की महफ़िलों का जलवा पूरे देश के मंचों पर छाया रहा। पं॰ ओंकारनाथ ठाकुर की गायकी में रंजकता का समावेश तो था ही, वे शास्त्र के अलावा भी अपनी गायकी में ऐसे रंग उड़ेलते थे कि एक सामान्य श्रोता भी उनकी कलाकारी का मुरीद हो जाता। उनका गाया वंदेमातरम या 'मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो' सुनने पर एक रूहानी अनुभूति होती है।
परिचय
श्री ओंकारनाथ ठाकुर का जन्म गुजरात के बड़ोदा राज्य में एक गरीब परिवार में हुआ था।
उनके दादा महाशंकर जी और पिता गौरीशंकर जी नाना साहब पेशवा की सेना के वीर योद्धा थे। एक बार उनके पिता का सम्पर्क अलोनीबाबा के नाम से विख्यात एक योगी से हुआ। इन महात्मा से दीक्षा लेने के बाद से गौरीशंकर के परिवार की दिशा ही बदल गई। वे प्रणव-साधना अर्थात ओंकार के ध्यान में रहने लगे। तभी २४ जून १८९७ को उनकी चौथी सन्तान ने जन्म लिया। ओंकार-भक्त पिता ने पुत्र का नाम ओंकारनाथ रखा। जन्म के कुछ ही समय बाद यह परिवार बड़ौदा राज्य के जहाज ग्राम से नर्मदा तट पर भड़ौच नामक स्थान पर आकर बस गया।
ओंकारनाथ जी का लालन-पालन और प्राथमिक शिक्षा यहीं सम्पन्न हुई। इनका बचपन अभावों में बीता। यहाँ तक कि किशोरावस्था में ओंकारनाथ जी को अपने पिता और परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण के लिए एक मिल में नौकरी करनी पड़ी। ओंकारनाथ की आयु जब १४ वर्ष थी, तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ तब आया, जब भड़ौच के एक संगीत-प्रेमी सेठ ने किशोर ओंकार की प्रतिभा को पहचाना और उनके बड़े भाई को बुला कर संगीत-शिक्षा के लिए बम्बई के विष्णु दिगम्बर संगीत महाविद्यालय भेजने को कहा। पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के मार्गदर्शन में उनकी संगीत-शिक्षा आरम्भ हुई।
विष्णु दिगम्बर संगीत महाविद्यालय, मुम्बई में प्रवेश लेने के बाद ओंकारनाथ जी ने वहाँ के पाँच वर्ष के पाठ्यक्रम को तीन वर्ष में ही पूरा कर लिया और इसके बाद गुरु जी के चरणों में बैठ कर गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की गहन शिक्षा अर्जित की। २० वर्ष की आयु में ही वे इतने पारंगत हो गए कि उन्हें लाहौर के गान्धर्व संगीत विद्यालय का प्रधानाचार्य नियुक्त कर दिया गया। १९३४ में उन्होने मुम्बई में 'संगीत निकेतन’ की स्थापना की। १९४० में महामना मदनमोहन मालवीय उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के प्रमुख के रूप में बुलाना चाहते थे किन्तु अर्थाभाव के कारण न बुला सके। बाद में विश्वविद्यालय के एक दीक्षान्त समारोह में शामिल होने जब पण्डित जी आए तो उन्हें वहाँ का वातावरण इतना अच्छा लगा कि वे काशी में ही बस गए। १९५० में उन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गन्धर्व महाविद्यालय के प्रधानाचार्य का पद-भार ग्रहण किया और १९५७ में सेवानिवृत्त होने तक वहीं रहे।
पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का जितना प्रभावशाली व्यक्तित्व था उतना ही असरदार उनका संगीत भी था। एक बार महात्मा गाँधी ने उनका गायन सुन कर टिप्पणी की थी- “पण्डित जी अपनी मात्र एक रचना से जन-समूह को इतना प्रभावित कर सकते हैं, जितना मैं अपने अनेक भाषणों से भी नहीं कर सकता।” उन्होने एक बार सर जगदीशचन्द्र बसु की प्रयोगशाला में पेड़-पौधों पर संगीत के स्वरों के प्रभाव विषय पर अभिनव और सफल प्रयोग किया था। इसके अलावा १९३३ जब वे इटली की यात्रा पर थे, उन्हें ज्ञात हुआ की वहाँ के शासक मुसोलिनी को पिछले छः मास से नींद नहीं आई है। पण्डित जी मुसोलिनी से मिले और उनके गायन से उसे तत्काल नींद आ गई। उनके संगीत में ऐसा जादू था कि आम से लेकर खास व्यक्ति भी सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता था।
बाहरी कड़ियाँ
अब कहाँ सुनने को मिलता है भरा-पूरा मालकौंस? (सुर-पेटी, हिन्दी चिट्ठा)
संगीत की एक महान विरासत छोड़ गए पं॰ ओंकारनाथ ठाकुर (हिन्दी मिडिया)
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संगीताञ्जलि (ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा रचित संगीत-शिक्षा ग्रन्थ ; पंचम भाग)
सन्दर्भ
श्रेणी:संगीत नाटक अकादमी पुरस्कृत
श्रेणी:हिन्दुस्तानी संगीतकार
श्रेणी:1897 में जन्मे लोग
श्रेणी:१९६७ में निधन