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फ़ारसी निगारगरी
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thumb|right|२२०px|शहंशाह बाबर (१४८३–१५३०) की किताब-ख़्वानी करते हुए एक आदर्श-नुमा शबीह, जो हिन्दुस्तान में तक़रीबन १६०५–१६१५ के दरमियान नक़्क़ाशी की गई (अजायबघर-ए-बरितानिया १९२१,१०११,०.३)। इसमें मुग़ल निगारगरी की शान-ओ-शौकत और दरबारी नाज़ुकी झलकती है।
thumb|right|220px|अकबर की राजसभा में बदायूँनी द्वारा रचित रज़्मनामा से उद्धृत यह चित्र महाभारत के अन्तिम युद्धदृश्य में कृष्ण को शंखनाद करते हुए दर्शाता है, जब पंच पाण्डव उनके पार्श्व में स्थित हैं और कौरव भूमि पर पतित हैं। इसमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का सान्निध्य तथा मुग़ल-राजपूत शैली में कृष्ण का वीरोचित राजसी चित्र प्रतिफलित होता है।
फ़ारसी लघुचित्र अथवा फ़ारसी निगारगरी (फ़ारसी: نگارگری ایرانی, निगारगरी-ए-ईरानी) काग़ज़ पर एक छोटी फ़ारसी नक़्क़ाशी है, चाहे वह किताब की तस्वीर हो या एक अलग कलाकृति जो ऐसी कृतियों के एक अल्बम में रखी जाए जिसे मुरक़्क़ा कहा जाता है। इसकी तकनीकें मोटे तौर पर पश्चिमी अह्द-ए-वुस्ता और बीज़ंती परंपराओं की मुज़य्यन पाण्डुलिपियों में मिनियातूर की तकनीकों से तुलनीय हैं।
हालाँकि दीवार-नक़्क़ाशी की एक समान रूप से सुदृढ़ फ़ारसी परंपरा भी मौजूद है, मगर मिनियातूरों की बचाव दर और संरक्षण की हालत बेहतर है, और मिनियातूर पश्चिम में फ़ारसी नक़्क़ाशी का सबसे प्रसिद्ध रूप हैं, और इसकी अनेक सबसे अहम मिसालें पश्चिमी या तुर्की के अजायबघरों में महफ़ूज़ हैं। मिनियातूर नक़्क़ाशी फ़ारसी फ़न में १३वीं सदी में एक अहम सनफ़ बनी, जिसने मंगोल फ़तहों के बाद चीनी असर क़बूल किया, और इस परंपरा की सबसे बुलंद मंज़िल १५वीं और १६वीं सदियों में हासिल हुई। इसके बाद यह परंपरा कुछ पश्चिमी असर के तहत जारी रही, और इसके बहुत से जदीद नुमाइंदे भी हैं। फ़ारसी निगारगरी दूसरी इस्लामी निगारगरी परंपराओं पर सबसे ग़ालिब असर था, ख़ास तौर पर तुर्की में उस्मानी निगारगरी, और बर्रे-सग़ीर हिंद में मुग़ल निगारगरी पर।
इस्लाम के तहत फ़ारसी फ़न ने इन्सानी शक्ल को कभी पूरी तरह ममनूअ नहीं किया था, और निगारगरी की परंपरा में शक्लों की तस्वीरकशी, अक्सर बड़ी तादाद में, मर्कज़ी है। यह कुछ हद तक इसलिए था कि मिनियातूर एक निजी चीज़ है, जो एक किताब या अल्बम में रखी जाती है और सिर्फ़ उन्हीं को दिखाई जाती है जिन्हें मालिक चुनता है। इसलिए दीवार-नक़्क़ाशी या दूसरी कृतियों की तुलना में, जो एक बड़े तमाशाई-गिरोह को दिखाई जाती हैं, ज़्यादा आज़ादी मुमकिन थी। क़ुरआन और दूसरी सिर्फ़ मज़हबी किताबों की इस तरह तस्वीरकशी मालूम नहीं है, यद्यपि तवारीख़ और दूसरी अदबी कृतियों में मज़हब से मुतअल्लिक़ मंज़र शामिल हो सकते हैं, जिनमें पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद की तस्वीरें भी शामिल हैं, जो १५०० के पश्चात् सामान्यतः उनका चेहरा दिखाए बग़ैर होती थीं।Gruber, throughout; see Welch, 95-97 for one of the most famous examples, illustrated below
मिनियातूरों में जिस्मानी मंज़रों के इलावा, जिन पर यह मज़मून मर्कूज़ है, ग़ैर-जिस्मानी आराइशी नक़्क़ाशी का एक मुतवाज़ी सब्क भी था जो मिनियातूर के सफ़्हों के हाशियों और पैनलों में, और किसी कृति या बख़्श के आग़ाज़ या आख़िर में ख़ाली जगहों में, और अक्सर पूरे सफ़्हों में बतौर सरवरक़ पाया जाता था। इस्लामी फ़न में इसे "तज़्हीब" कहा जाता है, और क़ुरआन और दूसरी मज़हबी किताबों की पाण्डुलिपियों में अक्सर काफ़ी तादाद में मुज़य्यन सफ़्हे शामिल होते थे।In the terminology of Western illuminated manuscripts, "illumination" usually covers both narrative scenes and decorative elements. यह शैलियाँ दूसरे ज़राए में हम-अस्र काम की आकासी करती थीं, बाद के दौरों में ख़ास तौर पर किताबों के ग़िलाफ़ों और फ़ारसी क़ालीनों के क़रीब, और यह ख़याल किया जाता है कि बहुत से क़ालीन के तरहें दरबारी हुनरमंदों ने बनाए और सूबों की कारगाहों को भेजे गए।Canby (2009), 83
बाद के दौरों में मिनियातूर बढ़ती हुई तादाद में मुरक़्क़ा नामी अल्बमों में शामिल करने के लिए अकेली कृतियों के तौर पर बनाए जाने लगे, बजाय मुज़य्यन किताबों के। इससे ग़ैर-शाही जमाअ-कुनिंदों को मुख़्तलिफ़ सब्कों और दौरों की कृतियों का एक नुमाइंदा नमूना ख़रीदने की ताक़त हुई।
सन्दर्भ
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श्रेणी:फ़ारसी कला
श्रेणी:फ़ारसी इतिहास
श्रेणी:फ़ारसी
श्रेणी:ईरान
श्रेणी:कला
श्रेणी:कला का इतिहास
श्रेणी:कला इतिहास