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एडवर्ड गिबन
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thumb|right|एडवार्ड गिबन
एडवर्ड गिबन (१७३७-१७९४) इंग्लैंड के इतिहासकार तथा पार्लमेन्ट सदस्य थे। उनकी 'हिस्ट्री ऑफ द डिक्लाइन ऐण्ड फाल ऑफ रोमन इम्पायर' नामक कृति १७७६ से १७८८ के बीच छः खण्डों में प्रकाशित हुई।
परिचय
एडवर्ड गिबन का जन्म पुटने नगर (Putney) के एक पुराने शिक्षित घराने में हुआ। पिता पार्लमेंट के मेंबर थे। पितामह के समृद्धपुस्तकालय का गिबन ने सदुपयोग किया। उच्च शिक्षा के अर्थ आक्सफार्ड विश्वविद्यालय के मग्डालेन कालिज में यह भर्ती किए गए, किंतु वहाँ से इनको चौदह महीने बाद ही हटा लेना पड़ा। गिबन ने अपनी जीवनी में लिखा है, ये चौदह मास मेरे जीवन का सबसे अनुपयोगी काल सिद्ध हुआ। यूनिवर्सिटी का स्वच्छंद जीवन किशोर गिबन के लिये अहितकर हुआ। अपने पैतृक धर्म प्रोटेस्टेंट धर्म से इनका मन विचलित हो गया। कुछ दिन तो यह इस दुविधा में पड़े रहे कि मुहम्मद के अनुयानी बने अथाव पोप के। किंतु अंत में उन्होंने काल्वीनी पादरी के प्रभाव से प्रोटेंस्टेंट धर्म ग्रहण कर लिया। इन्हीं पादरी महोदय के संरक्षण में गिबन ने फ्रांसीसी, ग्रीक और रोमन साहित्य, दर्शन, न्याय, गणित आदि का अत्यंत साधना के साथ अध्ययन और अनुशीलन किया। फ्रांस के सुप्रसिद्ध साहित्यकार बोल्तेयर से गिबन का इसी काल में परिचय हुआ, जिससे उन्हें विचार विन्यास में बड़ी प्रेरणा मिली। इसी बीच एक फ्रांसीसी कुलीन कन्या के प्रति आकर्षित होकर गिबन ने उससे विवाह करना चाहा, किंतु अपने पिता के विरोध के कारण उन्होंने अपना संकल्प त्याग दिया। इस घटना के संबंध में गिबन ने अपनी अत्मकथा में ये मार्मिक शब्द प्रयुक्त किए हैं कि उसने पुत्र की तरह पिता की आज्ञा का पालन किया और प्रेमी की तरह वियोग की आह भरी। निदान, शिक्षा समाप्ति करके १७५८ में गिबन इंग्लैंड लौट आए।
१७६१ में गिबन ने अपनी पहली रचना 'ऐसे आन द स्टडी ऑव लिटरेचर' फ्रेंच में प्रकाशित की जिससे विद्वत्समाज में उनका मान होने लगा। तदनंतर गिबन ने यूरोप की यात्रा की। इसी यात्रा के दौर में रोम के भग्नावशेषों को देखकर गिबन को अपना सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'डिक्लाइन ऐंड फाल ऑव द रोमन एंपायर' लिखने की प्रेरणा हुई। इस ग्रंथ के पूरा करने में गिबन को १५ (१७७२-१७८७) साल लगे। इस बृहद्ग्रंथ में यूरोप और उसके समीपवर्ती प्रदेशों और जातियों की चौदह शताब्दियों के इतिहास का, जिसमें विश्वइतिहास के कई अत्यंत मार्के के युग भी शामिल हैं, ललित और सुव्यवस्थित वर्णन तथा विवेचन है। रोम की राज्यव्यवस्था, ईसाइयत का प्रादुर्भाव, प्रसार और विजय, विजोतीनी साम्राज्य की स्थापना, इस्लामियत की विजय, माध्यमिक युग के धार्मिक और राजनीतिक वितंडावाद, पश्चिमी यूरोप के राष्ट्रीय राज्यों का उदय, तथा ईसाई महाराष्ट्र और मुहम्मदी तुर्कों का कालक्रमागत द्वंद्वयुद्ध, इत्यादि इतिहास की अनेकानेक सारगर्भित घटनाओं का रोचक भाषा में विशद विवरण और विवेचन उपलब्ध है। गिबन की उदार कल्पना, विशिष्ट बुद्धि, प्रचुर खोज, सतत परिश्रम और मनोहर शब्दविन्यास का इस महती पुस्तक में सर्वत्र परिचय मिलता है। इस ग्रंथ को प्रकाशित हुए दो शताब्दियाँ बीत गईं, इस बीच पुरातत्ववेत्ताओं के अन्वेषणों ने इतिहासशास्त्र को बहुत उन्नत और संपन्न बना दिया, किंतु फिर भी यह अनुपम पुस्तक पुरानी नही पड़ी। प्रो॰ फ्रीमैन का मत है कि इतिहास में चाहे और कुछ पढ़ा जाए या न पढ़ा जाए, गिबन अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। इसी प्रकार फ्रेंडरिक हैरिसन का मत है कि जैसे अफलातून की अकादमी के द्वार पर यह उल्लेख था कि जिसने रेखागणित को सिद्ध नहीं कर लिया वह यहाँ प्रवेश न करे, उसी प्रकार इतिहास की आदर्श पाठशाला को अपने सिंहद्वार पर यह सूक्ति खुदवा लेनी चाहिए कि गिबन को सिद्ध किए बिना यहाँ प्रवेश वर्जित है। सारांश यह कि गिबन की यह पुस्तक इतिहास के संपूर्ण साहित्य में अद्वितीय नहीं तो चोटी के गिने चुने ग्रंथों में से है।
अंतिम दिनों में गिबन ने अपनी जीवनी की रचना की जो साहित्यिक कला की दृष्टि से उपर्युक्त ऐतिहासिक ग्रंथ से भी अनेक आलाचकों को महत्तर लगती है। गिबन के ग्रंथों की भाषा बड़ी मँजी हुई है। वाक्य और वाक्यांश लंबे और दीर्घगामी होते हुए भी आदि से अंत तक ऐसे गुंथे हुए और सूत्रबद्ध हैं और उनमें शब्द और स्वर का ऐसा मधुर योग है कि पाठक को वाद्य का स्वाद मिलता है।
गिबन लगभग आठ बरस (१७७४-१७८२) पार्लमेंट के भी मेंबर रहे थे किंतु उनका कर्तृत्व वहां केवल साधारण रहा।
गिबन के जीवन के अंतिम दिन रूग्णावस्था और चिंता में बीते। १७९४ की जनवरी में लंदन में उनका देहांत हो गया।
एडवर्ड गिबन अपने युग के प्रतीक थे। वह सरासर बौद्धिक और विवेकवादी थे। उनका स्वभाव सुशील, शीतल और शांतिप्रिय था। मित्रों के प्रति बड़े सहृदय थे। संगी साथियों से उनका वार्तालाप बड़ा मनोरंजक और ज्ञानवर्धक होता था। किंतु उनके व्यवहार में अभिमान, शिष्टाचार और भद्रभाव का इतना समावेश था कि उनके साथियों को वह बनावटी प्रतीत होता था। गिबन के विष्य में एक परिहास प्रसिद्ध है कि गिबन होते हुए भी वे अपने आपको रोमन साम्राज्य समझने लगे थे।
सन्दर्भ ग्रन्थ
डिक्लाइन ऐंड फाल ऑव द रोमन एंपायर;
एल. शेफील्ड : आटोबायग्राफी;
जे. स्काटर मोरसनो: लाइफ ऑव गिबन;
फ्रेडरिक हेरिसन : द मीनिंग ऑव हिस्ट्री;
समग्रेट बुक्स ऑव हिस्ट्री;
एडवर्ड गिबन ऐंड अदर एट्टींथ सेंचुअरी प्रोज़ राइटर्स।
श्रेणी:इतिहासकार