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411 समाचार
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स्लग

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जुलाई 2025 मोलस्का प्राणी उदरपाद स्लग घोंघे की प्रजाति का एक अकशेरूकी जीव है। स्लग जीवों के दूसरे सबसे बड़े समुदाय मोलस्क संघ में शामिल उदरपाद वर्ग का प्राणी है। इसे हिंदी में 'मंथर' कहते हैं। इसका एक अन्य नाम शम्बुकhttps://www.eklavya.in/magazine-activity/sandarbh-magazines/206-sandarbh-from-issue-81-to-90/200-sandarbh-issue-85/590-samudri-slag-ki-anokhi-maithun-prikriya?highlight=WyJcdTA5MzhcdTA5NGRcdTA5MzJcdTA5MTciXQ== समुद्री स्लग की अनोखी मैथुन प्रक्रिया www.eklavya.in 2025-07-28 भी है। अक्सर लोग भ्रमवश इसे जोंक भी समझ लेते हैं। स्लग प्रायः वर्षाऋतु के मौसम में दिखाई पड़ता है। बारिश के नम मौसम में इसे बाग-बगीचों, घर के आसपास, खेतों-मेड़ों, पौधों की पत्तियों और गीली जमीन पर रेंगते हुए देखा जा सकता है। इस जीव द्वारा जमीन पर रेंगते हुए अपने शरीर से एक तरल सा चिपचिपा द्रव पदार्थ छोड़ते जाना भी लोगों के लिए अत्यंत कौतूहल का बिषय है। स्लग की कुछ प्रजातियाँ आलू के छिलके की तरह दिखाई देतीं हैं। अंगूठाकार|वर्षा ऋतु में नम भूमि पर स्लग शारीरिक संरचना, आवास एवं व्यवहार सामान्य तौर पर दिखाई देने वाले कठोर कवचयुक्त घोंघे के विपरीत स्लग (मंथर) एक ऐसा घोंघा है जिसके शरीर पर कोई कठोर खोल अथवा कवच जैसी संरचना नहीं पायी जाती अर्थात् ये बिना कवच वाला घोंघा है। इसीलिए इसे 'कवच विहीन स्थलीय घोंघा' भी कहते हैं। इसे भूमि स्लग, गार्डेन स्लग आदि नामों से भी जाना जाता है। मराठी भाषा में इसे 'गोगलगाय' कहते हैं। दुनियाभर में स्लग की हजारों प्रजातियाँ पायी जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में स्लग और भूमि घोघों की 1400 से भी ज्यादा प्रजातियाँ पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत, हिमालयी क्षेत्रों जैसे विभिन्न भौगोलिक पर्यावासों में फैली हुई हैं। स्लग का शरीर बेहद नरम एवं मुलायम होने के साथ ही बहुत नम भी होता है। स्लग कड़ी धूप और तापमान के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं जिस कारण इन्हें अपने नरम ऊतकों के सूखने का खतरा बना रहता है अतः अपने शरीर में नमी बनाये रखने हेतु ये ज्यादा गर्म व शुष्क मौसम से बचने का प्रयास करते हैं। शरीर की नमी सूखने ना पाये इसलिए ये पेड़ों की छाल, पत्तियों के ढेर और जमीन पर गिरी लकड़ी जैसी जगहों पर छिप जाते हैं। यही कारण है कि स्लग वर्षा ऋतु के मौसम में ही बाग-बगीचों, नर्सरी और खेतों की नम भूमि तथा पौधों पर दिखाई देते हैं। स्लग के सिर के अग्रभाग पर एंटीने जैसी संरचना वाली दो जोड़ी स्पर्शिकाएँ पायी जाती हैं। ये स्पर्शिकाएँ स्लग को गंध एवं प्रकाश का अनुमान लगाने में मदद करती हैं। ये प्रायः काले, भूरे, हरे, पीले और स्लेटी आदि कई रंगों में देखने को मिलते हैं। स्लग का प्रजनन काल मुख्यतः बारिश के मौसम में शुरू होता है। इसकी प्रजनन गतिविधियाँ भरपूर नमी और उच्च आर्द्रता वाले मौसम पर निर्भर करती हैं। यही कारण है कि मानसून के दौरान उच्च आर्द्रता वाले मौसम में प्रजनन के उपरांत इनकी संख्या में बेतहाशा बढ़ोत्तरी देखी जाती है। स्लग एक बार में औसतन 30 से लेकर 40 तक की संख्या में अंडे देते हैं। स्लग की कुछ प्रजातियाँ एक बार में 80 से भी ज्यादा अण्डे दे सकती हैं। जमीन पर चलते हुए ये अपने शरीर से एक बेहद चिपचिपा सा तरल पदार्थ छोड़ता जाता है जिस कारण से देखने में ये बेहद घिनौना प्रतीत होता है। दरअसल इसके द्वारा छोड़े जाने वाले चिपचिपे द्रव से इसे जमीन की उबड़-खाबड़ सतहों पर चलने में मदद मिलती है। इसी चिपचिपे पदार्थ की मदद से ये पौधों की टहनियों और पत्तियों पर भी बड़ी आसानी चलता जाता है। शिकारियों से सुरक्षा करने में भी ये चिपचिपा पदार्थ इसकी सहायता करता है। स्लग का आहार वनस्पतियाँ, पौधे और कवक हैं। स्लग पौधों की पत्तियों, बीजांकुर, मशरूम, कवक, सब्जियाँ, फल आदि खाते हैं। खतरा महसूस होने पर स्लग अपने बेहद लचीले शरीर को सिकोड़कर गोल, स्थिर और संकुचित कर लेता है। इसे हाथों या किसी छड़ी के सहारे छूने की कोशिश करने पर ये अपने शरीर को एकदम संकुचित कर लेता है। काले और भूरे रंगों वाले स्लग स्थिर एवं संकुचित अवस्था में आलू के छिलके की तरह दिखाई देते हैं इसीलिए कभी-कभी इसके शिकारी और इंसान भी गच्चा खा जाते हैं। स्लग का पारिस्थितिकीय महत्व स्लग पारिस्थितिकी तंत्र में भी अहम भूमिका निभाते हैं। वातावरण के प्रति बेहद संवेदनशील होने के कारण स्लग बदलते मौसम एवं जलवायु के प्राकृतिक संकेतक हैं। स्लग प्राकृतिक खाद्य-श्रृंखला के भी महत्वपूर्ण घटक हैं। कई प्रजाति के पक्षियों, सांपो, छिपकलियों, छोटे स्तनपायी जीवों एवं कुछ अकशेरूकी जंतुओं के लिए भी स्लग मुख्य आहार हैं। स्लग वातावरण से सड़ी-गली वनस्पतियों, कवकों तथा मृत कीड़ों के अवशेषों का भी सफाया करते हैं और पर्यावरण में पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं। इस तरह से स्लग कई जंगली प्रजाति के जीवों को मैग्नीशियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व उपलब्ध करवाते हैं। कृषि हेतु आक्रामक स्लग स्लग घोंघे की पर्यावरण में महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन इसकी कई प्रजातियाँ आज कृषि एवं बागवानी के लिए बेहद हानिकारक कीट के रूप में गिनी जाती हैं। पिछले कुछ दशकों से स्लग दुनियाभर के सैकड़ों देशों में आक्रामक प्रजाति के तौर पर व्यापक रूप से फैल गये हैं जो कि अंकुरित पौधों, पत्तियों, फलों-फूलों और सब्जियों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और आयात-निर्यात जैसी आर्थिक गतिविधियों के चलते स्लग की कई प्रजातियाँ अपने मूल स्थान से दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों में पहुंचकर वहाँ की स्थानीय जैवविविधता के लिये खतरा पैदा कर रहीं हैं। जाहिर है जब वनस्पति या जीव-जंतु की कोई भी प्रजाति अपने मूल स्थान से अलग क्षेत्रों में पहुंच जाये तो वो या तो उस वातावरण में सर्वाइव नहीं कर पाती और यदि किसी तरह उस अलग तरह के वातावरण के मुताबिक ढल जाती है तो वहाँ की स्थानीय प्रजातियों से प्रतिस्पर्द्धा करने लगती है जिस कारण पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन पैदा होना स्वाभाविक है। स्लग की भी कई प्रजातियाँ कृषि एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक साबित हो रहीं हैं। विदेश से लाये गये सजावटी फूलों के गमलों के जरिए भी स्लग भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैलते हैं। स्लग पौधें की पत्तियों को तेजी से चट कर जाते हैं। ये मुख्यतः रात्रि में सक्रिय होतें हैं। ये पत्तियों के बीच वाले भाग में छेंद कर देते हैं और किनारे वाले हिस्से को कुतर देते हैं जिससे पौधे सूख जाते हैं। आक्रामक स्लग की वजह से देशी वनस्पतियाँ संकट में आ जाती हैं। अंगूठाकार|पाठ=लेदरलीफ स्लग (Laevicaulis alte) आक्रामक प्रजाति|लेदरलीफ स्लग (Laevicaulis alte) आक्रामक प्रजाति भारत में विदेशी आक्रामक स्लग प्रजातियाँ हमारे भारत देश में स्लग की तकरीबन 15 प्रजातियाँ गंभीर कृषि कीट के रूप में पहचानी गयीं हैं जिनमें से कॉमन गार्डन स्लग (लेविकौलिस अल्टे) और ब्राउन गार्डन स्लग (फीलिकौलिस अल्टे) लगभग पूरे भारतीय भू-भाग में फैली हैं। पश्चिम बंगाल में मार्श स्लग (डी. लावे) एक नयी खोजी गयी आक्रामक स्लग प्रजाति है। पूर्वोत्तर भारतhttps://northeasttoday.in/northeast/new-invasive-pest-found-in-manipur/ New Invasive Pest Found In Manipur - Northeast Today Today North East 2024-07-31 en-US 2025-07-29 में भी ये आक्रामक स्लग फैल रहें हैं। कॉमन गार्डन स्लग (एल. अल्टे) को लेदरलीफ स्लग भी कहते हैं जो कि अफ्रीका की मूल प्रजाति है। आज ये आक्रामक स्लग पूरे भारत सहित दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के कई देशों में तेजी से अपना विस्तार कर कृषि क्षेत्र को काफी क्षति पहुंचा रहा है। भारत में इसे बैगन, टमाटर, गोभी, खीरा आदि सब्जियों और गेंदा, डहेलिया, गुलदोपहरी, कुमुदिनी जैसे फूलों को तेजी से नुकसान पहुंचाते हुए देखा गया है। ये स्लग नर्सरी में सुगंधित एवं औषधीय पौधों के लिए अत्यन्त हानिकारक है। इसी तरह ब्राउन गार्डन स्लग (एफ. अल्टे) मूली, बंदगोभी, ब्रोकोली और पत्तागोभी को नष्ट करता है। दक्षिण भारत में ब्राउन स्लग काफी, रबर, ताड़, केला और काली मिर्च के पौधों के लिए अत्यन्त नुकसानदायक है। अफ्रीका का मूल निवासी कैटरपिलर स्लग https://www.financialexpress.com/life/science-caterpillar-slug-a-new-invasive-species-is-on-its-way-to-attack-india-heres-how-to-save-yourself-2292378/ Caterpillar Slug: A new invasive species is on its way to attack India; here’s how to save yourself 2021-07-17 The Financial Express en 2025-07-28http://theearthview.in/caterpillar-slug-threatens-indias-wildlife-and-economy/ Caterpillar Slug Threatens India's Wildlife And Economy thearthview 2021-09-12 The EarthView en-GB 2025-07-30भारत में हाल में ही नयी आक्रामक प्रजाति के रूप में रिपोर्ट किया गया है। एक अनुमान के मुताबिक इस कैटरपिलर स्लग के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष 26 बिलियन डॉलर का घाटा होता है। लेविकौलिस हेराल्डी नामक एक नयी विदेशी स्लग प्रजाति महाराष्ट्र में शोधकर्ताओं द्वारा पहचानी गयी है। स्लग किसानों की फसलों और नर्सरी में उगाये गये कई प्रजाति के वृक्षों के छोटे पौधों को नष्ट कर आर्थिक एवं व्यावसायिक घाटा पैदा करते हैं। स्लग द्वारा शरीर से स्रावित चिपचिपा पदार्थ भी पौधों की संरचना को क्षतिग्रस्त कर देता है। स्लग नये पारिस्थितिकीय क्षेत्रों में इसलिए भी तेजी से फलते-फूलते हैं क्योंकि उस परिवेश में उनका कोई मुख्य शिकारी नहीं होता। कृषि में स्लग नियंत्रण के उपाय कृषि और बागवानी के लिए बेहद हानिकारक स्लग घोंघे की कई देशों में व्यापक स्तर पर फैली प्रजातियों को नियंत्रित करने के काफी प्रयास किए जा रहे हैं। आक्रामक स्लग कीटों से अपनी फसलों की सुरक्षा हेतु किसानों द्वारा कई प्रकार के रसायनों और घरेलू पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। आमतौर पर कई किसान अपने खेतों में स्लग की बढ़ती आबादी को रोकने हेतु नमक (सोडियम क्लोराइड) का छिड़काव करते हैं। चूँकि नमक स्लग के नम शरीर की नमी को सोख लेता है अतः ये स्लग से छुटकारा पाने हेतु एक प्रभावी तरीका है लेकिन इससे मिट्टी के क्षारीय एवं लवणीय होने का खतरा है। स्लग प्रायः शुष्क जगहों से बचने का प्रयास करते हैं इसलिए किसानों द्वारा इन्हें नियंत्रित करने के लिए चूल्हे अथवा भट्ठी से निकली सूखी राख का भी प्रयोग किया जाता है। साल में दो बार खेतों की गहरी जुताई करना भी स्लग से छुटकारा पाने का पर्यावरण अनुकूल तरीका है। जुताई करने से मिट्टी में मौजूद स्लग के अण्डे नष्ट हो जाते हैं और बचे-खुचे अण्डे मिट्टी से बाहर आकर शिकारियों द्वारा भक्षण कर लिये जाते हैं। खेतों-क्यारियों की समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहना भी स्लग को रोकने का एक कारगर उपाय है क्योंकि इससे स्लग के अंडे और स्लग को पोषण तथा आश्रय देने वाले खरपतवार पौधे नष्ट हो जाते हैं। कॉपर सल्फेट और ऑयरन फास्फेट जैसे रासायनिक पदार्थ भी स्लग को नष्ट करने में मददगार साबित हुए हैं। यदि पर्यावरण संरक्षण को भी ध्यान में रखते हुए स्लग नियंत्रण के उपाय किये जाएं तो हमें कृषि भूमि के आस-पास पक्षियों एवं सांपो का संरक्षण करने की आवश्यकता है क्योंकि ये जंतु इनके प्राकृतिक शिकारी हैं जो इनकी बढ़ती जनसंख्या पर लगाम लगाने में सक्षम हैं। कुछ किसानों और बागवानों द्वारा इन्हें हाथ से पकड़कर दूर किया जाता है और ये तरीका भी कृषि भूमि में स्लग की तादाद को उन्मूलित करने का सार्थक प्रयास है। मानव, प्रकृति एवं स्लग के मध्य संतुलन वास्तव में देखा जाये तो मानव द्वारा पर्यावरण एवं जैवविविधता को नुकसान पहुंचाने के चलते ही स्लग की कुछ प्रजातियाँ कृषि और बागवानी क्षेत्र के लिए हानिकारक साबित हुईं हैं। हम मनुष्यों ने आधुनिकता की चकाचौंध में अंधे होकर विदेशी पौधों एवं वन्यजीवों की दूसरे देशों से अवैध व्यापार व खरीद-फरोख्त की और साथ में इन आक्रामक प्रजातियों को भी अपने खेतों तक पहुंचा दिया। किसानों द्वारा खुद पक्षियों और सांपो को कीटनाशकों का उपयोग कर मार दिया गया जिस कारण स्लग के प्राकृतिक नियंत्रणकर्ता परभक्षी जीवों की संख्या घटती गयी। कहीं ऐसा ना हो कि एक दिन स्लग हमारी खेती और अर्थव्यवस्था को चौपट कर दें इसलिए हमें खुद जागरूक होना होगा। सरकार द्वारा प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर किसानों को स्लग के भावी खतरे के प्रति सचेत करना होगा। आने वाले वर्षों में इसकी विदेशी आक्रामक प्रजातियाँ भारतीय कृषि एवं स्थानीय जैवविविधता के लिए व्यापक संकट पैदा कर सकतीं हैं। बंदरगाहों एवं हवाई अड्डों पर बाहरी देशों से आयातित वस्तुओं का निरीक्षण कर देश में विदेशी स्लग की प्रजातियों के घुसपैठ को रोका जा सकता है अतः इस बारे में सरकार को कानूनी नियम-कायदे बनाने चाहिए। स्लग पारिस्थितिकी तंत्र में मुख्य भूमिका निभाते हैं और वो भी इसी पर्यावरण के अभिन्न अंग है लेकिन जब वो मानवीय गतिविधियों के चलते अपने मूल भौगोलिक क्षेत्र से भटक जातें हैं तभी वो किसी नये परितंत्र में कृषि एवं जैवविविधता के लिए संकट खड़ा करते हैं। आज जरूरत है कि हम खुद पर्यावरण के प्रति सचेत हों ताकि मानव, जैवविविधता एवं प्रकृति के मध्य संतुलन बना रहे। चित्र दीर्घा Slug_photo_by_Bhaskar_Burman केरल के अगुम्बे वर्षावन में स्लग Leatherleaf_slug_by_Rajesh_Kumar_Yadav खेत में स्लग (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) Slug_photo_by_Harendra_Srivastava_Naturalist नम भूमि पर स्लग (प्रयागराज) इन्हें भी देखें घोंघा मोलस्का उदरपाद सीप शंख अष्टबाहु सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:वर्गानुवंशिकी