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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

आचार्य रामचंद्र वर्मा

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जून 2016 आचार्य रामचंद्र वर्मा (1890-1969 ई.) हिन्दी के साहित्यकार एवं कोशकार रहे हैं। हिन्दी शब्दसागर के सम्पादकमण्डल के प्रमुख सदस्य थे। आपने आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के साथ मिलकर 'अच्छी हिन्दी' का आन्दोलन चलाया। आपके समय में हिन्दी का मानकीकरण हुआ। परिचय इनका जन्म काशी के एक सम्मानित खत्री परिवार में हुआ। वर्मा जी की पाठशालीय शिक्षा साधारण ही थी किंतु अपने विद्याप्रेम के कारण इन्होंने विद्वानों के संसर्ग तथा स्वाध्याय द्वारा हिंदी के अतिरिक्त उर्दू, फारसी, मराठी, बंगला, गुजराती, अंग्रेजी आदि कई भाषाओं का अच्छा अध्ययन कर लिया था। इनकी शिक्षु वृत्ति जीवन के अंतिम काल तक पूर्णतया जागरूक रही। विभिन्न भाषाओं के ग्रंथों के आदर्श अनुवाद इन्होंने प्रस्तुत किए हैं। अंग्रेजी के 'हिंदू पालिटी' ग्रंथ अनुवाद इन्होंने हिंदू राजतंत्र' नाम से किया है। मराठी भाषा की ज्ञानेश्वरी, छत्रसाल आदि पुस्तकों के सफल अनुवाद द्रष्टव्य हैं। वर्मा जी की स्थायी देन भाषा के क्षेत्र में है। अपने जीवन का अधिकांश इन्होंने शब्दार्थनिर्णय और भाषापरिष्कार में बिताया। इनका आरंभिक जीवन पत्रकारिता का रहा। सन्‌ 1907 ई. में ये 'हिंदी केसरी' के संपादक हुए। यह पत्र नागपुर से प्रकाशित होता था। तदनंतर बॉकीपुर से निकलनेवाले 'बिहार बंधु' का इन्होंने योग्यतापूर्वक संपादन किया। बाद में नागरीप्रचारिणीपत्रिका के संपादकमंडल में रहे। नागरीप्रचारिणी सभा, काशी से संपादित होनेवाले 'हिंदी शब्दसागर' में ये सहायक संपादक नियुक्त हुए। सन्‌ 1910 ई. से 1929 ई. तक इन्होंने उसमें कार्य किया। बाद में इन्हें 'संक्षिप्त हिंदी शब्दसागर' के संपादन का भार दिया गया। इसके अनंतर ये स्वतंत्र रूप में भाषा और कोश के क्षेत्र में कार्यरत रहे। इन्होंने गहरी सूझबूझ का परिचय दिया है। इस कार्य के लिए ये बराबर चिंतन और मनन किया करते थे। इनकी अनूठी हिंदीसेवा के कारण भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मश्री' की सम्मानित उपाधि से अलंकृत किया था। इसमें किंचिन्मात्र संदेह नहीं कि ये आजीवन हिंदीसेवा में जिए। शब्दार्थनिर्णय के प्रति गहरी रुचि रखने के कारण इन्होंने अपने भवन का नाम ही 'शब्दलोक' रख लिया था। अंतिम काल में इन्होंने हिंदी का एक बृहत्‌ कोश 'मानक हिंदी कोश' के नाम से तैयार किया जो पाँच खंडों में हिंदी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित हुआ है। इनके कतिपय प्रसिद्ध ग्रंथों के नाम हैं- अच्छी हिंदी, उर्दू-हिंदीकोश, हिंदी प्रयोग, प्रामाणिक हिंदी कोश, शिक्षा और देशी भाषाएँ, हिंदी कोश रचना, आदि। सन्‌ 1969 में इनका काशीवास हो गया। इनकी सादगी और स्वभाव की सरलता प्रत्येक मिलनेवाले साहित्यिक पर अपना प्रभाव डाले बिना न रहती थी। वर्मा जी हिंदी में जिए और हिंदी के लिए जिए। इन्होंने आदिकाल की कालावधि संवत् 750 से 1375 तक मानकर इस दो खण्डों में बाँटा है: संधिकाल - 750 से 1000 वि. तक, चारणकाल - 1000 से 1375 वि. तक. कृतियाँ अच्छी हिन्दी (संवत २००१ विक्रमी) संक्षिप्त हिन्दी शब्दसागर प्रामाणिक हिन्दी कोश (१९४९) प्रामाणिक हिन्दी बालकोश उर्दू हिन्दी कोश (१९५३) छत्रसाल (माराठी से अनूदित) हास्यरस (काका कालेलकर की मराठी कृति 'हास्य आणि विनोद' का भाषान्तर) 'फूलों का हार' (अनूदित, सन् १९१८) हिन्दी ज्ञानेश्वरी (ज्ञानेश्वरी का हिन्दी अनुवाद ; संवत १९९४ ) इन्हें भी देखें हिन्दी शब्दसागर कोशकर्म सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ अच्छी हिन्दी (आचार्य रामचन्द्र वर्म्मा) वृहद् प्रामाणिक हिन्दी शब्दकोश (गूगल पुस्तक ; लेखक - आचार्य रामचन्द्र वर्मा तथा बद्रीनाथ कपूर) उर्दू-हिन्दी कोश (गूगल पुस्तक ; लेखक - आचार्य रामचन्द्र वर्मा तथा बद्रीनाथ कपूर) हिन्दी ज्ञानेश्वरी श्रेणी:हिन्दी साहित्यकार