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सोहगौरा ताम्रलेख
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250px सोहगौरा ताम्रलेख सोहगौरा ताम्रपट ताम्र ब्राह्मी लिपि ईसापूर्व तीसरी शताब्दी ईसापूर्व तीसरी शताब्दी भारत 26.57 83.48 inline,titlehttp://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.446763 Origin & Process Of Cultural Development In The Middle Ganga Plain 2002 103 गोरखपुर, सोहगौराhttp://archive.org/details/radhakumud-mukerji प्राचीन भारत Radhakumud Mukerji 90 India center yes सोहगौरा 26 34 12 N 83 28 48 E
सोहगौरा ताम्रलेख एक ताम्रपट्ट पर लेखबद्ध मौर्यकालीन प्राचीन लेख हैKapur Kamlesh http://archive.org/details/portraitsofnatio0000kapu 418 Portraits of a nation : history of ancient India 2010 New Delhi : Sterling Publishers Private Ltd. Internet Archive 978-81-207-5212-2 One of the earliest copperplates, the Sahgaura plate, dates back to the Mauryan period. जो उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के पास सोहगौरा नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।http://archive.org/details/lipi-evam-abhilekh_202109 लिपि एवं अभिलेख 2021-09-26 46 सोहगौरा से मौर्यकालीन ताम्रपत्र अभिलेख प्राप्त हुआ है और तब से बारहवीं शताब्दी तक ताम्रपत्रों का प्रचलन रहा। सोहगौरा, गोरखपुर से ३५ किमी दक्षिण-पूर्व में राप्ती नदी के किनारे स्थित है। THE SOHGAURA COPPER-PLATE REGISTRATION BM Barua Annals of the Bhandarkar Oriental Research Institute Vol. 11, No. 1 (1930), pp. 32-48 इस ताम्रलेख की लिपि मौर्यकालीन ब्राह्मी है और भाषा प्राकृत।http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.480527 History And Palaeography Of Bharhut Inscriptions Manoj Mishra 152 सोहगौरा ताम्रपत्र लेख: ....जायसवाल ने इसे चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में रखा है। फ्लीट ने इसे 320-180 ईसा पूर्व के बीच कहीं रखना उचित समझा है । अक्षर-आकारों के आधार पर बूलर इसे मौर्यकालीन मानते हैं। सरकार के अनुसार इसे तृतीय शातब्दी ईसा पूर्व के पहले नहीं रखा जा सकता। दानी इसे प्रथम शताब्दी ईस्वी से सम्बन्धित करते हैं। बी०एम० बरूआ इसे प्राड् मौर्यकालीन मानते हैं। राजबली पाण्डेय एवं एस०एन० राय का भी यही मत है। उपासक ने सरकार के मत को अधिमान्यता प्रदान किया है। अभिलेख की मोटाई 1.6 मि.मी. और आकार 6.4 × 2.9 से.मी. का है।http://archive.org/details/ashu_20240529 उपिन्दर सिंह, प्राचीन एवं पूर्व मध्यकालीन भारत का इतिहास 351 सन् 1893 में गोरखपुर तहसील के सोहगौर गाँव के एक निवासी को 1.6 मि.मी. मोटाई और 6.4 × 2.9 से.मी. आकार का एक ताम्र पट्ट मिला। खुदुरे सतह वाले इस पट्ट को दीवार में टाँगने के उद्देश्य से इसके चार कोनों पर छिद्र बने हुए थे। ताम्र पट्ट पर प्राकृत भाषा तथा ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण चार पंक्तियों का एक अभिलेख था।
सोहगौरा का पुरास्थल भारतीय लेखन कला की प्राचीनता को प्रमाणित करने वाला पहला अभिलेख प्रस्तुत करता है। इसमें अकाल एवं दुर्भिक्ष के समय जनता के उपयोग के लिए अन्न के तीन कोष्ठागारों के बनाने का वर्णन है। इस अभिलेख से अकाल के दौरान चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा किए गए राहत कार्यों की चर्चा है।http://archive.org/details/rCvc_bharat-varsh-ka-brihad-itihas-vol-2-by-bhagavat-datta-1960-new-delhi-itihas-prakashan-mandal Bharat Varsh Ka Brihad Itihas Vol 2 Datta Bhagavat Delhi Itihas Prakashan Mandal 1960 262 सम्राट् अशोक से पूर्वकाल के तीन स्पष्ट पढ़े गए लेख इस समय तक मिल चुके हैं। वे हैं, महास्थान (बंगदेश) का शिलालेख, सोहगौरा (जिला गोरखपुर) का ताम्रपत्र और काङ्गड़ा अन्तर्गत बनेर नाले के ऊपर कन्हयारा से नौ मील दक्षिण तथा दाध से एक मील दूर स्थान का शिलालेख । पहले दो लेख अशोक से पूर्वकाल के हैं। कई लोग उन्हें चन्द्रगुप्त के शासन कहते हैं।Upinder Singh http://archive.org/details/history-of-ancient-and-early-medeival-india-from-the-stone-age-to-the-12th-century-pdfdrive History Of Ancient And Early Medeival India From The Stone Age To The 12th Century 737 The Sohgaura inscription has been commented on by numerous scholars, who have variously assigned it a pre-Ashokan or post-Maurya date, the majority opinion currently favouring the latter. K. P. Jayaswal interpreted the crescent on the top as an emblem of the Maurya king Chandragupta and connected the contents of the inscription with the Jaina legend of a great famine during the reign of this king. यह अभिलेख चार पंक्तियों में वर्णित है।
इस अभिलेख में वंशग्राम में स्थापित किये गये दो कोष्ठागारों का उल्लेख है, जिनमें एकत्रित अनाज को दुर्भिक्ष और, आपत्तिकाल में त्रिकवेणी, माथुर, चंचु मयुदाम और भल्लक ग्रामों में वितरित करने का आदेश श्रावस्ती के महामात्रों ने मानवाशीतिकट शिविर से दिया था।http://archive.org/details/20231212_20231212_0223 अभिलेख परिचय संक्षिप्त प्रोफेसर प्राचीन इतिहास डॉ० अंजना 1-2
उपस्तिथि
सोहगौरा से पाए गए ताम्रपत्र के अनुसार गोरखपुर का ज़िला (अर्थात् मल्लराष्ट्र का पश्चिमी भाग) श्रावस्ती महाभुक्ति में पड़ता था ।http://archive.org/details/sBFI_kushinagar-ka-sankshipt-itihas-by-dharma-rakshit-kashmir-1943-shri-ram-bachan-sinh Kushinagar Ka Sankshipt Itihas Shri Ram Bachan Sinh 43 सोहगौरा से पाए गए ताम्रपत्र के अनुसार गोरखपुर का ज़िला (अर्थात् मल्लराष्ट्र का पश्चिमी भाग) श्रावस्ती महाभुक्ति में पड़ता था ।
अभिलेख
सावतियानम् महामात्तानम् सासने मानवासीतिक डसिलिमते। उस्सगामे व एते दुवे कोट्ठागालानि
तिन-यवानि मंथुल्लोच-छम्मा-दाम-भालकानिव लं कयियति अतियायिकाय नो गहितव्वाय॥
—सोहगौरा ताम्रलेख, गोरखपुरhttp://archive.org/details/hnch_mourya-samrajya-ka-itihas-by-satyaketu-vidyalankar-1980-new-delhi-shri-saraswati-sadan Mourya Samrajya Ka Itihas By Satyaketu Vidyalankar 1980 New Delhi Shri Saraswati Sadan 455
अनुवाद : मानवासीति से निर्गत श्रावस्ती के महामात्रों के शासनादेशानुसार:
केवल उच्चग्राम में ही ये दो कोष्ठागार - जो तृण, यव, मन्थोल्लोच, चर्म तथा दाम के भारकों (सामग्री-पुंज) की भाँति हैं - सुलभ किए जाएँ; आत्ययिक (आपातकालीन संकट) के समय इन्हें कदापि रोका न जाए।
इस प्राकृत अभिलेख का संस्कृत अनुवाद इस प्रकार हैhttp://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.427428 Mouryas Saamrajya Ka Itihas (1971) Digital Library Of India Noida 455 : "श्रावस्तीयानां महामात्राणां शासने मानवासीतिक
दंशलीमते। उच्चग्रामे एव एते द्वे कोष्ठागारे
तृण-यवानि मन्थोल्लोच-चर्म-दाम-भारकाणीव
लभ्ये क्रियेते आत्ययिकाय न ग्रहीतव्ये॥"
इस ताम्रलेख के शीर्ष पर एक सामान्य अर्धचंद्राकार प्रतीक है जो आम तौर पर मौर्य चांदी के पंच चिह्नित सिक्कों पर पाया जाता है, और कुम्हरार स्तंभ के आधार पर और कई अन्य पर भी पाया जाता है। जायसवाल वा अन्य इतिहासकार इसे चन्द्रगुप्त मौर्य का मोनोग्राम
16px मानते हैं। वह चंद्र के रूप में शीर्ष अर्धचंद्र लेते है और शेष पहाड़ी जैसा संयोजन गुत्त के लिए; ऊपरी लूप ∩- ग के लिए है और दो निचले लूप ∩∩- त्त के लिए है, जिससे यह चंद्रगुत्त बनता है, प्राकृत में गुप्त शब्द को गुत्त लिखा जाता है।Verma Thakur Prasad http://archive.org/details/dli.ministry.26572 The palaeography of Brahmi script in north India, from c. 236 B.C. to c. 200 A.D This sign is also found on the base of a Kumrahar pillar and on many other antiquities believed to belong to the Mauryan period. Jayaswal reads it as the monogram of Chandragupta Maurya. He takes the top crescent (III.29.i) as Chandra and the remaining hill-like combination for gutta; the upper loop for ga- ∩ and the two lower loops- ∩∩ for double tta making it Chandragutta. 1971 Siddharth Prakashan, Varanasi 39
विशेषता
यह अभिलेख निम्न तथ्यों को उद्घाटित करता हैhttp://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.480492 Gorakhpur Janpad Ka Puratatva B B Mishra 145-146-
प्राचीन भारत में अकाल की त्रासदी से निपटने के लिए कोष्ठागार निर्माण तथा उसमें संग्रहीत अन्न के वितर ण की जानकारी मिलती है। यह अन्न वितरण के लिए प्रथम आभिलेखिक प्रमाण है।http://archive.org/details/OPwE_prachina-bharatiya-arthika-itihas-beginning-to-600-ad-by-dr.-vishuddha-nand-path Prachina Bharatiya Arthika Itihas ( Beginning To 600 AD) Nand Pathak Dr. Vishuddha Hindi Granth Academy Series. 305 Uttar Pradesh Hindi Sansthan, Lucknow 45 गोरखपुर जिले के सोहगौरा से प्राप्त होने वाला एक कांस्यपत्राभिलेख यह उल्लेख करता है कि विभिन्न ग्रामों (स्थानों) में राज्य की ओर से अकाल अथवा अन्य वैसी ही दैवी विपत्तियों के समय जनता के भरण-पोषण के लिए आपातकालीन कोठार स्थापित किये जाते थे, जो साधारण समयों में खोले नहीं जाते थे।
अभिलेख के ऊपर वस्तु संरचना का प्रथम बार अंकन हुआ है।
लेख के ऊपर कोष्ठागारों, कमल की कली, वेदिका से परिवेष्टित वृक्ष तथा पर्वत पर चन्द्र के चिन्हों का अंकन हुआ है। ये सभी दृश्य मौर्य युगीन आहत मुद्राओं पर दृष्टिगोचर होते हैं।
गोरखपुर जनपद से प्राप्त प्रथम राजकीय अभिलेख।
मौर्य काल में अभिलेख लेखन हेतु धातु का प्रयोग।
प्रशासनिक दृष्टि से तृतीय शताब्दी ई० पू० में गोरखपुर परिक्षेत्र श्रावस्ती के महामात्यों के अन्तर्गत आता था।
सन्दर्भ
श्रेणी:ताम्र की वस्तुएँ