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411 समाचार
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भारतीय संविधान की उद्देशिका

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संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु प्रायः उनसे पहले एक उद्देशिका प्रस्तुत की जाती है। भारतीय संविधान की उद्देशिका USA संविधान से प्रभावित मानी जाती हैhttps://www.jagranjosh.com/general-knowledge/constitution-of-india-features-taken-from-other-countries-1409660545-1(श्रोत जोड़ें)। तथा इसकी भाषा ऑस्ट्रेलिया से ली गई है। उद्देशिका संविधान का सार मानी जाती है उसके लक्ष्य प्रकट करती है। इसके माध्यम से संविधान का दर्शन भी प्रकट होता है। संविधान किन आदर्शों, आकांक्षाओं को प्रकट करता है, इसका निर्धारण भी उद्देशिका से हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के मतानुसार उद्देशिका का प्रयोग संविधान निर्माताओ के मस्तिष्क में झांकने और उनके उद्देश्य को जानने में प्रयोग की जा सकती है। उद्देशिका यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है। इसी कारण यह 'हम भारत के लोग' से प्रारम्भ होती है। केहर सिंह बनाम भारत संघ के वाद में कहा गया कि संविधान सभा भारतीय जनता का सीधा प्रतिनिधित्व नहीं करती थी अतः संविधान विधि की विशेष अनुकृपा प्राप्त नहीं कर सकता है। परन्तु न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए संविधान को सर्वोपरि माना है जिस पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना right|thumb|300px|भारतीय संविधान की उद्देशिका हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी , पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्यसंविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा-2 द्वारा (3-1-1977 से) संपूर्ण प्रभुत्व लोकतंत्रात्मक गणराज्य के स्थान पर प्रतिस्थापित बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डतासंविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा-2 द्वारा (3-1-1977 से) "राष्ट्र की एकता" के स्थान पर प्रतिस्थापित. सुनिश्चित कराने वाली, बन्धुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई॰ (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। जय। हिंद उद्देशिका की प्रकृति (१) यह संविधान का महत्वपूर्ण अंग नहीं है क्योंकि यह राज्य के तीनों अंगो को कोई शक्ति नहीं देती है। वे अपनी शक्तियाँ संविधान के अन्य अनुच्छेदों से प्राप्त करती है। इसी प्रकार यह उनकी शक्ति पर कोई रोक भी नहीं लगाती है। (२) संविधान के किसी भाग पर यह कोई विशेष बल नहीं देती है संविधान के अनुच्छेद तथा इसमें संघर्ष होने पर अनुच्छेद को वरीयता मिलेगी। (३) न्यायालय में इस के आधार पर कोई वाद नहीं लाया जा सकता है न ही वे इसे लागू कर सकते है। (४) इस कारण इसे कई बार मात्र शोभात्मक आभूषण भी कहा गया है। सर्वोच्च न्यायालय भी इस की सीमित भूमिका मानता है इसका प्रयोग संविधान में विद्यमान अस्पष्टता दूर करने हेतु किया जा सकता है। उद्देशिका के उद्देश्य (१) उद्देशिका यह बताती है कि संविधान जनता के लिए हैं तथा जनता ही अंतिम सम्प्रभु है। (२) उद्देशिका लोगों के लक्ष्यों-आकांक्षाओं को प्रकट करती है। (३) इसका प्रयोग किसी अनुच्छेद में विद्यमान अस्पष्टता को दूर करने में हो सकता है। (४) यह जाना जा सकता है कि संविधान किस तारीख को बना तथा पारित हुआ था। उद्देशिका संविधान के एक भाग के रूप में परम्परागत मत : उद्देशिका को संविधान का भाग नहीं मानता है क्योंकि यदि इसे विलोपित भी कर दे तो भी संविधान अपनी विशेष स्थिति बनाये रख सकता है। इसे पुस्तक के पूर्व परिचय की तरह समझा जा सकता है यह मत सर्वोच्च न्यायालय ने बेरुबारी यूनियन वाद 1960 में प्रकट किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जहाँ संविधान की भाषा संदिग्ध हो, वहाँ प्रस्तावना विविध निर्वाचन में सहायता करती है। इसीलिए "विधायिका" प्रस्तावना में संशोधन नहीं कर सकती। नवीन मत : इसे संविधान का एक भाग बताता है केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य 1973 में दिये निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान का भाग बताया है। संविधान का एक भाग होने के कारण ही संसद ने इसे 42वें संविधान संशोधन से इसे सशोधित किया था तथा समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंण्डता शब्द जोड़ दिये थे। वर्तमान में नवीन मत ही मान्य है। उद्देशिका के आदर्श उद्देशिका के आदर्श अग्रलिखित है- कम या अधिक मात्रा में प्राप्त कर लिये गये हैं अपेक्षाएं (स्वतंत्रता, न्याय, समानता है), लक्ष्य है जबकि आदर्श (जनतांत्रिक, समाजवादी) उपाय हैं। उद्देशिका के शब्दों का विश्लेषण सम्प्रभु -- राज्य की सर्वोपरि राजनैतिक शक्ति है कि घोषणा करती है, राज्य की राजनैतिक सीमाओं के भीतर इसकी सत्ता सर्वोपरि है, तथा यह किसी बाहरी शक्ति की प्रभुता स्वीकार नहीं करती है। समाजवादी-- भारतीय समाजवाद अनिवार्य रूप से लोक तांत्रिक होना चाहिए। समाजवादी लक्ष्यों की प्राप्ति लोक तांत्रिक माध्यमों से होनी चाहिए। यह शब्द भारत को एक जनकल्याणकारी राज्य के रूप में स्थापित कर देता है। पंथनिरपेक्षता-- इसका अर्थ लौकिकता को आध्यात्मिक्ता पर वरीयता देना है, धर्म पर आधारित भेदों का सम्मान करना, अन्य धर्मों के प्रति राज्य द्वारा तटस्थता बरतना ही धर्म निरपेक्षता है, ऐसे राज्य किसी एक धर्म को प्रोत्साहन ना देकर विविध धर्मो के मध्य सहिष्णुता तथा सहयोग बढाने का कार्य करें यह एक कर्तव्य है जिसके पालन से विभिन्न धर्मो के बीच सहस्तित्व स्वीकार किया जाता है। इसका लाभ यह है कि राज्य किसी धर्म के अधीन नहीं होता है जैसे इस्लामिक गणतंत्र ईरान में इस्लाम गणतंत्र से भी अधिक महत्वपूर्ण है। इस प्रकार के राज्य विधि के समक्ष समता बरतते है तथा नागरिकों के मध्य धार्मिक आधार पर विभेद नहीं बरतते, उनको समान अवसर भी उपलब्ध करवाया जाता है इस प्रकार के राज्य धर्मविरोधी, अथवा अधार्मिक न होकर धर्मनिरपेक्ष होते हैं। वे अपने नागरिकों को इच्छा अनुसार धर्म पालन का अधिकार देते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 इस से समबन्धित है पंथनिरपेक्षता कोई उधार लिया गया शब्द नहीं है। भारतीय साहित्य में सर्वधर्म समभाव के आदर्श के रूप में यह मौजूद था। यहाँ धर्म पर आधारित विभेद का विरोध किय गया है न कि राज्य का धर्म से संबंध का। जनतंत्र -- अनुच्छेद 19 तथा अनु 326 जनतंत्र से संबंधित है भारत में बहुदलीय लोकतंत्र है। गणतंत्र -- राजप्रमुख निर्वाचित होगा न कि वंशानुगत। अपेक्षाएँ (1) न्याय-- सामाजिक आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय के वे प्रकार है जो संविधान मे भारतीय नागरिकों को देने की वकालत की गयी है,1 व्यक्ति 1 वोट राजनैतिक न्याय की प्राप्ति हेतु आवश्यक है[19,326], सामाजिक न्याय की प्राप्ति हेतु अस्पृश्यता का उन्मूलन, उपाधि का उन्मूलन किया गया है,[अनु 15,16,17,18], आर्थिक न्याय हेतु राज्य हेतु नीति निर्देशक तत्वॉ प्रावधान रखा गया है (2) स्वतंत्रता-- इसका अर्थ नागरिक पर बाध्यकारी तथा बाहरी प्रतिबंधों का अभाव है, एक नागरिका द्वारा दूसरे के अधिकारों का उल्लघंन करना निषेधित है, नागरिक स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 में तथा धार्मिक स्वतंत्रता अनु 25-28 मे वर्णित है। (3)समानता-- स्तर तथा अवसरों की समानता स्थापित करना अनु 14 से 18 मे वर्णित है। (4) बंधुत्व -- भारतीय नागरिकों के मध्य बंधुत्व की भावना स्थापित करना, क्योकि इस के बिना देश में एकता स्थापित नहीं की जा सकती है सन्दर्भ इन्हें भी देखें भारतीय संविधान भारत के नीति निर्देशक तत्त्व श्रेणी:भारत का संविधान