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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

परिभाषेन्दुशेखर

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अप्रैल 2025 अप्रैल 2025 अप्रैल 2025 परिभाषेन्दुशेखर नागेशभट्ट द्वारा रचित एक महत्त्वपूर्ण व्याकरण ग्रन्थ है । व्याकरणशास्त्र की परिभाषाओं का यह सुप्रसिद्ध व्याख्या ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में परिभाषाओं का व्याख्यान किया गया है। व्याकरण शास्त्र में परिभाषाएँ दो प्रकार की मिलती हैं। एक तो पाणिनि द्वारा उच्चारित सूत्रात्मक परिभाषा, जैसे- 'तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य' इत्यादि एवं दूसरी तरह की परिभाषाएँ वे हैं जो पाणिनि सूत्रों से ज्ञापित ( बोधित) अथवा वाचनिकी या लोकन्यायसिद्ध हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ में सूत्रात्मक परिभाषाओं का व्याख्यान नहीं है। व्याख्येय परिभाषा के रूप में यहां दूसरे प्रकार की परिभाषाएँ गृहीत हैं। व्याख्येय परिभाषाओं का स्वरूप करते हुए भूतिकार ने लिखा है- संकेतग्राहकभिन्नत्वे सति शब्दधमिकसाधुत्व प्रकारकशास्त्रजन्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितबोधक सहकारित्वेन मुन्यभिप्रेतत्वे सति पाणिन्युच्चरितभिन्नत्वम् । इसका तात्पर्य है- "जो संकेतग्राहक संज्ञासूत्रों से भिन्न हों। यहाँ यह बात ज्ञातव्य है कि संज्ञासूत्र संकेत (शक्ति) के ग्राहक होते हैं। जैसे 'वृद्धिरादैच्' यह शास्त्र वृद्धि पद का संकेत आदैच् अर्थ में करता है। यहाँ व्याख्यान की जाने वाली परिभाषाएँ इस प्रकार संज्ञासूत्रों से भिन्न हैं । इसके अतिरिक्त 'निर्जरसी' आदि प्रयोग जिनके लिए 'अयं प्रयोग: साधुः इस प्रकार का साधुत्व प्रकारकाप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितबोध 'जराया जरसन्यतरस्याम्' का किया जाता है। उस बोध में सहकारित्वेन रूपेण मुनित्रय से जो अभिप्रेत हों तथा पाणिनि द्वारा उच्चारित न हों, ऐसी परिभाषाएँ ही व्याख्येय परिभाषा के रूप में स्वीकृत हैं। "निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति" इस परिभाषा में उक्त लक्षण का समन्वय भलीभांति किया जा सकता है क्योंकि यह परिभाषा संकेतग्राहक संज्ञासूत्रों से भिन्न है तथा लक्ष्यधार्मिक साधुत्वप्रकारक बोध में सहकारितया मुनियों से अभिप्रेत है। साथ ही पाणिनि के द्वारा इसका उच्चारण भी नहीं किया गया है। इसीलिए यहाँ यह व्याख्येय परिभाषा के रूप में ग्राह्य है। इसी प्रकार व्याख्येय परिभाषाओं का उपर्युक्त स्वरूप यहाँ समस्त परिभाषाओं से समन्वित होता है।परिभाषेन्दुशेखर, सुबोधिनी हिन्दी टीका सहित (टीकाकार - विश्वनाथ मिश्र) इस उपर्युक्त लक्ष्यलक्षित परिभाषाओं का यहाँ व्याख्यान होने के कारण 'तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य' इत्यादि परिभाषाएँ यहाँ व्याख्यात नहीं हुई हैं क्योंकि वे पाणिनि द्वारा साक्षात् उच्चारित हैं और यहाँ की परिभाषाएँ पाणिनि-उच्चारितभिन्न हैं। परिभाषाओं का विवेचन करने वाला यह ग्रन्थ शब्दों की व्युत्पत्ति में अत्यन्त उपयोगी एवं व्याकरणशास्त्रविषयक विविधन्यायों का संग्रह है। इस ग्रन्थ में वर्णित परिभाषाएँ मुख्य रूप से कात्यायन और पतञ्जलि इत्यादि प्रमुख व्याकरणशास्त्रीय आचायों के ग्रन्थों से ज्ञापित करके संकलित की गई हैं। महेश्वरसूत्र से भी कुछ परिभाषाएँ ज्ञापित हैं जैसे- 'लण् एव अइउण्' के णकारद्वय से 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिनं हि सन्देहादलणम्' इस पातज्जलमहाभाष्य में ग्रन्थोक्त सभी परिभाषाओं का सोदाहरण उल्लेख है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि धातु-पाठ के संकलन के समय ही इन परिभाषाओं का भी संकलन हुआ होगा । परिभाषेन्दुशेखर से पहले परिभाषाओं के सम्बन्ध में परम प्राचीन ग्रन्थ व्याडिकृत परिभाषापाठ तथा सीरदेवविरचित परिभाषावृत्ति नामक ग्रन्थों का उल्लेख यत्र-तत्र मिलता है। इसमें सन्देह नहीं कि उक्त दोनों ग्रन्थ परिभाषा विवेचन के लिए उतने उपयोगी नहीं रहे होंगे जितना कि वर्तमान परिभाषेन्दुशेखर है। नागेशभट्ट ने नव्यन्याय की शैली का अवलम्बन कर परिभाषाओं का जो मौलिक विवेचन किया है, वह अपने में अपूर्व है। भूति और विजया टीकाओं में जो परिष्कार देखने को मिलते हैं उनका बीज नागेशकृत परि भाषाओं की व्याख्या में ही निहित है। 'अनेकान्ता अनुबन्धाः, निर्दिश्यमानस्या- देशा भवन्ति स्त्रीप्रत्यये चानुपसर्जने न, एकदेशविकृत मनन्यवत्' इत्यादि परि भाषाओं की भूति व्याख्या में परिष्कारों का वैशिष्ट्य भलीभांति देखा जा जा सकता है। इस ग्रंथ में तीन प्रकरण हैं। 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिनं हि सन्देहादलक्षणम्' यहाँ से लेकर 'एकदेशविकृतमनन्यवत्' तक जिसमें ३७ ( सैंतीस ) परिभाषाएँ हैं, यह प्रथम प्रकरण है। इसे 'शास्त्रत्वसम्पादनोद्देश' प्रकरण कहा जाता है। दूसरा प्रकरण जिसमें पूर्वापरनित्यान्तरङ्गापवादानामुत्तरोत्तरं बलीयः' यहाँ से लेकर 'उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान्' तक है, जिसमें ३४ परिभाषाएँ आती हैं। इस प्रकरण का नाम 'बाधवीज' प्रकरण है। तीसरा प्रकरण 'प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम्' से प्रारम्भ होकर 'अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः' तक है, जिसमें बासठ परिभाषाएँ हैं। इस प्रकरण का नाम 'शास्त्रशेष' प्रकरण है। इन उपर्युक्त तीनों प्रकरणों में प्रथमप्रकरण का नाम 'शास्त्रसम्पादनोद्देश' इसलिये रखा गया है कि इस प्रकरण की परिभाषाओं द्वारा 'इको यणचि' आदि सूत्रों में शास्त्रत्व का सम्पादन किया जाता है। शास्त्र उसे कहते हैं जो अप्रामाण्य ज्ञान से अनास्कन्दित लक्ष्य का साधुत्व ज्ञापित करे। यदि 'इको- यणचि' शास्त्र इक् के स्थान पर अविशेषेण यण का विधान करे तो 'सुध्युपास्यः' इस प्रयोग में सकारोत्तरवर्तित उकार को भी कदाचित् यण् प्रसक्त हो सकता है । जो कि सर्वथा अप्रामाणिक होगा एवं उसके शास्त्रत्व का विघातक होगा । अतः 'तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य' के सहयोग से 'इको यणचि' का अर्थ ऐसा किया जाता है - अजव्यवहित पूर्वत्वविशिष्ट इक् के स्थान पर यण् हो । फलस्वरूप 'सुध्युपास्यः' प्रयोग में सकारोत्तरवति उकार को यण् न होकर धकारो- त्तरवति इकार को यण् होता है। इसी प्रकार 'निर्जरसी' इस प्रयोग में 'एक- देशविकृतन्याय' की सहायता से जर शब्द के स्थान पर तथा 'येन विधिस्त- दन्तस्य' के द्वारा सम्पूर्ण निर्जर के स्थान जरसादेश प्राप्त होता है। यदि सम्पूर्ण निर्जर के स्थान पर जरसादेश हो जाय तो निर्जरसो यह प्रयोग नहीं बन सकेगा । फलस्वरूप 'जराया जरसन्यतरस्याम्' शास्त्र में अप्रामाणिकता आ जायेगी। इसलिये 'निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति' इस परिभाषा की सहा- यता से निर्जरघटक जर के स्थान पर ही जरसादेश किया जाता है। इस प्रकार निर्जरसो प्रयोग की सिद्धि होती है। साथ ही लक्ष्यधर्मिकसाधुत्वप्रकारक अप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित बोध का जनक होने के कारण 'जराया जरसन्यतरस्याम्' का शास्त्रत्व भी सम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार प्रथमतन्त्र की परिभाषाएँ शास्त्रत्वसम्पादन का कार्य करती हैं। इस तन्त्र की परिभाषाओं के द्वारा शास्त्रत्वसम्पादन करने के बाद ही द्वितीय तन्त्र ( प्रकरण ) की बाधवीज वाली परिभाषाएँ सार्थक होती हैं। क्योंकि वहाँ यह कहा गया है कि अमुक शास्त्र के प्रति अमुक शास्त्र असिद्ध हो। किन्तु बिना शास्त्र की सिद्धि के एक शास्त्र के प्रति दूसरे शास्त्र को असिद्ध कैसे किया जा सकता था। प्रथमतन्त्र की परिभाषाओं के द्वारा शास्त्रत्व की सिद्धि करने से इस समस्या का समाधान हो जाता है। इस प्रकार प्रथम प्रकरण की परिभाषाएँ द्वितीय प्रकरण की परिभाषाओं की उप- जीव्य कही जा सकती हैं। द्वितीय प्रकरण में परिभाषाओं के परस्पर बाध्य- बाधक भाव का विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त शास्त्रोपयोगिनी परि- भाषाएँ तृतीय प्रकरण में गृहीत हैं। इसका नाम शास्त्रशेपप्रकरण है । परिभाषाओं का वर्गीकरण परिभाषेन्दुशेखर में कुल १३३ परिभाषाएँ हैं। इनमें कुछ परिभाषाएँ ऐसी हैं जो प्राचीन वैयाकरण तन्त्र ( शास्त्र ) में वचनरूप से पठित हैं। एवं कुछ परिभाषाएँ पाणिनीय तन्त्र के अनुसार ज्ञापकसिद्ध और न्यायसिद्ध हैं । ज्ञापकसिद्ध से तात्पर्य उन परिभाषाओं से है जो किसी सूत्र या सूत्र के अंश से ज्ञापित की जाती हैं। जैसे– 'असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे' यह परिभाषा 'वाह ऊठ्' इसके ऊठ् अंश से ज्ञापित है। एवं 'अन्तरङ्गानपि विधीन् बहिरङ्गो लुम्बाधते' यह परिभाषा 'प्रत्ययोत्तरपदयोश्च' इस सम्पूर्ण सूत्र से ज्ञापित है। न्यायसिद्ध परिभाषाओं से तात्पर्य उन परिभाषाओं से है जो लौकिक या शास्त्रीय न्याय से सिद्ध होती हैं। जैसे—'यदागम' परिभाषा इस लौकिकन्याय से सिद्ध है कि देवदत्त का अङ्गाधिक्य होने पर भी तद्विशिष्ट (अङ्गाधिक्यविशिष्ट) व्यक्ति का देवदत्त शब्द से ग्रहण होता है। इस प्रकार न्यायसिद्ध परिभाषाओं में 'एकदेशविकृतमनन्यवत् व्यपदेशिवदेकस्मिन्, असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे येनाप्राप्ते यो विधिरारभ्यते स तस्य बाधको भवति' इत्यादि अनेक परिभाषाएँ आती हैं । वाचनिक परिभाषाएँ दो प्रकार की उपलब्ध हैं। प्रथम सूत्रसिद्धवाचनिकी , दूसरी स्वतन्त्रवाचनिकी । सूत्रसिद्ध वाचनिकी परिभाषाओं में 'निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति' परिभाषा आती है। 'निदिश्यमानस्यादेशा भवन्ति' यह परिभाषा षष्ठी स्थानेयोगा' सूत्र की आवृत्ति करके सिद्ध की जाती है । अतः यह स्वतन्त्रवाचनिकी न होने पर भी वचनरूपेण पठित सूत्र से सिद्ध होने के कारण सूत्रसिद्धवाचनिकी कही जाती है। स्वतन्त्रवाचनिकी परिभाषा 'यस्मि विधिस्तदादावल्ग्रहणे' है क्योंकि 'येन विधिस्तदन्तस्य' सूत्र के भाष्य में यह परिभाषा इसी रूप में पढ़ी गयी है। इसी प्रकार अनेक परिभाषाएँ हैं जो स्वतन्त्रवाचनिकी हैं जिनका उल्लेख ग्रन्थकार ने स्वयं परिभाषाओं के व्याख्यान के अवसर पर कर दिया है। नागेशभट्ट ने अपने शब्दों में इस बात को प्रगट किया है 'प्राचीनवैयाकरणतन्त्रे वाचनिकान्यत्र पाणिनीयतन्त्रे ज्ञापकन्याय- सिद्धानि भाष्यवार्तिकयोरुपनिबद्धानि यानि परिभाषारूपाणि तानि व्याख्या- यन्ते' इस प्रकार इस ग्रंथ का प्रतिपाय विषय वाचनिक तथा ज्ञापक और न्यायसिद्ध परिभाषाओं का विवेचन करना है। इस प्रकार का विवेचन लक्ष्य- धार्मिक साधुत्वप्रकारक व्याकरणशास्त्रीयप्रयोजन का पूरक होगा । परिभाषेन्दुशेखर में आये हुए पारिभाषिक शब्द परिभाषेन्दुशेखर में आये हुए कुछ परिभाषिक शब्दों के अर्थ नीचे दिये गये हैं- यथोद्देश : यह शब्द 'यथोद्देशं संज्ञापरिभाषम्' इस दूसरी परिभाषा में आया है । यहाँ उद्देश शब्द का अर्थ सूत्रों का उपदेश-देश है और उस उपदेश-देश का अतिक्रमण न करना यथोद्देश कहा जाता है । कार्यकाल : यह शब्द 'कार्यकाल संज्ञापरिभाषम्' इस तीसरी परिभाषा में आया है। कार्यकाल शब्द का अर्थ है कार्य के द्वारा संज्ञा एवं परिभाषा सूत्रों का विधिदेश में ले आना। इसीलिए कहा जाता है कि कार्यकाल पक्ष में संज्ञा एवं परिभाषा सूत्रों का वाक्यार्थबोध विधिदेश में होता है। अनेकान्त : यह शब्द 'अनेकान्ता अनुबन्धाः ' इस परिभाषा में आया है । एकान्त शब्द का अर्थ अवयव होता है। अतः अनेकान्त का अर्थ अनवयव है । अनुबन्ध : व्याकरणशास्त्र में अनुबन्ध के दो अर्थ होते हैं। जिनकी "इत्' संज्ञा होती है वे अनुबन्ध कहे जाते हैं, अथवा जो इत् संज्ञा के योग्य होते हैं वे भी अनुबन्ध कहे जाते हैं। जैसे सन्, धन्, अंण् इत्यादि प्रत्ययों में क्रमशः 'न्, व् ण्' आदि वर्णों की 'इत्' संज्ञा 'हलन्त्यम्' सूत्र से होती है इसलिए ये अनुबन्ध कहे जाते हैं। अल् : यह शब्द प्रत्याहार होने से वर्णवाची है। क्योंकि इसके अन्तर्गत स्वर एवं व्यञ्जन उभयविध वर्णों का ग्रहण होता है। कार्यी : जिसके स्थान पर कोई कार्य किया जाय उसे कार्यी कहते हैं । जैसे इकार के स्थान पर यण् होता है। अतः इकार यण् का कार्यी है । निमित्त : जिसको पर में मानकर या जिससे पर में किसी के स्थान पर कोई कार्य किया जाय उसे निमित्त कहा जाता है। व्याकरणशास्त्र में निमित्त पद से सप्तम्यन्त तथा पञ्चम्यन्त दोनों प्रकार के पद लिये जाते हैं। जैसे- 'इको यणचि' इस सूत्र में 'अचि' यह सप्तम्यन्त पद निमित्त है। एवम् उद: स्वास्तम्भोः पूर्वस्य सूत्र में 'उद' यह पञ्चम्यन्त पद निमित्त है । आगम : आगम शब्द से यहाँ ऐसे वर्ण का ग्रहण होता है जो मित्र की भाँति किसी वर्ण के यहाँ आकर 'आद्यन्तौ टकितो' आदि शास्त्रों की सहायता से उसका अवयव बन जाता है। जैसे कुक्, टुक्, पुक् आदि । आदेश : जहाँ किसी को हटाकर कोई दूसरा उसकी जगह हो जाय उसे आदेश कहते हैं। जैसे- 'इकार' को 'यकार' आदेश 'हन्' को बधादेश आदि । निदिश्यमान : यह शब्द 'निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति' इस परिभाषा में आया है। 'निर्दिश्यमान' शब्द का अर्थ है कि षष्ठी की प्रकृति से जिसकी प्राथमिक उपस्थिति हो । यहाँ ध्यातव्य है कि किसी शब्द को सुनकर 'स्वरूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा' इस सूत्र से पहले उस शब्द स्वरूप की उपस्थिति होती है। उसके बाद 'येन विधिस्तदन्तस्य' इस शास्त्र की सहायता से तदन्त ( वह शब्द है अन्तावयव जिसका ऐसे समुदाय ) की उपस्थिति होती है। इन दोनों में प्राथमिक उपस्थिति का विषय जो होता है वहीं निर्दिश्यमान कहा जाता है। जैसे- 'जराया जरसन्यतरस्याम्' में जरा शब्द से पहले 'जरा' इस आनुपूर्वी की उपस्थिति होती है। बाद में तदन्त विधि के द्वारा जरा शब्दान्त 'निर्जर' की उपस्थिति होती है। किन्तु निर्दिश्यमान होने के कारण 'जर' शब्द के स्थान पर ही 'जरस्' आदेश होता है । आन्तर्य : आन्तर्य का अर्थ सादृश्य होता है। जो स्थानकृत, गुण-कृत, अर्थकृत, प्रमाणकृत भेद से चार प्रकार का माना गया है। ग्रहण : यह शब्द इस ग्रंथ में बार-बार आया है। इस शब्द के 'गृहते बोध्यते येन तद् ग्रहणम्' इस करण व्युत्पत्ति से ग्रहण शब्द का अर्थ बोधक ( ग्राहक ) होता है। यदि बाहुलकात् भाव अर्थ में 'ल्युट्' प्रत्यय किया जाय तो 'ग्रहणं बोधनम्' अर्थात् ग्रहण शब्द का अर्थ बोध होगा । जैसे- 'प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम्' इस परिभाषा में दो बार ग्रहण शब्द आया है । इसमें प्रथम ग्रहण शब्द करणसाधन है तथा दूसरा ग्रहण शब्द भावसाधन है। इसलिये परिभाषा का अर्थ इस प्रकार किया जाता है - प्रातिपदिकमात्रबोधक पदघटिते शास्त्रे लिङ्गबोधकप्रत्यय विशिष्टस्य ग्रहणम् ( बोधः ) भवति । भाव्यमान : इस शब्द का अर्थ विधीयमान होता है। विधीयमान का तात्पर्य है जो किसी के स्थान पर हो। जैसे 'त्यदादीनामः' सूत्र से त्यदादि शब्दों के अन्तिम वर्णों के स्थान पर जो अकार आदेश होता है उसे विधीयमान कहते हैं। वर्णाश्रय : जो कार्य किसी वर्ण को निमित्त मान कर होता है उसे वर्णाश्रय कार्य कहते हैं। जैसे- 'एचोऽयवायाव' इस सूत्र के विधेय अयादि वर्णाश्रय कार्य हैं। क्योंकि वे अच् वर्ण को परे मान कर होते हैं। तदादि : इस शब्द से प्रकृतिप्रत्यय विशिष्ट समुदाय का ग्रहण होता है। जैसे- राम शब्द से भ्याम् विभक्ति लाने पर 'राम +भ्याम् इतना विशिष्ट भाग तदादि कहा जायेगा। किन्तु भ्याम् को परे मान कर जब 'राम' इतने अंश की अंगसंज्ञा करनी होगी तो केवल 'राम' इतना अंश व्यपदेशिवद् भाव से तदादि कहा जायेगा। तदादि शब्द का अर्थ ही प्रत्ययान्त तदादि है । उपसर्जन : विशेषण या प्रकार को उपसर्जन कहते हैं। जहाँ कोई पदार्थ किसी अन्य पदार्थ में विशेषण हो जाता है उसे उपसर्जन कहते हैं। जैसे- 'प्रियास्त्रयो येषाम्' इस विग्रह में जो 'प्रियत्रि' शब्द बनता है, यहाँ अन्य के प्रति प्रिय और त्रि दोनों विशेषण हैं। अतः उक्त दोनों पद उपसर्जन हैं। व्यपदेशिवद्भाव : विशिष्ट अपदेश को व्यपदेश कहते हैं अपदेश का अर्थ व्यवहार होता है। अतः व्यपदेश का अर्थ मुख्य व्यवहार हुआ। जहाँ अमुख्य में मुख्य व्यवहार किया जाय उसे व्यपदेशिवदद्भाव कहते हैं । जहाँ 'अत इन्' सूत्र से अदन्त प्रातिपदिक से इन् प्रत्यय होता है वहाँ 'दक्ष' आदि प्रातिपदिक तो मुख्य अदन्त हैं किन्तु जहाँ केवल अकार से 'इज्' प्रत्यय किया जाता है वहाँ पर अकार में अदन्तत्व व्यपदेशिवद्भाव से लाया जाता है। यही अमुख्य में मुख्यवत् व्यवहार है। घटित एवं घटक : परिभाषाओं के व्याख्यान के प्रसंग में जो परिष्कार किये गये हैं उसमें ये दोनों घटित एवं घटक शब्द बार-बार प्रयुक्त हुए हैं। इनमें घटक का तात्पर्य किसी समुदाय के अवयव से हैं। जैसे 'राम' शब्द के चार घटक या अवयव हैं और राम शब्द इन चारों अवयवों से घटित है । क्योकि जो जिसका घटक होता है वह उससे घटित होता है। घटकता एवं घटितता में परस्पर निरूप्य निरूपकभावसम्बन्ध होता है। जो जिसका निरूपक होता है वह उससे निरूपित होता है। जैसे- 'रामनिष्ठ घटितता' का निरूपक रकार, आकार, मकार एवं अकार ये चारों वर्ण हैं। इसलिए 'रामनिष्ठ घटितता' इन चारों वर्णों में रहने वाली घटकता से निरूपित होती है। टीकाएँ यद्यपि परिभाषेन्दुशेखर की अनेक टीकाएँ सुनी जाती हैं तथापि 'भूति' एवं 'विजया' ये दो टीकाएँ विद्वत् समाज में प्रसिद्ध तथा पठन-पाठन में विशेष रूप से प्रचलित हैं। इसमें संदेह नहीं कि ये दोनों टीकाएँ उच्चकोटि की हैं और अपनी परिष्कृत शैली के लिये प्रसिद्ध हैं। इन टीकाओं के आधार पर यह बात दृढ़तापूर्वक कही जा सकती है कि इन टीकाओं के रचयिता संस्कृत जगत् के अपूर्व विद्वान् थे। उनकी सूक्ष्मेक्षिका ने परिभाषेन्दुशेखर की व्याख्या में जो विशेषता प्रस्तुत की है वह अपने में अनुपम है। एक समय था जब काशी में इन परिष्कारों की बड़ी धूम थी। सफल वैयाकरण वही माना जाता था जो इन परिष्कारों को पण्डित-सभा में प्रस्तुत करने में सक्षम होता था। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ परिभाषेन्दुशेखरः (संस्कृत विकिस्रोत) श्रेणी:संस्कृत व्याकरण श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ