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भगाणी नदी
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ज्ञानेंद्र रावत ऐसे बही भगाणी - तिलदह 2009 तरुण भारत संघ भीकमपुरा , किशोरी, थानागाजी - अलवरराजस्थान में अरावली पर्वत माला में स्थित सरिस्का की खूबसूरत और हरी-भरी ऊंची पहाड़ियों के बीच पत्थरों पर धारा प्रवाह सरकती हुई एक नदी है भगाणी। इसका उद्गम नौवीं सदी पुराने नीलकंठ मन्दिर और दसवीं सदी के गढ़-राजौर जैसे पुरातात्विक महत्व के स्थल व ऐतिहासिक महत्व के कांकवाडी किला जिसमें औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह को कैद करके रखा था, के समीप से माना जाता है।
गढ़ नीलकंठ में भगवान शिव और जैन तीर्थंकर के मन्दिर हैं। बताया जाता है कि यह मन्दिर खजुराहो के मंदिरों के समकालीन है।
यह नदी राजस्थान के अलवर जिले स्थित भानगढ़ किले से काफी नजदीक है |
भगाणी नदी राजस्थान के अलवर जिले की तहसील राजगढ़ के गांव गढ़, मांडलवास में शुरू होकर पूर्वोतर को घुमती हुई मानसरोवर बांध - अलवर को भरती है |
यह नदी अपने उद्गम से पहले पहाड़ के ऊपर स्थित पहाड़ियों के बीच में दक्षिण से उत्तर बहती है, जो राजस्थान की इकलौती ऐसी नदी है |
आज़ादी से पहले भगाणी नदी बारहमासी थी। परन्तु काफी समय से बारिश की मात्रा प्रदेश में काफी कम हो गयी है | फिर भी सन् 1985 से मार्च 2009 तक तरुण भारत संघ द्वारा जन-सहभागिता से कुल 122 जल-संरक्षण संरचनाओं (जोहड़ एव बांध ) का निर्माण हुआ है जो बारिश के पानी को काफी हद तक रोक कर धरती के पेट में भेजने में कारगर साबित हई है |https://www.patrika.com/alwar-news/rainwater-harvesting-system-in-mandalwas-2561376/ कभी अकाल से जूझा, आज एक गाँव पुरे देश को सुझा रहा जल संकट का समाधान सोनी अनिकेत पत्रिका २४ नवंबर 2018 https://web.archive.org/web/20181224221136/https://www.patrika.com/alwar-news/rainwater-harvesting-system-in-mandalwas-2561376/ 24 दिसंबर 2018 live
उद्गम स्थल : गढ़, मांडलवास
संगम स्थल : मल्लाणा गांव
जलागम क्षेत्र : २०९ किमी^2
लम्बाई (घुमाव सहित ): ५० किमी
उद्गम एव भोगोलिक स्थिति:
भगाणी नदी की एक प्रमुख धारा गढ़ (नीलकण्ठ) गांव के पश्चिमी पहाड़ के पश्चिमी भाग से शुरू होकर मांडलवास के भोमिया जी वाले बांध को भरती हुई तथा दूसरी तारागढ़ गांव से एक किलोमीटर उत्तर से शुरू होकर उत्तर की तरफ ही बहती हुई मांडलवास से थोड़ा आगे, एक जगह पर जाकर आपस में मिल जाती है। फिर उत्तर दिशा की तरफ ही बहती हुई यह संयुक्त धारा राजौर, मथुरावट, मान्याला व काण्यास तक जाकर फिर थोड़ा सा पूर्व की तरफ घुम जाती है। फिर नीचे दक्षिण में चौकीवाला की तरफ घूम कर मिसराला होती हुई यह नदी आगे मानसरोवर में जाकर गिर जाती है। मार्ग में इस नदी में बहत सारे छोटे-बड़े नाले आकर मिलते जाते हैं।
फिर यहां से आगे मल्लाणा गांव के पास इसमें जहाजवाली नदी भी आकर मिल जाती है। यहां से आगे इस संयुक्त नदी का नाम तिलदह नदी हो जाता है। यह नदी दक्षिण में तिलदह व रेवडियो बांधों को भर्ती हुई रेवडिया व नांगलदासा गांवों के बीच स्थित त्रिवेणी संगम पर 'सरसा नदी ' व 'अरवरी नदी ' की संयुक्त धारा में मिल कर 'साँवाँ नदी' का नाम ग्रहण कर लेती है। यह 'साँवाँ नदी' बांदीकुई के आगे बैजूपाड़ा में जाकर बाणगंगा में मिल जाती है। बाणगंगा को उतरन' (उटंगन) नदी के नाम से भी जाना जाता है। यही बाणगंगा आगे जाकर पहेले गम्भीर नदी में, गम्भीर नदी यमुना नदी में जाकर मिल जाती है। फिर यमुना नदी प्रयागराज (इलाहाबाद) में जाकर अन्ततः ‘राष्ट्रीय नदी गंगा' में समाहित हो जाती है। इससे आगे गंगा नदी अपने मूल नाम से ही बहती हुई अंत में 'गंगा सागर में विलीन होकर सागर-स्वरूप हो जाती है।
यह नदी सरिस्का के कोर व बफर जोन में बहती है।
इतिहास एव धार्मिक महत्व :
स्थानीय लोगों का कथन है कि राजौरगढ़ इलाका, जो की नदी का उद्गम स्थान है, पहले पारानगर कहलाता था जो बड़गूजर राजपूत राजाओं की राजधानी था।
यहां नीलकंठ के प्रसिद्ध मन्दिर में शिवलिंग के अलावा गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा है जिसके नीचे विक्रमी संवत् 1101 (सन् 1044) अंकित है। इस मन्दिर को बड़गूजर नरेश अजय पाल ने विक्रमी सम्वत् 1101 में बनवाया था। यह भी कहा आज़ादी से पहले यहां का जंगल अलवर रियासत में आता था और राजपरि की शिकारगाह था।
नीलकंठ महादेव का विशाल शिवलिंग एवं मन्दिर के स्तंभों पर पत्थर की खुदाई का कार्य भी देखते ही बनता है। यहां पर उत्खनन में हजारों मूर्तियाँ निकली हैं। लेकिन प्रत्येक मूर्ति कहीं ना कहीं से खण्डित जरूर है। खुदाई में पायी गयी सभी मूर्तियों का एक संग्रहालय भी बनाया गया है। कहा जाता है कि बादशाह औरंगजेब के शासन काल में इन मन्दिरों व मूर्तियों को खण्डित किया गया था।
औरंगजेब ने यहीं पर अपने कैद किये हुए भाई – दारा शिकोह को पीला पानी (सल्फर वाला पानी ) पिलाकर मार दिया था |
आर्थिक महत्त्व
इस नदी के जल को इस क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीण मुख्यतः कृषि एवं पशु पालन में प्रयोग करते हैं. यहां की मिट्टी दोमट व पथरीली है जो फसल व वृक्षारोपण के लिए बहुत उपयोगी है। यहाँ रबी की फसल में गेहूँ, जौ, सरसों व चना आदि होते हैं तथा खरीफ में मक्का, बाजरा, ज्वार, तिल आदि होते हैं। जायद में सब्जियाँ पैदा की जाती हैं। भूगर्भ स्थित जलप्राय वर्षा पर निर्भर है, लेकिन यदि वर्षा-जल को संरक्षित कर लिया जाता है, तो दो-तीन वर्ष के अकालों में भूजल की आपुर्ति करता रहता है ! इस नदी के जलागम क्षेत्र के लगभग सभी गांवों में जल संरक्षण के अच्छे काम हुए हैं।
सन्दर्भ :
श्रेणी:राजस्थान की नदियाँ