411 REFERENCE · Wikipedia
सत्यजित राय
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
SatyajitRay.jpg २ मई १९२१ कोलकाता, भारत २३ अप्रैल १९९२ कोलकाता, भारत फ़िल्म निर्देशक, लेखक बिजोय राय सुकुमार राय और सुप्रभा देवी सन्दीप राय
thumb|हिन्दी उच्चारण: सत्यजित राय
Satyajit Ray सत्यजित राय
भारत फ़िल्म
सत्यजित राय (बंगाली: SatyajitRay2.ogg সত্যজিৎ রায় शॉत्तोजित् राय्) (२ मई १९२१–२३ अप्रैल १९९२) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे, जिन्हें २०वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फ़िल्म निर्देशकों में गिना जाता है।Encyclopædia Britannica (एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका इन्कॉर्परेशन) Ray, Satyajit राय, सत्यजीत https://www.britannica.com/eb/article-9062818 १ अप्रैल २००७ en https://web.archive.org/web/20060621081502/https://www.britannica.com/eb/article-9062818 dead इनका जन्म कला और साहित्य के जगत में जाने-माने कोलकाता (तब कलकत्ता) के एक बंगाली परिवार में हुआ था। इनकी शिक्षा प्रेसिडेंसी कॉलेज और विश्व-भारती विश्वविद्यालय में हुई। इन्होंने अपने करियर की शुरूआत पेशेवर चित्रकार की तरह की। फ़्रांसिसी फ़िल्म निर्देशक ज्यां रेनुआ से मिलने पर, और लंदन में इतालवी फ़िल्म लाद्री दी बिसिक्लेत (Ladri di biciclette, बाइसिकल चोर) देखने के बाद, फ़िल्म निर्देशन की ओर इनका रुझान हुआ।
राय ने अपने जीवन में ३७ फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें फ़ीचर फ़िल्में, वृत्त चित्र और लघु फ़िल्में शामिल हैं। इनकी पहली फ़िल्म पथेर पांचाली (পথের পাঁচালী, पथ का गीत) को कान फ़िल्मोत्सव में मिले “सर्वोत्तम मानवीय प्रलेख” पुरस्कार को मिलाकर कुल ग्यारह अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले। यह फ़िल्म अपराजितो (অপরাজিত) और अपुर संसार (অপুর সংসার, अपु का संसार) के साथ इनकी प्रसिद्ध अपु त्रयी में शामिल है। राय फ़िल्म निर्माण से सम्बन्धित कई काम ख़ुद ही करते थे — पटकथा लिखना, अभिनेता ढूंढना, पार्श्व संगीत लिखना, चलचित्रण, कला निर्देशन, संपादन और प्रचार सामग्री की रचना करना। फ़िल्में बनाने के अतिरिक्त वे कहानीकार, प्रकाशक, चित्रकार और फ़िल्म आलोचक भी थे। राय को जीवन में कई पुरस्कार मिले, जिनमें अकादमी मानद पुरस्कार और भारत रत्न शामिल हैं।
जीवनी
प्रारम्भिक जीवन एवं शिक्षा
सत्यजित राय के वंश की कम से कम दस पीढ़ियों पहले तक की जानकारी मौजूद है।सेटन 1971 36 इनके दादा उपेन्द्रकिशोर राय चौधरी लेखक, चित्रकार, दार्शनिक, प्रकाशक और अपेशेवर खगोलशास्त्री थे। ये साथ ही ब्राह्म समाज के नेता भी थे। उपेन्द्रकिशोर के बेटे सुकुमार राय ने लकीर से हटकर बांग्ला में बेतुकी कविता लिखी। ये योग्य चित्रकार और आलोचक भी थे। सत्यजित राय, सुकुमार और सुप्रभा राय के बेटे थे। इनका जन्म कोलकाता में हुआ। जब सत्यजित केवल तीन वर्ष के थे तो इनके पिता चल बसे। इनके परिवार को सुप्रभा की मामूली तन्ख़्वाह पर गुज़ारा करना पड़ा। राय ने कोलकाता के प्रेसिडेन्सी कालेज से अर्थशास्त्र पढ़ा, लेकिन इनकी रुचि हमेशा ललित कलाओं में ही रही। १९४० में इनकी माता ने आग्रह किया कि ये गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में आगे पढ़ें। राय को कोलकाता का माहौल पसन्द था और शान्तिनिकेतन के बुद्धिजीवी जगत से ये खास प्रभावित नहीं थे।रॉबिनसन २००३ ४६ माता के आग्रह और ठाकुर के प्रति इनके आदर भाव की वजह से अन्ततः इन्होंने विश्व-भारती जाने का निश्चय किया। शान्तिनिकेतन में राय पूर्वी कला से बहुत प्रभावित हुए। बाद में इन्होंने स्वीकार किया कि प्रसिद्ध चित्रकार नन्दलाल बोससेटन १९७१ ७० और बिनोद बिहारी मुखर्जी से इन्होंने बहुत कुछ सीखा। मुखर्जी के जीवन पर इन्होंने बाद में एक वृत्तचित्र द इनर आई भी बनाया। अजन्ता, एलोरा और एलिफेंटा की गुफाओं को देखने के बाद ये भारतीय कला के प्रशंसक बन गए।सेटन १९७१ ७१–७२
चित्रकला
१९४३ में पाँच साल का कोर्स पूरा करने से पहले राय ने शान्तिनिकेतन छोड़ दिया और कोलकाता वापस आ गए जहाँ उन्होंने ब्रिटिश विज्ञापन अभिकरण, डी. जे. केमर, में नौकरी शुरू की। इनके पद का नाम “लघु द्रष्टा” (“junior visualiser”) था और महीने के केवल अस्सी रुपये का वेतन था। हालांकि दृष्टि रचना राय को बहुत पसन्द थी और उनके साथ अधिकतर अच्छा ही व्यवहार किया जाता था, लेकिन एजेंसी के ब्रिटिश और भारतीय कर्मियों के बीच कुछ खिंचाव रहता था क्योंकि ब्रिटिश कर्मियों को ज़्यादा वेतन मिलता था। साथ ही राय को लगता था कि “एजेंसी के ग्राहक प्रायः मूर्ख होते थे”।रॉबिनसन २००३ ५६–५८ १९४३ के लगभग ही ये डी. के. गुप्ता द्वारा स्थापित सिग्नेट प्रेस के साथ भी काम करने लगे। गुप्ता ने राय को प्रेस में छपने वाली नई किताबों के मुखपृष्ठ रचने को कहा और पूरी कलात्मक मुक्ति दी। राय ने बहुत सी किताबों के मुखपृष्ठ बनाए, जिनमें जिम कार्बेट की मैन-ईटर्स ऑफ़ कुमाऊँ (Man-eaters of Kumaon, कुमाऊँ के नरभक्षी) और जवाहर लाल नेहरु की द डिस्कवरी ऑव इंडिया (The Discovery of India, भारत की खोज) शामिल हैं। इन्होंने बांग्ला के जाने-माने उपन्यास पथेर पांचाली (পথের পাঁচালী, पथ का गीत) के बाल संस्करण पर भी काम किया, जिसका नाम था आम आँटिर भेँपु (আম আঁটির ভেঁপু, आम की गुठली की सीटी)। राय इस रचना से बहुत प्रभावित हुए और अपनी पहली फ़िल्म इसी उपन्यास पर बनाई। मुखपृष्ठ की रचना करने के साथ उन्होंने इस किताब के अन्दर के चित्र भी बनाये। इनमें से बहुत से चित्र उनकी फ़िल्म के दृश्यों में दृष्टिगोचर होते हैं।रॉबिनसन २००५ ३८
राय ने दो नए फ़ॉन्ट भी बनाए — “राय रोमन” और “राय बिज़ार”। राय रोमन को १९७० में एक अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पुरस्कार मिला। कोलकाता में राय एक कुशल चित्रकार माने जाते थे। राय अपनी पुस्तकों के चित्र और मुखपृष्ठ ख़ुद ही बनाते थे और फ़िल्मों के लिए प्रचार सामग्री की रचना भी ख़ुद ही करते थे।
फ़िल्म निर्देशन
१९४७ में चिदानन्द दासगुप्ता और अन्य लोगों के साथ मिलकर राय ने कलकत्ता फ़िल्म सभा शुरू की, जिसमें उन्हें कई विदेशी फ़िल्में देखने को मिलीं। इन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में कोलकाता में स्थापित अमरीकन सैनिकों से दोस्ती कर ली जो उन्हें शहर में दिखाई जा रही नई-नई फ़िल्मों के बारे में सूचना देते थे। १९४९ में राय ने दूर की रिश्तेदार और लम्बे समय से उनकी प्रियतमा बिजोय राय से विवाह किया। इनका एक बेटा हुआ, सन्दीप, जो अब ख़ुद फ़िल्म निर्देशक है। इसी साल फ़्रांसीसी फ़िल्म निर्देशक ज्यां रेनुआ कोलकाता में अपनी फ़िल्म की शूटिंग करने आए। राय ने देहात में उपयुक्त स्थान ढूँढने में रन्वार की मदद की। राय ने उन्हें पथेर पाँचाली पर फ़िल्म बनाने का अपना विचार बताया तो रन्वार ने उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित किया।रॉबिनसन २००५ ४२–४४ १९५० में डी. जे. केमर ने राय को एजेंसी के मुख्यालय लंदन भेजा। लंदन में बिताए तीन महीनों में राय ने ९९ फ़िल्में देखीं। इनमें शामिल थी, वित्तोरियो दे सीका की नवयथार्थवादी फ़िल्म लाद्री दी बिसिक्लेत्ते (Ladri di biciclette, बाइसिकल चोर) जिसने उन्हें अन्दर तक प्रभावित किया। राय ने बाद में कहा कि वे सिनेमा से बाहर आए तो फ़िल्म निर्देशक बनने के लिए दृढ़संकल्प थे।रॉबिनसन २००५ ४८
फ़िल्मों में मिली सफलता से राय का पारिवारिक जीवन में अधिक परिवर्तन नहीं आया। वे अपनी माँ और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ ही एक किराए के मकान में रहते रहे।रॉबिनसन २००३ ५ १९६० के दशक में राय ने जापान की यात्रा की और वहाँ जाने-माने फिल्म निर्देशक अकीरा कुरोसावा से मिले। भारत में भी वह अकसर शहर के भागम-भाग वाले माहौल से बचने के लिए दार्जीलिंग या पुरी जैसी जगहों पर जाकर एकान्त में कथानक पूरे करते थे।
बीमारी एवं निधन
१९८३ में फ़िल्म घरे बाइरे (ঘরে বাইরে) पर काम करते हुए राय को दिल का दौरा पड़ा जिससे उनके जीवन के बाकी ९ सालों में उनकी कार्य-क्षमता बहुत कम हो गई। घरे बाइरे का छायांकन राय के बेटे की मदद से १९८४ में पूरा हुआ। १९९२ में हृदय की दुर्बलता के कारण राय का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया, जिससे वह कभी उबर नहीं पाए। मृत्यु से कुछ ही हफ्ते पहले उन्हें सम्मानदायक अकादमी पुरस्कार दिया गया। २३ अप्रैल १९९२ को उनका देहान्त हो गया। इनकी मृत्यु होने पर कोलकाता शहर लगभग ठहर गया और हज़ारों लोग इनके घर पर इन्हें श्रद्धांजलि देने आए।http://www.doononline.net/pages/info_features/features_spotlights/spotlights/aghosh/ray.htm Satyajit Ray घोष अमिताभ डूम ऑनलाइन https://web.archive.org/web/20050404124235/http://doononline.net/pages/info_features/features_spotlights/spotlights/aghosh/ray.htm 4 अप्रैल 2005 १९ जून २००६ dead
फ़िल्में
सत्यजित राय की फ़िल्में
अपु के वर्ष (१९५०–५८)
राय ने निश्चय कर रखा था कि उनकी पहली फ़िल्म बांग्ला साहित्य की प्रसिद्ध बिल्डुंग्सरोमान पथेर पांचाली पर आधारित होगी, जिसे बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय ने १९२८ में लिखा था। इस अर्ध-आत्मकथात्मक उपन्यास में एक बंगाली गाँव के लड़के अपु के बड़े होने की कहानी है। राय ने लंदन से भारत लौटते हुए समुद्रयात्रा के दौरान इस फ़िल्म की रूपरेखा तैयार की। भारत पहुँचने पर राय ने एक कर्मीदल एकत्रित किया जिसमें कैमरामन सुब्रत मित्र और कला निर्देशक बंसी चन्द्रगुप्ता के अलावा किसी को फ़िल्मों का अनुभव नहीं था। अभिनेता भी लगभग सभी गैरपेशेवर थे। फ़िल्म का छायांकन १९५२ में शुरू हुआ। राय ने अपनी जमापूंजी इस फ़िल्म में लगा दी, इस आशा में कि पहले कुछ शॉट लेने पर कहीं से पैसा मिल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पथेर पांचाली का छायांकन तीन वर्ष के लम्बे समय में हुआ — जब भी राय या निर्माण प्रबंधक अनिल चौधरी कहीं से पैसों का जुगाड़ कर पाते थे, तभी छायांकन हो पाता था। राय ने ऐसे स्रोतों से धन लेने से मना कर दिया जो कथानक में परिवर्तन कराना चाहते थे या फ़िल्म निर्माता का निरीक्षण करना चाहते थे। १९५५ में पश्चिम बंगाल सरकार ने फ़िल्म के लिए कुछ ऋण दिया जिससे आखिरकार फ़िल्म पूरी हुई। सरकार ने भी फ़िल्म में कुछ बदलाव कराने चाहे (वे चाहते थे कि अपु और उसका परिवार एक “विकास परियोजना” में शामिल हों और फ़िल्म सुखान्त हो) लेकिन सत्यजित राय ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया।सेटन १९७१ ९५
पथेर पांचाली १९५५ में प्रदर्शित हुई और बहुत लोकप्रिय रही। भारत और अन्य देशों में भी यह लम्बे समय तक सिनेमा में लगी रही। भारत के आलोचकों ने इसे बहुत सराहा। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा — “इसकी किसी और भारतीय सिनेमा से तुलना करना निरर्थक है। [...] पथेर पांचाली तो शुद्ध सिनेमा है।”सेटन १९७१ ११२–१५ अमरीका में लिंडसी एंडरसन ने फ़िल्म के बारे में बहुत अच्छी समीक्षा लिखी। लेकिन सभी आलोचक फ़िल्म के बारे में इतने उत्साहित नहीं थे। फ़्राँस्वा त्रुफ़ो ने कहा — “गंवारों को हाथ से खाना खाते हुए दिखाने वाली फ़िल्म मुझे नहीं देखनी।”http://www.telegraphindia.com/1050420/asp/calcutta/story_4634530.asp Filmi Funda Pather Panchali (1955) २० अप्रैल २००५ २९ अप्रैल २००७ https://web.archive.org/web/20131203012826/http://www.telegraphindia.com/1050420/asp/calcutta/story_4634530.asp 3 दिसंबर 2013 द टेलिग्रैफ़ live न्यू यॉर्क टाइम्स के प्रभावशाली आलोचक बॉज़्ली क्राउथर ने भी पथेर पांचाली के बारे में बहुत बुरी समीक्षा लिखी। इसके बावजूद यह फ़िल्म अमरीका में बहुत समय तक चली।
राय की अगली फ़िल्म अपराजितो की सफलता के बाद इनका अन्तरराष्ट्रीय करियर पूरे ज़ोर-शोर से शुरू हो गया। इस फ़िल्म में एक नवयुवक (अपु) और उसकी माँ की आकांक्षाओं के बीच अक्सर होने वाले खिंचाव को दिखाया गया है। मृणाल सेन और ऋत्विक घटक सहित कई आलोचक इसे पहली फ़िल्म से बेहतर मानते हैं। अपराजितो को वेनिस फ़िल्मोत्सव में स्वर्ण सिंह (Golden Lion, गोल्डन लायन) से पुरस्कृत किया गया। अपु त्रयी पूरी करने से पहले राय ने दो और फ़िल्में बनाईं — हास्यप्रद पारश पत्थर और ज़मींदारों के पतन पर आधारित जलसाघर। जलसाघर को इनकी सबसे महत्त्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है।https://www.theguardian.com/film/1999/jan/14/derekmalcolmscenturyoffilm.derekmalcolm Satyajit Ray: The Music Room सत्यजीत राय: संगीत कक्ष मैल्कम डेरेक 1999-01-14 द गार्डियन 2024-06-23 en-GB 0261-3077
अपराजितो बनाते हुए राय ने त्रयी बनाने का विचार नहीं किया था, लेकिन वेनिस में उठे एक प्रश्न के बाद उन्हें यह विचार अच्छा लगा।वुड १९७२ ६१ इस शृंखला की अन्तिम कड़ी अपुर संसार १९५९ में बनी। राय ने इस फ़िल्म में दो नए अभिनेताओं, सौमित्र चटर्जी और शर्मिला टैगोर, को मौका दिया। इस फ़िल्म में अपु कोलकाता के एक साधारण मकान में गरीबी में रहता है और अपर्णा के साथ विवाह कर लेता है, जिसके बाद इन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पिछली दो फ़िल्मों की तरह ही कुछ आलोचक इसे त्रयी की सबसे बढ़िया फ़िल्म मानते हैं (राबिन वुड और अपर्णा सेन)।वुड १९७२ जब एक बंगाली आलोचक ने अपुर संसार की कठोर आलोचना की तो राय ने इसके प्रत्युत्तर में एक लम्बा लेख लिखा।राय नेराय १९९३ १३ में इसका वर्णन किया है।
देवी से चारुलता तक (1959–64)
इस अवधि में राय ने कई विषयों पर फ़िल्में बनाईं, जिनमें शामिल हैं, ब्रिटिश काल पर आधारित देवी (দেবী), रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर एक वृत्तचित्र, हास्यप्रद फ़िल्म महापुरुष (মহাপুরুষ) और मौलिक कथानक पर आधारित इनकी पहली फ़िल्म कंचनजंघा (কাঞ্চনজঙ্ঘা)। इसी दौरान इन्होने कई ऐसी फ़िल्में बनाईं, जिन्हें साथ मिलाकर भारतीय सिनेमा में स्त्रियों का सबसे गहरा चित्रांकन माना जाता है।http://www.metroactive.com/papers/cruz/10.08.03/apu-0341.html Ghost 'World' पालोपोली एस मेट्रोऐक्टिव.कॉम https://web.archive.org/web/20060518064750/http://www.metroactive.com/papers/cruz/10.08.03/apu-0341.html 18 मई 2006 १९ जून २००६ live
अपुर संसार के बाद राय की पहली फ़िल्म थी देवी, जिसमें इन्होंने हिन्दू समाज में अंधविश्वास के विषय को टटोला है। शर्मिला टैगोर ने इस फ़िल्म के मुख्य पात्र दयामयी की भूमिका निभाई, जिसे उसके ससुर काली का अवतार मानते हैं। राय को चिन्ता थी कि इस फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से शायद स्वीकृति नहीं मिले, या उन्हे कुछ दृश्य काटने पड़ें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1961 में प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु के आग्रह पर राय ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जन्म शताब्दी के अवसर पर उनके जीवन पर एक वृत्तचित्र बनाया। ठाकुर के जीवन का फ़िल्मांकन बहुत कम ही हुआ था, इसलिए राय को मुख्यतः स्थिर चित्रों का प्रयोग करना पड़ा, जिसमें उनके अनुसार तीन फ़ीचर फ़िल्मों जितना परिश्रम हुआ।रॉबिनसन 2003 277 इसी साल में राय ने सुभाष मुखोपाध्याय और अन्य लेखकों के साथ मिलकर बच्चों की पत्रिका सन्देश को पुनर्जीवित किया। इस पत्रिका की शुरूआत इनके दादा ने शुरू की थी और बहुत समय से राय इसके लिए धन जमा करते आ रहे थे।सेटन 1971 189 सन्देश का बांग्ला में दोतरफा मतलब है — एक ख़बर और दूसरा मिठाई। पत्रिका को इसी मूल विचार पर बनाया गया — शिक्षा के साथ-साथ मनोरंजन। राय शीघ्र ही ख़ुद पत्रिका में चित्र बनाने लगे और बच्चों के लिये कहानियाँ और निबन्ध लिखने लगे। आने वाले वर्षों में लेखन इनकी जीविका का प्रमुख साधन बन गया।
1962 में राय ने काँचनजंघा का निर्देशन किया, जिसमें पहली बार इन्होंने मौलिक कथानक पर रंगीन छायांकन किया। इस फ़िल्म में एक उच्च वर्ग के परिवार की कहानी है जो दार्जीलिंग में एक दोपहर बिताते हैं और प्रयास करते हैं कि सबसे छोटी बेटी का विवाह लंदन में पढ़े एक कमाऊ इंजीनियर के साथ हो जाए। शुरू में इस फ़िल्म को एक विशाल हवेली में चित्रांकन करने का विचार था, लेकिन बाद में राय ने निर्णय किया कि दार्जीलिंग के वातावरण और प्रकाश व धुंध के खेल का प्रयोग करके कथानक के खिंचाव को प्रदर्शित किया जाए। राय ने हंसी में एक बार कहा कि उनकी फ़िल्म का छायांकन किसी भी रोशनी में हो सकता था, लेकिन उसी समय दार्जीलिंग में मौजूद एक व्यावसायिक फ़िल्म दल एक भी दृश्य नहीं शूट कर पाया क्योंकि उन्होने केवल धूप में ही शूटिंग करनी थी।रॉबिनसन 2003 142
1964 में राय ने चारुलता (চারুলতা) फ़िल्म बनाई जिसे बहुत से आलोचक इनकी सबसे निष्णात फ़िल्म मानते है।रॉबिनसन 2003 157 यह ठाकुर की लघुकथा नष्टनीड़ पर आधारित है। इसमें 19वीं शताब्दी की एक अकेली स्त्री की कहानी है जिसे अपने देवर अमल से प्रेम होने लगता है। इसे राय की सर्वोत्कृष्ट कृति माना जाता है। राय ने ख़ुद कहा कि इसमें सबसे कम खामियाँ हैं और यही एक फ़िल्म है जिसे वे मौका मिलने पर बिलकुल इसी तरह दोबारा बनाएंगे।http://www.slantmagazine.com/film/film_review.asp?ID=1080 Charulata ऐंटनी जे स्लांट मैगज़ीन https://web.archive.org/web/20060908172455/http://www.slantmagazine.com/film/film_review.asp?ID=1080 8 सितंबर 2006 १९ जून २००६ live चारु के रूप में माधवी मुखर्जी के अभिनय और सुब्रत मित्र और बंसी चन्द्रगुप्ता के काम को बहुत सराहा गया है। इस काल की अन्य फ़िल्में हैं: महानगर, तीन कन्या, अभियान, कापुरुष (कायर) और महापुरुष।
नई दिशाएँ (1965-1982)
चारुलता के बाद के काल में राय ने विविध विषयों पर आधारित फ़िल्में बनाईं, जिनमें शामिल हैं, कल्पनाकथाएँ, विज्ञानकथाएँ, गुप्तचर कथाएँ और ऐतिहासिक नाटक। राय ने फ़िल्मों में नयी तकनीकों पर प्रयोग करना और भारत के समकालीन विषयों पर ध्यान देना शुरू किया। इस काल की पहली मुख्य फ़िल्म थी नायक (নায়ক), जिसमें एक फ़िल्म अभिनेता (उत्तम कुमार) रेल में सफर करते हुए एक महिला पत्रकार (शर्मिला टैगोर) से मिलता है। 24 घंटे की घटनाओं पर आधारित इस फ़िल्म में इस प्रसिद्ध अभिनेता के मनोविज्ञान का अन्वेषण किया गया है। बर्लिन में इस फ़िल्म को आलोचक पुरस्कार मिला, लेकिन अन्य प्रतिक्रियाएँ अधिक उत्साहपूर्ण नहीं रहीं।दासगुप्त 1996 91
1967 में राय ने एक फ़िल्म का कथानक लिखा, जिसका नाम होना था द एलियन (The Alien, दूरग्रहवासी)। यह इनकी लघुकथा बाँकुबाबुर बंधु (বাঁকুবাবুর বন্ধু, बाँकु बाबु का दोस्त) पर आधारित थी जिसे इन्होंने सन्देश (সন্দেশ) पत्रिका के लिए 1962 में लिखा था। इस अमरीका-भारत सह-निर्माण परियोजना की निर्माता कोलम्बिया पिक्चर्स नामक कम्पनी थी। पीटर सेलर्स और मार्लन ब्रैंडो को इसकी मुख्य भूमिकाओं के लिए चुना गया। राय को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उनके कथानक के प्रकाशनाधिकार को किसी और ने हड़प लिया था। ब्रैंडो बाद में इस परियोजना से निकल गए और राय का भी इस फ़िल्म से मोह-भंग हो गया।सत्यजित राय सोसायटी http://www.worldofray.com/raysfilmography/unmaderay.aspx The Unmade Ray ४ नवंबर २००६ https://web.archive.org/web/20061108060113/http://www.worldofray.com/raysfilmography/unmaderay.aspx 8 नवंबर 2006 dead कोलम्बिया ने 1970 और 80 के दशकों में कई बार इस परियोजना को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया लेकिन बात कभी आगे नहीं बढ़ी। राय ने इस परियोजना की असफलता के कारण 1980 के एक साइट एण्ड साउंड (Sight & Sound) प्रारूप में गिनाए हैं और अन्य विवरण इनके आधिकारिक जीवनी लेखक एंड्रू रॉबिनसन ने दि इनर आई (The Inner Eye, अन्तर्दृष्टि) में दिये हैं। जब 1982 में ई.टी. फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो राय ने अपने कथानक और इस फ़िल्म में कई समानताएँ देखीं। राय का विश्वास था कि स्टीवन स्पीलबर्ग की यह फ़िल्म उनके कथानक के बिना सम्भव नहीं थी (हालांकि स्पीलबर्ग इसका खण्डन करते हैं)।http://www.ucsc.edu/currents/01-02/09-17/ray.html Satyajit Ray Collection receives Packard grant and lecture endowment न्यूमैन जे १७ सितम्बर २००१ 29 अप्रैल 2006 https://web.archive.org/web/20051104203511/http://www.ucsc.edu/currents/01-02/09-17/ray.html 4 नवंबर 2005 यूसी सांता क्रूज़ करेंट्स ऑनलाइन dead
1969 में राय ने व्यावसायिक रूप से अपनी सबसे सफल फ़िल्म बनाई — गुपी गाइन बाघा बाइन (গুপি গাইন বাঘা বাইন, गुपी गाए बाघा बजाए)। यह संगीतमय फ़िल्म इनके दादा द्वारा लिखी एक कहानी पर आधारित है। गायक गूपी और ढोली बाघा को भूतों का राजा तीन वरदान देता है, जिनकी मदद से वे दो पड़ोसी देशों में होने वाले युद्ध को रोकते हैं। यह राय के सबसे खर्चीले उद्यमों में से थी और इसके लिए पूंजी बहुत मुश्किल से मिली। राय को आखिरकार इसे रंगीन बनाने का विचार त्यागना पड़ा।सेटन 1971 291-297 राय की अगली फ़िल्म थी अरण्येर दिनरात्रि (অরণ্যের দিনরাত্রি, जंगल में दिन-रात), जिसकी संगीत-संरचना चारुलता से भी जटिल मानी जाती है।वुड 1972 13 इसमें चार ऐसे नवयुवकों की कहानी है जो छुट्टी मनाने जंगल में जाते हैं। इसमें सिमी गरेवाल ने एक जंगली जाति की औरत की भूमिका निभाई है। आलोचक इसे भारतीय मध्यम वर्ग की मानसिकता की छवि मानते हैं।
इसके बाद राय ने समसामयिक बंगाली वास्तविकता पर ध्यान देना शुरू किया। बंगाल में उस समय नक्सलवादी क्रांति जोर पकड़ रही थी। ऐसे समय में नवयुवकों की मानसिकता को लेकर इन्होंने कलकत्ता त्रयी के नाम से जाने वाली तीन फ़िल्में बनाईं — प्रतिद्वंद्वी (প্রতিদ্বন্দ্বী) (1970), सीमाबद्ध (সীমাবদ্ধ) (1971) और जनअरण्य (জনঅরণ্য) (1975)। इन तीनों फ़िल्मों की कल्पना अलग-अलग हुई लेकिन इनके विषय साथ मिलाकर एक त्रयी का रूप लेते हैं। प्रतिद्वंद्वी एक आदर्शवादी नवयुवक की कहानी है जो समाज से मोह-भंग होने पर भी अपने आदर्श नहीं त्यागता है। इसमें राय ने कथा-वर्णन की एक नयी शैली अपनाई, जिसमें इन्होंने नेगेटिव में दृश्य, स्वप्न दृश्य और आकस्मिक फ़्लैश-बैक का उपयोग किया। जनअरण्य फ़िल्म में एक नवयुवक की कहानी है जो जीविका कमाने के लिए भ्रष्ट राहों पर चलने लगता है। सीमाबद्ध में एक सफल युवक अधिक धन कमाने के लिए अपनी नैतिकता छोड़ देता है। राय ने 1970 के दशक में अपनी दो लोकप्रिय कहानियों — सोनार केल्ला (সোনার কেল্লা, स्वर्ण किला) और जॉय बाबा फेलुनाथ (জয় বাবা ফেলুনাথ) — का फ़िल्मांकन किया। दोनों फ़िल्में बच्चों और बड़ों दोनों में बहुत लोकप्रिय रहीं।रशदी 1992
राय ने बांग्लादेश मुक्ति युद्ध पर भी एक फ़िल्म बनाने की सोची, लेकिन बाद में यह विचार त्याग दिया क्योंकि उन्हें राजनीति से अधिक शरणार्थियों के पलायन और हालत को समझने में अधिक रुचि थी।रॉबिनसन 2003 206 1977 में राय ने मुंशी प्रेमचन्द की कहानी पर आधारित शतरंज के खिलाड़ी फ़िल्म बनाई। यह उर्दू भाषा की फ़िल्म 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक वर्ष पहले अवध राज्य में लखनऊ शहर में केन्द्रित है। इसमें भारत के गुलाम बनने के कारणों पर प्रकाश डाला गया है। इसमें बॉलीवुड के बहुत से सितारों ने काम किया, जिनमें प्रमुख हैं — संजीव कुमार, सईद जाफ़री, अमजद ख़ान, शबाना आज़मी, विक्टर बैनर्जी और रिचर्ड एटनबरो। 1980 में राय ने गुपी गाइन बाघा बाइन की कहानी को आगे बढ़ाते हुए हीरक राज नामक फ़िल्म बनाई जिसमें हीरे के राजा का राज्य इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान के भारत की ओर इंगित करता है।रॉबिनसन 2003 188-189 इस काल की दो अन्य फ़िल्में थी — लघु फ़िल्म पिकूर डायरी (पिकू की दैनन्दिनी) या पिकु और घंटे-भर लम्बी हिन्दी फ़िल्म सदगति।
अन्तिम काल (1983–1992)
राय बहुत समय से ठाकुर के उपन्यास घरे बाइरे पर आधारित फ़िल्म बनाने की सोच रहे थे।रॉबिनसन 2003 66-67 बीमारी की वजह से इसमें कुछ भाग उत्कृष्ट नहीं हैं, लेकिन फ़िल्म को सराहना बहुत मिली। 1987 में उन्होंने अपने पिता सुकुमार राय के जीवन पर एक वृत्तचित्र बनाया।
राय की आखिरी तीन फ़िल्में उनकी बीमारी के कारण मुख्यतः आन्तरिक स्थानों में शूट हुईं और इस कारण से एक विशिष्ट शैली का अनुसरण करती हैं। इनमें संवाद अधिक है और इन्हें राय की बाकी फ़िल्मों से निम्न श्रेणी में रखा जाता है। इनमें से पहली, गणशत्रु (গণশত্রু), हेनरिक इबसन के प्रख्यात नाटक ऐन एनिमी ऑव द पीपल पर आधारित है और इन तीनों में से सबसे कमज़ोर मानी जाती है।दासगुप्त 1996 134 1990 की फ़िल्म शाखा प्रशाखा (শাখা প্রশাখা) में राय ने अपनी पुरानी गुणवत्ता कुछ वापिस प्राप्त की।रॉबिनसन 2003 353 इसमें एक बूढ़े आदमी की कहानी है, जिसने अपना पूरा जीवन ईमानदारी से बिताया होता है, लेकिन अपने तीन बेटों के भ्रष्ट आचरण का पता लगने पर उसे केवल अपने चौथे, मानसिक रूप से बीमार, बेटे की संगत रास आती है। राय की अन्तिम फ़िल्म आगन्तुक (আগন্তুক) का माहौल हल्का है लेकिन विषय बहुत गूढ़ है। इसमें एक भूला-बिसरा मामा अपनी भांजी से अचानक मिलने आ पहुँचता है, तो उसके आने के वास्तविक कारण पर शंका की जाने लगती है।
फ़िल्म कौशल
सत्यजित राय मानते थे कि कथानक लिखना निर्देशन का अभिन्न अंग है। यह एक कारण है जिसकी वजह से उन्होंने प्रारम्भ में बांग्ला के अतिरिक्त किसी भी भाषा में फ़िल्म नहीं बनाई। अन्य भाषाओं में बनी इनकी दोनों फ़िल्मों के लिए इन्होंने पहले अंग्रेज़ी में कथानक लिखा, जिसे इनके पर्यवेक्षण में अनुवादकों ने हिन्दी या उर्दू में भाषांतरित किया। राय के कला निर्देशक बंसी चन्द्रगुप्ता की दृष्टि भी राय की तरह ही पैनी थी। शुरूआती फ़िल्मों पर इनका प्रभाव इतना महत्त्वपूर्ण था कि राय कथानक पहले अंग्रेज़ी में लिखते थे ताकि बांग्ला न जानने वाले चन्द्रगुप्ता उसे समझ सकें। शुरूआती फ़िल्मों के छायांकन में सुब्रत मित्र का कार्य बहुत सराहा जाता है और आलोचक मानते हैं कि अनबन होने के बाद जब मित्र चले गए तो राय की फ़िल्मों के चित्रांकन का स्तर घट गया। राय ने मित्र की बहुत प्रशंसा की, लेकिन राय इतनी एकाग्रता से फिल्में बनाते थे कि चारुलता के बाद से राय कैमरा ख़ुद ही चलाने लगे, जिसके कारण मित्र ने 1966 से राय के लिए काम करना बंद कर दिया। मित्र ने बाउंस-प्रकाश का सर्वप्रथम प्रयोग किया जिसमें वे प्रकाश को कपड़े पर से उछाल कर वास्तविक प्रतीत होने वाला प्रकाश रच लेते थे। राय ने अपने को फ़्रांसीसी नव तरंग के ज़ाँ-लुक गॉदार और फ़्रांस्वा त्रूफ़ो का भी ऋणी मानते थे, जिनके नए तकनीकी और सिनेमा प्रयोगों का उपयोग राय ने अपनी फ़िल्मों में किया।http://www.parabaas.com/satyajit/articles/pAbhijit.html Western Influences on Satyajit Ray सेन ए परबास https://web.archive.org/web/20060512013036/http://parabaas.com//satyajit/articles/pAbhijit.html 12 मई 2006 २९ अप्रैल २००६ live
हालांकि दुलाल दत्ता राय के नियमित फ़िल्म संपादक थे, राय अक्सर संपादन के निर्णय ख़ुद ही लेते थे और दत्ता बाकी काम करते थे। वास्तव में आर्थिक कारणों से और राय के कुशल नियोजन से संपादन अक्सर कैमरे पर ही हो जाता था। शुरू में राय ने अपनी फ़िल्मों के संगीत के लिए लिए रवि शंकर, विलायत ख़ाँ और अली अक़बर ख़ाँ जैसे भारतीय शास्त्रीय संगीतज्ञों के साथ काम किया, लेकिन राय को लगने लगा कि इन संगीतज्ञों को फ़िल्म की अपेक्षा संगीत की साधना में अधिक रुचि है।रॉबिनसन 2003 315-318 साथ ही राय को पाश्चात्य संगीत का भी ज्ञान था जिसका प्रयोग वह फ़िल्मों में करना चाहते थे। इन कारणों से तीन कन्या (তিন কন্যা) के बाद से फ़िल्मों का संगीत भी राय ख़ुद ही रचने लगे। राय ने विभिन्न पृष्ठभूमि वाले अभिनेताओं के साथ काम किया, जिनमें से कुछ विख्यात सितारे थे, तो कुछ ने कभी फ़िल्म देखी तक नहीं थी।राय 1994 100 राय को बच्चों के अभिनय के निर्देशन के लिए बहुत सराहा गया है, विशेषत: अपु एवं दुर्गा (पाथेर पांचाली), रतन (पोस्टमास्टर) और मुकुल (सोनार केल्ला)। अभिनेता के कौशल और अनुभव के अनुसार राय का निर्देशन कभी न के बराबर होता था (आगन्तुक में उत्पल दत्त) तो कभी वे अभिनेताओं को कठपुतलियों की तरह प्रयोग करते थे (अपर्णा की भूमिका में शर्मिला टैगोर)।रॉबिनसन 2003 307
समीक्षा एवं प्रतिक्रिया
राय की कृतियों को मानवता और समष्टि से ओत-प्रोत कहा गया है। इनमें बाहरी सरलता के पीछे अक्सर गहरी जटिलता छिपी होती है।http://film.guardian.co.uk/features/featurepages/0,4120,708691,00.html The universe in his backyard मैल्कम डी गार्डियन https://web.archive.org/web/20061208234417/http://film.guardian.co.uk/features/featurepages/0,4120,708691,00.html 8 दिसंबर 2006 15 फरवरी 2007 livehttp://satyajitray.ucsc.edu/articles/sragow.html An Art Wedded to Truth स्वाग्रो एम दि अटलैंटिक मंथली https://web.archive.org/web/20090412212046/http://satyajitray.ucsc.edu/articles/sragow.html 12 अप्रैल 2009 15 फरवरी 2007 dead इनकी कृतियों को अन्यान्य शब्दों में सराहा गया है। अकिरा कुरोसावा ने कहा, “राय का सिनेमा न देखना इस जगत में सूर्य या चन्द्रमा को देखे बिना रहने के समान है।” आलोचकों ने इनकी कृतियों को अन्य कई कलाकारों से तुलना की है — आंतोन चेखव, ज्यां रेनुआ, वित्तोरियो दे सिका, हावर्ड हॉक्स, मोत्सार्ट, यहाँ तक कि शेक्सपियर के समतुल्य पाया गया है।वुड 1972http://rogerebert.suntimes.com/apps/pbcs.dll/article?AID=/19990117/REVIEWS08/401010342/1023 The Music Room (1958) एबर्ट आर सनटाइम्स.कॉम https://web.archive.org/web/20051226145349/http://rogerebert.suntimes.com/apps/pbcs.dll/article?AID=%2F19990117%2FREVIEWS08%2F401010342%2F1023 26 दिसंबर 2005 २९ अप्रैल २००६ live नाइपॉल ने शतरंज के खिलाड़ी के एक दृश्य की तुलना शेक्सपियर के नाटकों से की है – “केवल तीन सौ शब्द बोले गए, लेकिन इतने में ही अद्भुत घटनाएँ हो गईं!”रॉबिनसन 2003 246 जिन आलोचकों को राय की फ़िल्में सुरुचिपूर्ण नहीं लगतीं, वे भी मानते हैं कि राय एक सम्पूर्ण संस्कृति की छवि फ़िल्म पर उतारने में अद्वितीय थे।रॉबिनसन 2005 13-14
राय की आलोचना मुख्यतः इनकी फ़िल्मों की गति को लेकर की जाती है। आलोचक कहते हैं कि ये एक “राजसी घोंघे” की गति से चलती हैं। राय ने ख़ुद माना कि वे इस गति के बारे में कुछ नहीं कर सकते, लेकिन कुरोसावा ने इनका पक्ष लेते हुए कहा, “इन्हें धीमा नहीं कहा जा सकता। ये तो विशाल नदी की तरह शान्ति से बहती हैं।” इसके अतिरिक्त कुछ आलोचक इनकी मानवता को सादा और इनके कार्यों को आधुनिकता-विरोधी मानते हैं और कहते हैं कि इनकी फ़िल्मों में अभिव्यक्ति की नई शैलियाँ नहीं नज़र आती हैं। वे कहते हैं कि राय “मान लेते हैं कि दर्शक ऐसी फ़िल्म में रुचि रखेंगे जो केवल चरित्रों पर केन्द्रित रहती है, बजाए ऐसी फ़िल्म के जो उनके जीवन में नए मोड़ लाती है।”रॉबिनसन 2003 352-353
राय की आलोचना समाजवादी विचारधाराओं के राजनेताओं ने भी की है। इनके अनुसार राय पिछड़े समुदायों के लोगों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध नहीं थे, बल्कि अपनी फ़िल्मों में गरीबी का सौन्दर्यीकरण करते थे। ये अपनी कहानियों में द्वन्द्व और संघर्ष को सुलझाने के तरीके भी नहीं सुझाते थे। 1960 के दशक में राय और मृणाल सेन के बीच एक सार्वजनिक बहस हुई। मृणाल सेन स्पष्ट रूप से मार्क्सवादी थे और उनके अनुसार राय ने उत्तम कुमार जैसे प्रसिद्ध अभिनेता के साथ फ़िल्म बनाकर अपने आदर्शों के साथ समझौता किया। राय ने पलटकर जवाब दिया कि सेन अपनी फ़िल्मों में केवल बंगाली मध्यम वर्ग को ही निशाना बनाते हैं क्योंकि इस वर्ग की आलोचना करना आसान है। 1980 में सांसद एवं अभिनेत्री नरगिस ने राय की खुलकर आलोचना की कि ये “गरीबी की निर्यात” कर रहे हैं और इनसे माँग की कि ये आधुनिक भारत को दर्शाती हुई फ़िल्में बनाएँ।रॉबिनसन 2003 327-328
साहित्यिक कृतियाँ
सत्यजित राय की साहित्यिक कृतियाँ
thumb|सत्यजित राय की कहानियों के संकलन का मुखपृष्ठ|right
राय ने बांग्ला भाषा के बाल-साहित्य में दो लोकप्रिय चरित्रों की रचना की — गुप्तचर फेलुदा (ফেলুদা) और वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर शंकु। इन्होंने कई लघु-कथाएँ भी लिखीं, जो बारह-बारह कहानियों के संकलन में प्रकाशित होती थीं और सदा उनके नाम में बारह से संबंधित शब्दों का खेल रहता था। उदाहरण के लिए एकेर पिठे दुइ (একের পিঠে দুই, एक के ऊपर दो)। राय को पहेलियों और बहुअर्थी शब्दों के खेल से बहुत प्रेम था। इसे इनकी कहानियों में भी देखा जा सकता है – फेलुदा को अक्सर मामले की तह तक जाने के लिए पहेलियाँ सुलझानी पड़ती हैं। शर्लक होम्स और डॉक्टर वाॅटसन की तरह फेलुदा की कहानियों का वर्णन उसका चचेरा भाई तोपसे करता है। प्रफ़ेसर शंकु की विज्ञानकथाएँ एक दैनन्दिनी के रूप में हैं जो शंकु के अचानक गायब हो जाने के बाद मिलती है। राय ने इन कहानियों में अज्ञात और रोमांचक तत्वों को भीतर तक टटोला है, जो उनकी फ़िल्मों में नहीं देखने को मिलता है।नन्दी 1995 इनकी लगभग सभी कहानियाँ हिन्दी, अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।
राय के लगभग सभी कथानक भी बांग्ला भाषा में साहित्यिक पत्रिका एकशान (একশান) में प्रकाशित हो चुके हैं। राय ने 1982 में आत्मकथा लिखी जखन छोटो छिलम (जब मैं छोटा था)। इसके अतिरिक्त इन्होंने फ़िल्मों के विषय पर कई पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें से प्रमुख है आवर फ़िल्म्स, देयर फ़िल्म्स (Our Films, Their Films, हमारी फ़िल्में, उनकी फ़िल्में)। 1976 में प्रकाशित इस पुस्तक में राय की लिखी आलोचनाओं का संकलन है। इसके पहले भाग में भारतीय सिनेमा का विवरण है और दूसरा भाग हॉलीवुड पर केन्द्रित है। राय ने चार्ली चैपलिन और अकीरा कुरोसावा जैसे निर्देशकों और इतालवी नवयथार्थवाद जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया है। 1976 में ही इन्होंने एक और पुस्तक प्रकाशित की — विषय चलचित्र (বিষয় চলচ্চিত্র) जिसमें सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर इनके चिंतन का संक्षिप्त विवरण है। इसके अतिरिक्त इनकी एक और पुस्तक एकेई बोले शूटिंग (একেই বলে শুটিং, इसको शूटिंग कहते है) (1979) और फ़िल्मों पर अन्य निबंध भी प्रकाशित हुए हैं।
राय ने बेतुकी कविताओं का एक संकलन तोड़ाय बाँधा घोड़ार डिम (তোড়ায় বাঁধা ঘোড়ার ডিম, घोड़े के अण्डों का गुच्छा) भी लिखा है, जिसमें लुइस कैरल की कविता जैबरवॉकी का अनुवाद भी शामिल है। इन्होंने बांग्ला में मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियों का संकलन भी प्रकाशित किया।
सम्मान एवं पुरस्कार
सत्यजित राय को मिले सम्मान
राय को जीवन में अनेकों पुरस्कार और सम्मान मिले। ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय ने इन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्रदान की। चार्ली चैपलिन के बाद यह इस सम्मान को पाने वाले पहले फ़िल्म निर्देशक थे। इन्हें 1985 में दादासाहब फाल्के पुरस्कार और 1987 में फ़्राँस के लेज़्यों द’ऑनु पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मृत्यु से कुछ समय पहले इन्हें सम्मानदायक अकादमी पुरस्कार और भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान किये गए। मरणोपरांत सैन फ़्रैंसिस्को अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्मोत्सव में इन्हें निर्देशन में जीवन-पर्यन्त उपलब्धि-स्वरूप अकिरा कुरोसावा पुरस्कार मिला जिसे इनकी ओर से शर्मिला टैगोर ने ग्रहण किया।http://history.sffs.org/awards_tributes/search.php?search_by=6&searchfield=Satyajit+Ray Awards and Tributes सैन फ़्रैंसिस्को इंटरनैशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल 11 फरवरी 2007 https://web.archive.org/web/20070928055714/http://history.sffs.org/awards_tributes/search.php?search_by=6&searchfield=Satyajit+Ray 28 सितंबर 2007 live
सामान्य रूप से यह समझा जाता है कि दिल का दौरा पड़ने के बाद उन्होंने जो फ़िल्में बनाईं उनमें पहले जैसी ओजस्विता नहीं थी। उनका व्यक्तिगत जीवन कभी मीडिया के निशाने पर नहीं रहा लेकिन कुछ का विश्वास है कि 1960 के दशक में फ़िल्म अभिनेत्री माधवी मुखर्जी से उनके संबंध रहे।रॉबिनसन 2003 362
धरोहर
सत्यजित राय भारत और विश्वभर के बंगाली समुदाय के लिए एक सांस्कृतिक प्रतीक हैं। बंगाली सिनेमा पर राय ने अमिट छाप छोड़ी है। बहुत से बांग्ला निर्देशक इनके कार्य से प्रेरित हुए हैं — अपर्णा सेन, ऋतुपर्ण घोष, गौतम घोष, तारिक़ मसूद और तन्वीर मुकम्मल। भारतीय सिनेमा पर इनके प्रभाव को हर शैली के निर्देशक मानते हैं, जिनमें बुद्धदेव दासगुप्ता, मृणाल सेनhttp://www.littlemag.com/2000/mrinal.htm Our lives, their lives सेन मृणाल लिटल मैगज़ीन https://web.archive.org/web/20060621094424/http://www.littlemag.com/2000/mrinal.htm 21 जून 2006 २९ जून २००६ live और अदूर गोपालकृष्णन शामिल हैं। भारत के बाहर भी मार्टिन सोर्सीसी,http://media.www.gwhatchet.com/media/storage/paper332/news/2002/03/04/Arts/Martin.Scorsese.Hits.Dc.Hangs.With.The.Hachet-195598.shtml Martin Scorsese hits DC, hangs with the Hachet इंग्वी क्रिस हैचेट मार्टिन सोर्सीसी ने हैचेट के साथ डीसी में किया धमाल https://web.archive.org/web/20090826214118/http://media.www.gwhatchet.com/media/storage/paper332/news/2002/03/04/Arts/Martin.Scorsese.Hits.Dc.Hangs.With.The.Hachet-195598.shtml 26 अगस्त 2009 deadRaging Bull Review 1980 रैगिंग बुल समीक्षा 1980 अंतनी, जय 2004 कॉन्टेक्ट म्यूज़िक http://www.contactmusic.com/film/review/ragingbull 23 जून 2024 live https://web.archive.org/web/20151208051757/http://www.contactmusic.com/film/review/ragingbull 8 दिसम्बर 2015 जेम्स आइवरी,http://www.screenonline.org.uk/people/id/532213/index.html Ivory, James (1928—) हॉल शेल्डन स्क्रीन ऑनलाइन https://web.archive.org/web/20061230165100/http://www.screenonline.org.uk/people/id/532213/index.html 30 दिसंबर 2006 12 फ़रवरी 2007 live अब्बास कियारोस्तामी और एलिया काज़ान जैसे निर्देशक भी इनकी शैली से प्रभावित हुए हैं। इरा सैक्स की फ़िल्म फ़ॉर्टी शेड्स ऑव ब्लू (Forty Sheds of Blue, चालीस तरह के नीले रंग) बहुत कुछ चारुलता पर आधारित थी। राय की कृतियों के हवाले अन्य कई फ़िल्मों में मिलते हैं, जैसे सेक्रिड ईविल (Sacred Evil, पावन दुष्टता),http://www.telegraphindia.com/1060609/asp/etc/story_6319302.asp Sacred Ray झा एस. के. टेलिग्रैफ़ इंडिया https://web.archive.org/web/20060618042430/http://www.telegraphindia.com/1060609/asp/etc/story_6319302.asp 18 जून 2006 २९ जून २००६ live दीपा मेहता की तत्व त्रयी और ज़ाँ-लुक गॉडार की कई कृतियाँ।http://archive.sensesofcinema.com/contents/01/16/godard_habib.html Before and After: Origins and Death in the Work of Jean-Luc Godard हाबीब एंड्रे सेंसस ऑफ़ सिनेमा https://web.archive.org/web/20060614150838/http://www.sensesofcinema.com/contents/01/16/godard_habib.html 14 जून 2006 29 जून 2006 dead
1993 में यूसी सांता क्रूज़ ने राय की फ़िल्मों और उन पर आधारित साहित्य का संकलन करना प्रारम्भ किया। 1995 में भारत सरकार ने फ़िल्मों से सम्बन्धित अध्ययन के लिए सत्यजित राय फ़िल्म एवं टेलिविज़न संस्थान की स्थापना की। लंदन फ़िल्मोत्सव में नियमित रूप से एक ऐसे निर्देशक को सत्यजित राय पुरस्कार दिया जाता है जिसने पहली फ़िल्म में ही “राय की दृष्टि की कला, संवेदना और मानवता” को अपनाया हो।
2007 में, ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्परेशन ने घोषणा की कि उनकी दो फेलुदा कहानियों पर रेडियो कार्यक्रम तैयार किए जाएँगे।http://www.financialexpress.com/fe_archive_full_story.php?content_id=152924 Feluda goes global, via radio दत्त एस फ़ाइनैंशल एक्सप्रेस https://web.archive.org/web/20070505143305/http://www.financialexpress.com/fe_archive_full_story.php?content_id=152924 5 मई 2007 12 फ़रवरी 2007 live
सांस्कृतिक हवाले
अमरीकन कार्टून धारावाहिक द सिम्प्सन्स में अपु नहसपीमापेतिलोन के चरित्र का नाम राय के सम्मान में रखा गया था। राय और माधवी मुखर्जी पहले भारतीय फ़िल्म व्यक्तित्व थे जिनकी तस्वीर किसी विदेशी डाकटिकट (डोमिनिका देश) पर छपी। कई साहित्यिक कृतियों में राय की फ़िल्मों का हवाला दिया गया है — सॉल बेलो का उपन्यास हर्ज़ोग और जे. एम. कोटज़ी का यूथ (यौवन)। सलमान रशदी के बाल-उपन्यास हारुन ऐंड द सी ऑव स्टोरीज़ (Harun and the Sea of Stories, हारुन और कहानियों का सागर) में दो मछलियों का नाम “गुपी” और “बाघा” है।
सन्दर्भ
टीका-टिप्पणी
3
ग्रन्थ एवं निबंधसूची
कूपर
डी
2000
The Cinema of Satyajit Ray: Between Tradition and Modernity
https://archive.org/details/cinemaofsatyajit00coop
केमब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस
0521629802
registration
।
दासगुप्त
सी
1996
The cinema of Satyajit Ray
पेंग्विन इंडिया
0140247807।
गांगुली
एस
2001
Satyajit Ray: In search of the modern
इंडियालॉग
8187981040।
मित्र
एस
1983
The Genius of Satyajit Ray
इंडिया टुडे।
नन्दी
ए
1995
Satyajit Ray's Secret Guide to Exquisite Murders
The Savage Freud and Other Essays on Possible and Retrievable Selves
प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस
0691044104
registration
https://archive.org/details/savagefreudother00nand
।
नाइस
बी
1988
Satyajit Ray: A Study of His Films
प्रेगर पब्लिशर्स
0275926664।
राय
एस
1993
3
आवर फ़िल्म्स, देयर फ़िल्म्स
एशिया बुक कॉर्प ऑफ़ एमर
0863113176।
राय
एस
1994
My Years with Apu
वाइकिंग
0670862150।
राय
एस
2005
Speaking of films
पेंग्विन इंडिया
0144000261।
रॉबिनसन
ए
2003
Satyajit Ray: The Inner Eye: The Biography of a Master Film-Maker
आइ. बी. टॉरिस
1860649653।
रॉबिनसन
ए
2005
Satyajit Ray: A Vision of Cinema
आइ. बी. टॉरिस
1845110749।
रशदी
एस
1992
Imaginary Homelands
पेंग्विन
0140140360
registration
https://archive.org/details/imaginaryhomelan00rush_0
।
सेटन
एम
1971
Satyajit Ray: Portrait of a director
इंडियाना यूनिवर्सिटी प्रेस
0253168155
registration
https://archive.org/details/portraitofdirect0000seto
।
वुड
आर
1972
The Apu trilogy
नवेम्बर बुक्स लि.
0856310034।
बिश्वास
एम
2006
Apu and after: Revisiting Ray's cinema
सीगल बुक्स।
बाहरी कड़ियाँ
सत्यजितराय.ऑर्ग
0006249
राय की दुनिया
"राय को याद करना, फ़्रेम-दर-फ़्रेम"
सत्यजित राय की पुस्तकों का संग्रहण
अमर्त्य सेन: सत्यजित राय और विश्व की कला: हमारी संस्कृति, उनकी संस्कृति
परबास में सत्यजित राय पर अनुच्छेद
सिनेमा की संवेदनाएँ: महान निर्देशकों का डेटाबेस
सत्यजित राय: सिनेमा का दर्शन निबंध: एंड्रू रॉबिनसन
टॉक्सिकयूनिवर्स.कॉम में जॉन नेस्बिट का निबंध: सत्यजित राय की सर्वोत्कृष्ट कृति: अपु त्रयी
यूसीएससी में राय की फ़िल्मों और निबंधों का संग्रहण
राय की फ़िल्मों की सूची
स्पाइस में सत्यजित राय
सत्यजित राय को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन १९६५ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
yes
श्रेणी:1921 में जन्मे लोग
श्रेणी:१९९२ में निधन
श्रेणी:१९६५ पद्म भूषण
श्रेणी:सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्म फेयर पुरस्कार
श्रेणी:बंगाली फ़िल्म निर्देशक
श्रेणी:भारतीय फ़िल्म निर्देशक
श्रेणी:भारतीय फ़िल्मकर्मी
श्रेणी:बंगाली सिनेमा
श्रेणी:दादासाहेब फाल्के पुरस्कार विजेता
श्रेणी:भारत रत्न सम्मान प्राप्तकर्ता
श्रेणी:कोलकाता के लोग
श्रेणी:मैगसेसे पुरस्कार विजेता
श्रेणी:पद्म विभूषण धारक