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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव

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भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव (१९१० - १९५७) हिन्दी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। उन्होंने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतिरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी प्राप्त है। जीवन परिचय भुवनेश्वर का जन्म शाहजहांपुर के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनकी माँ का देहान्त हो गया। इसके कारण उनको घर में घोर उपेक्षा झेलनी पड़ी। कम उम्र में घर छोड़कर जब इलाहाबाद आये तो शाहजहांपुर में महज इंटरमीडिएट तक पढ़े इस लेखक के अंग्रेजी ज्ञान और बौद्धिकता का वहां के लेखकों पर आतंक छा गया। आदर्श और यथार्थवाद के उस दौर में इनकी रचनाओं ने दोनों के सीमान्तों को इस प्रकार उद्घाटित किया कि उनके बारे में तरह-तरह की किवदंतियां फैलने लगीं। भुवनेश्वर साहित्य जगत का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। भुवनेश्वर ने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है। एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं। ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाजे हैं”। उनका यह मानना उनकी रचनाओं में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। मनुष्य को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी, वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। साहित्यिक परिचय भुवनेश्वर की साहित्य साधना बहुआयामी थी। कहानी, कविता, एकांकी और समीक्षा सब में उनकी लेखनी एक नए कलेवर का एहसास दिलाती है। छोटी सी घटना को भी नई, परन्तु वास्तविकता के सर्वाधिक सन्निकट द्रष्टि से देखने का नजरिया भुवनेश्वर की विशेषता है। 'हंस’ में 1933 में भुवनेश्वर का पहला एकांकी ‘श्यामा : एक वैवाहिक विडम्बना’ प्रकाशित हुआ था। 1935 में प्रकाशित एकांकी संग्रह ‘कारवां’ ने उन्हें एकांकीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। भुवनेश्वर द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946) को विश्व की किसी भी भाषा में भी लिखे गये पहले असंगत नाटक का सम्मान प्राप्त है। उनके द्वारा लिखित एकांकियों में ‘श्यामःएक वैवाहिक विडम्वना’, ‘रोमांसःरोमांच’, ‘स्ट्राइक’, ‘ऊसर’, ‘सिकन्दर’ आदि का नाम उल्लेखनीय है। भुवनेश्वर की पहली कहानी ‘मौसी’ को प्रेमचंद ने समकालीन कहानियों के प्रतिनिधि संकलन ‘हिंदी की आदर्श कहानियां’ में स्थान दिया। उनकी कहानी ‘भेडिये’ हंस के अप्रैल 1938 अंक में प्रकाशित हुई। इस कहानी ने आधुनिक कहानियों की परम्परा में मज़बूत नीव का निर्माण किया। कैसे रेगिस्तान से गुजरता बंजारा भेड़ियों से जान बचाने के लिए उनके आगे चुग्गा फेंकता है। कहानी और जीवन दोनों में फेंकने के इस क्रम में सबसे पहले फेंकी जाती हैं वो चीजें जो अपेक्षाकृत कम महत्व की हैं। इस कहानी ने जीवन की कडवी सच्चाई को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। कुछ साहित्यकार तो इस कहानी के मर्म को किसी मैनेजमेंट क्लास के चुनिन्दा निष्कर्षों में भी सर्वश्रेष्ट मानते हैं। ‘मौसी’, ‘लड़ाई’, ‘माँ बेटे’, ‘मास्टनी’ आदि अन्य उल्लेखनीय कहानियाँ हैं। इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर ने अंग्रेज़ी तथा हिन्दी में कुछ कविताएं तथा आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। परन्तु उनके कृतित्व को पहचानने में लोगों ने भूल कर दी। शायद यही कारण था, कि इस अनोखे रचनाकार को पूरा जीवन संघर्षो और विवादों में गुजारना पड़ा। प्रेमचंद ने उनसे हंस से स्थाई रूप से जुड़ने का आग्रह किया था। परन्तु अनजाने कारणों से ये संवाद पूरा ना हो सका। हालांकि उनकी रचनायें हंस में लगातार प्रकाशित होती रहीं। लेकिन अगर वो हंस के साथ जुड़ जाते तो उनका रचना संसार कहीं अधिक विस्तृत रूप में हमारे सामने होता। उनके अंतिम समय की रचनाओं को सहेजना वाला उनके साथ कोई नहीं था, जिसके फलस्वरूप उस दौरान रफ़ कागजों के पीछे लिखा गया हिंदी और अंग्रेजी का पूर्णतया मौलिक साहित्य अंधेरों में गुम हो गया। भुवनेश्वर की उपलब्ध सभी रचनाओं को आज पुनः लोगों तक पंहुचाने की आवश्यकता है। साहित्यिक विशेषताएँ लेखक की रचनाओं के अनुशीलन से यही धारणा बनती है कि पश्चिम के आधुनिक साहित्य का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया है। इब्सन, शा. डी. एच., लारेंस तथा फ्रायड के प्रति विशेष अनुरक्त प्रतीत होते हैं। ज़िन्दगी को उन्होंने कड़वाहट, तीखेपन, विकृति और विद्रुपता से ही देखा था। सम्भवतः इसी कारण उनमें समाज के प्रति तीव्र वितृष्णा, प्रबल आक्रोश और उग्र विद्रोह का भाव प्रकट हुआ है। जीवन की इस कटु अनुभूति ने ही उन्हें फक्क्ड़, निर्द्वन्द्व और संयमहीन बना दिया था। भुवनेश्वर ने हिन्दी पाश्चात्य शैली के एकांकी की परंपरा बनायी। उनकी प्रथम रचना 'श्यामा--एक वैवाहिक विडंबना', 'हंस' के दिसंबर, 1933 ई. के अंक में प्रकाशित हुई। इसके बाद अन्य एकांकी रचनाएँ 'शैतान' (1934 ई.), 'एक साम्यहीन साम्यवादी' (हंस,मार्च 1934 ई.), 'प्रतिभा का विवाह' (1933 ई.), 'रहस्य रोमांच' (1935 ई.), 'लाटरी' (1935 ई.) प्रकाशित हुईं। इन्हें संग्रहीत करके उन्होंने सन 1956 ई. में 'कारवां' संज्ञा देकर प्रकाशित किया। इन सभी एकांकियों पर पश्चिम की एकांकी शैली की छाप है। विषय-वस्तु और समस्या के विश्लेषण में पश्चिम के बुद्धिवादी नाटककारों इब्सन और शा का प्रभाव है। परिशिष्ट करने वाले जो सूत्र-वाक्य दिये हैं, वे शा के व्यंग और फ्रायड की यौन-प्रधान विचारधारा का स्मरण दिलाते हैं। भुवनेश्वर के और भी एकांकी प्रकाशित होते रहे- 'मृत्यु' ('हंस 1936 ई.), 'हम अकेले नहीं हैं' तथा 'सवा आठ बजे' ('भारत'), 'स्ट्राइक' और 'ऊसर' ('हंस' 1938 ई.) इन रचनाओं में उनकी दृष्टि का विस्स्तार देखने को मिलता है। यौन-समस्या तथा प्रेम के त्रिकोण से ऊपर उठकर वे समाज के दुख-दर्द को भी देखने लगे। सन 1938 ई. में सुमित्रानंदन पंत द्वारा संपादित 'रूपाभ' पत्रिका में उन्होंने एक बड़े नाटक 'आदमखोर' का पहला अंक प्रकाशित कराया। इससे उन्होंने जीवन की कटु वास्तविकताओं के उदघाटन का घोर यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया है। सन 1940 ई. में उन्होंने गोगोल के प्रसिद्ध नाटक 'इंस्पेक्टर जनरल' को लगभग पौन घंटे के एकांकी का रूप दिया। सन 1941 ई. में 'विश्ववाणी' में 'रोशनी और आग' शीर्षक एक प्रयोग उपस्थित किया, जिसमें ग्रीक नाटकों जैसा पूर्वालाप (कोरस) था। 'कठपुतलियाँ' (1942 ई.) में उन्होंने प्रतीकवादी शैली अपनायी। इन प्रयोगात्मक रचनाओं के अनंतर भुवनेवर की नाट्यकला परिपक्व रूप में देखने को मिली। 'फोटोग्राफर के सामने' (1945 ई.),'तांबे के कीड़े' (1946 ई.) में मनुष्य की बढ़ती हुई अर्थलोलुपता का उद्घाटन है। सन 1948 ई. में 'इतिहास की केंचुल' एकाकी लिखा और इसके अनंतर उनके कई एतिहासिक एकांकी प्रकाशित हुए- 'आज़ादी की नींव' (1949 ई.), 'जेरूसलम' (1949 ई.),'सिकंदर (1949 ई.),'अकबर' (1950 ई.) तथा चंगेज़ खाँ (1950 ई.)। इन रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर भी उभारा है। अंतिम कृति 'सीओ की गाड़ी' (1950 ई.) है। रचना कहानियाँ आजादी : एक पत्र एक रात जीवन की झलक डाकमुंशी भेड़िये भविष्य के गर्भ में माँ-बेटे मास्टरनी मौसी लड़ाई सूर्यपूजा हाय रे, मानव हृदय! नाटक और एकांकी ताम्बे के कीड़े एक साम्यहीन साम्यवादी एकाकी के भाव पतित (शैतान) प्रतिभा का विवाह श्यामा : एक वैवाहिक विडंबना (१९३३) कारवां (एकांकी संग्रह) स्ट्राइक (एकांकी) 'ऊसर' के नामहीन चरित्र (एकांकी) बाहरी कड़ियाँ भुवनेश्वर की रचनाएँ ('हिन्दी समय' पर) भुवन्श्वर प्रसाद (कविता कोश) कोश)] श्रेणी:हिन्दी साहित्यकार श्रेणी:भारतीय हिंदी साहित्यकार