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411 समाचार
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गोवा में पुर्तगाली भाषा

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अंगूठाकार|गोवा में एक प्राचीन पुर्तगाली पट्टिका। 'मैंने अपनी माता को कुँवारी मरियम के चरणों में प्रार्थना करते देखा। वह एक सन्त थीं, जो दूसरी सन्त की बात सुन रही थीं।' आधुनिक पुर्तगाली में 'माँइ' (mãi) की वर्तनी 'माँए' (mãe) होगी। पुर्तगाली भाषा का प्रयोग गोवा में १६वीं शताब्दी के आरम्भ से, पुर्तगाली शासन की स्थापना के पश्चात्, होता आ रहा है और यह आज भी बोली जाती है, यद्यपि जनसंख्या के अल्प भाग द्वारा। गोवा में पुर्तगाली प्रशासन १५१० से १९६१ तक चला, जब इस क्षेत्र का भारतीय गणराज्य में विलय हुआ। यद्यपि यह कुछ धार्मिक सन्दर्भों में अपनी भूमिका बनाए हुए है, तथापि भाषा का अध्ययन अब भी होता है; २०१५ में गोवा में लगभग १,५०० विद्यार्थी पुर्तगाली सीख रहे थे, जिससे राज्य में पुर्तगाली भाषियों की कुल संख्या १०,००० से १२,००० आँकी गई।http://www.revistamacau.com/2014/06/02/1-500-pessoas-estudam-portugues-em-goa/ 1.500 pessoas estudam português em Goa 2 June 2014 Revista MACAU एक अन्य अनौपचारिक आकलन लगभग ८,००० भाषियों की संख्या बताता है, तथापि गोवा में पुर्तगाली भाषियों की संख्या का कोई औपचारिक विश्वसनीय स्रोत उपलब्ध नहीं है।https://lusophonegoa.org/en/2021/11/portuguese-language-studies-in-brazil-and-goa/ Portuguese Language Studies in Brazil and Goa Lusophone Society of Goa en-US 2026-04-26 इतिहास. गोवा में पुर्तगाली भाषा का इतिहास १५वीं शताब्दी तक जाता है, जब पुर्तगाली अन्वेषकों का आगमन हुआ और क्षेत्र में पुर्तगाली शासन स्थापित हुआ, जो लगभग ४५० वर्षों तक चला। एस्तादो पुर्तुगेस दा इण्डिया (pt Estado Português da Índia no, अर्थात् भारत का पुर्तगाली राज्य) के काल में भाषा का प्रशासन और शिक्षा दोनों में व्यापक प्रयोग हुआ। सरकारी उपयोग से परे इसका प्रयोग धर्मप्रचारकों द्वारा भी किया जाता था, यद्यपि दैनिक जीवन में यह अन्य स्थानीय भाषाओं के साथ सह-अस्तित्व में थी।June 2026 गोवा के विलयोपरान्त गोवा में पुर्तगाली शासन १९६१ में भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा पुर्तगाली गोवा के विलय के पश्चात् समाप्त हो गया। भाषा के समक्ष अत्यन्त कठिन मोड़ आया- पुर्तगाली का राजभाषा होना समाप्त हो गया, वह अनिवार्य नहीं रही और अधिकांशतः प्रयोग से बाहर हो गई।June 2026 गोवा का पुर्तगाली-भाषा का दैनिक समाचारपत्र ‘ओ हेराल्दो’ का नाम बदलकर ‘हेरल्ड’ कर दिया गया और १९८३ में इसने अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग आरम्भ किया (अपनी १२५वीं वर्षगाँठ के उपरान्त समाचारपत्र ने पुनः ‘ओ हेराल्दो’ नाम धारण कर लिया)।https://books.google.com/books?id=1YILeUD_oZUC&pg=PA290 A History of Konkani Literature: From 1500 to 1992 Saradesāya Manohararāya Sahitya Akademi 2000 8172016646 241 राज्य राजपत्र में अधीनस्थ विधान में पुर्तगाली का प्रयोग अंग्रेज़ी के साथ १९७२ तक होता रहा, जब इसे मराठी और कोंकणी द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया। अधीनस्थ न्यायालयों में पुर्तगाली, मराठी और कोंकणी के साथ १९६९ तक न्यायालयी भाषा बनी रही। १९६४ में बम्बई उच्च न्यायालय के तत्त्वावधान में गोवा के न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं और न्यायालय कर्मचारियों को अंग्रेज़ी में अभिवचन लिखने और समझने हेतु पुनर्प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम आरम्भ हुआ, जिससे १९६९-७० में अभिवचन की भाषा के रूप में पुर्तगाली का उन्मूलन सम्भव हो सका।June 2026 १९७४ में पुर्तगाल में कार्नेशन क्रान्ति के पश्चात् भारत और पुर्तगाल के मध्य राजनयिक सम्बन्ध पुनः स्थापित हुए, १९९२ में पणजी में महावाणिज्य दूतावास की स्थापना हुई तथा तत्पश्चात् १९९५ में फ़ुन्दासाओ ओरिएन्ते (Fundação Oriente) और कुछ वर्षों पश्चात् इन्स्तितूतो कमोएँस (Instituto Camões) जैसी संस्थाएँ आईं। इसके फलस्वरूप गोवा में पुर्तगाली भाषा को संस्थागत समर्थन पुनः प्राप्त हुआ। अन्य विरासतें इस भारतीय राज्य में भाषा की दीर्घ उपस्थिति ने, अल्प संख्यक भाषियों के अतिरिक्त, अन्य विरासतें भी छोड़ी हैं। इनमें मार्गों के नाम, गोवा के सर्वाधिक जनसंख्या वाले नगर वास्को द गामा का नाम तथा माश्कारेन्हास और सूज़ा (कभी-कभी डि’सूज़ा रूप में) जैसे पारिवारिक उपनाम सम्मिलित हैं, जो गोवा में बहुत सामान्य हैं। यह विवादास्पद है कि क्या गोवा क्षेत्र में कभी कोई भारतीय-पुर्तगाली क्रियोल भाषा बनी, जैसा कि भारत के अन्य क्षेत्रों — तथा अफ़्रीका, श्रीलंका (पूर्व सीलोन), मकाउ, मलक्का, इण्डोनेशिया और पूर्वी तिमोर में हुआ — जहाँ स्थानीय भाषाओं के साथ पुर्तगाली के दीर्घकालिक सम्पर्क से अनेक पुर्तगाली-आधारित क्रियोल भाषाएँ उत्पन्न हुईं, जो प्रायः पुर्तगाली शासन की समाप्ति के पश्चात् शताब्दियों में क्रमशः लुप्त हो गईं। कतिपय लेखक, जैसे थेबान (१९८५) और तोमास (१९९५), होल्म (१९८९) और क्लेमेन्स (१९९६, २०००) के विपरीत मानते हैं कि राजभाषा और शिक्षा की भाषा के रूप में पुर्तगाली के अत्यन्त प्रबल दबाव ने गोवा में पुर्तगाली क्रियोल के निर्माण को रोक दिया होगा। तथापि रीता मार्किल्यास (१९९८) के अनुसार उन स्थानों में, जो २०वीं शताब्दी के मध्य तक पुर्तगाली प्रशासन के अधीन रहे, जैसे गोवा, एक ‘विक्रियोलीकरण’ हुआ, जिसमें भाषा की विभिन्न संरचनाएँ धीरे-धीरे पुर्तगाल में बोली जाने वाली पुर्तगाली के समीप आती गईं और अब कुछ गोवाई समुदायों द्वारा बोली जाने वाली पुर्तगाली की वर्तमान किस्म में केवल अवशेष रह गए हैं। गोवा की अस्मिता भी पुर्तगाली उपनिवेशन द्वारा छोड़ी गई अनेक विरासतों से जुड़ी हुई है, जैसे गोवा की विशिष्ट विशेषताएँ और शेष देश से भिन्न जीवन-शैली। इसके अतिरिक्त यहाँ स्थापत्य और पाक-कला के तत्त्वों के साथ एक विशाल एवं महत्त्वपूर्ण कैथोलिक समुदाय भी विद्यमान है, जिसमें अधिकांश मूल गोवावासी सम्मिलित हैं। १९६१ के पश्चात् भारत के अन्य भागों से आप्रवासन ने गोवा की जनसांख्यिकी बदल दी, जिससे मूल गोवावासी जनसंख्या का २५-३० प्रतिशत रह गए तथा राज्य में हिन्दू धर्म बहुसंख्यक हो गया। गोवा में रहने वाले १४ लाख लोगों में अनुमानित २५ प्रतिशत से ३० प्रतिशत कैथोलिक हैं। यद्यपि भारत में बहुसंख्यक धर्म हिन्दू है, फिर भी १४ लाख गोवावासियों में ३० प्रतिशत कैथोलिक हैं। तथापि १९६१ में, गोवा के भारत में विलय के समय, कैथोलिक कुल जनसंख्या का ५८ प्रतिशत था। २०११ तक, भारत में एकीकरण के ५० वर्षों के पश्चात्, कैथोलिक समुदाय में स्पष्ट कमी आई है। गिरजाघर, मठ और पुर्तगाली दुर्ग गोवा के सम्पूर्ण क्षेत्र में फैले हुए हैं, जो भारत जैसे पहले से ही विविधताओं से परिपूर्ण देश में और अधिक वैविध्य जोड़ते हैं। वर्तमान स्थिति पुर्तगाल द्वारा सदियों के प्रभुत्व के अतिरिक्त, अन्य पुर्तगाली उपनिवेशों में जो हुआ, उसके विपरीत, पुर्तगाली भाषा जनसंख्या के विशाल बहुमत में व्याप्त नहीं हो सकी और प्रशासन तथा एक छोटे साक्षर अभिजात वर्ग की भाषा बनी रही। अनुमान है कि १.५ प्रतिशत से भी अल्प जनसंख्या ने इसे अपनी मातृभाषा के रूप में प्रयोग किया। तथापि अनेक गोवावासियों ने पुर्तगाली को अपनी द्वितीय भाषा के रूप में अपनाया, जो राज्य प्रशासन और धार्मिक गतिविधियों में इसके अनिवार्य प्रयोग के कारण बाध्य था। आज गोवा में पुर्तगाली की स्थिति अत्यधिक संकटपूर्ण है। प्रत्येक पीढ़ी के साथ भाषियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। १९६१ में पुर्तगाली शासन की समाप्ति के पश्चात् से, पुर्तगाली भाषा का क्रमशः कोंकणी (गोवा की राजभाषा) और विशेष रूप से अंग्रेज़ी (भारत के संघीय प्रशासन की दो राजभाषाओं में से एक) द्वारा प्रतिस्थापन हुआ, जो शिक्षा और अवसर का प्रमुख माध्यम बनकर आधुनिकता के रूप में पुर्तगाली के स्थान पर आ गई। वर्तमान में पुर्तगाली भाषा गोवा में एक छोटे समुदाय द्वारा बोली जाती है। यद्यपि यह अनिश्चित है कि गोवा में इस भाषा को बोलने वालों की सटीक संख्या कितनी है, कुछ आकलन संकेत करते हैं कि यह आँकड़ा कुल जनसंख्या के ३ प्रतिशत से ५ प्रतिशत के मध्य है। हाल ही में गोवा में भाषा के पुनर्जीवन के प्रयास हुए हैं, जिनमें माध्यमिक विद्यालयों में प्रायोगिक परियोजनाएँ तथा कला एवं पर्यटन क्षेत्र में पहल सम्मिलित हैं। इस समय पुर्तगाली सार्वजनिक और निजी दोनों प्रकार की शिक्षा में पढ़ाई जाती है। इससे एक प्रत्यावर्तन प्रवृत्ति आरम्भ हुई, जिसके अन्तर्गत पुर्तगाली को प्रोत्साहित किया गया और विद्यालयों में एक वैकल्पिक भाषा के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसमें फ़ुन्दासाओ ओरिएन्ते का सहयोग प्राप्त है। गोवा विश्वविद्यालय १९८८ से पुर्तगाली अध्ययन में स्नातकोत्तर उपाधि प्रदान करता है और यह भारतीय उपमहाद्वीप का एकमात्र विश्वविद्यालय है जो पुर्तगाली में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम प्रस्तुत करता है। पुर्तगाली भाषा को बढ़ावा देने के लिए अनेक निःशुल्क पाठ्यक्रम भी उपलब्ध हैं, जैसे डोना पाउला स्थित कम्यूनिकेयर ट्रस्ट, राजधानी पणजी में इन्स्तितूतो कमोएँस, मडगाँव स्थित पार्वतीबाई चौगुले महाविद्यालय में पुर्तगाली भाषा एवं संस्कृति केन्द्र (सी.पी.एल.सी.) और पणजी के आल्तिन्हो में भारत-पुर्तगाल मैत्री समिति। इन्स्तितूतो कमोएँस के निदेशक तथा गोवा विश्वविद्यालय के रीडर डेल्फफ़म कोर्रेया दा सिल्वा के अनुसार, गोवा में पुर्तगाली सीखने वाले विद्यार्थियों की संख्या में क्रमिक और स्थिर वृद्धि हो रही है, एक ऐसी प्रवृत्ति जो पिछले आठ से दस वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। सिल्वा के अनुसार, विद्यालयों में पुर्तगाली में नामांकन कराने वाले विद्यार्थियों की संख्या २०१० में लगभग २० से बढ़कर २०१७ में लगभग २०० हो गई और इसी प्रकार पुर्तगाली में स्नातकोत्तर में नामांकन में भी वृद्धि हुई। यह प्रवृत्ति मुख्यतः सांस्कृतिक कारणों, जैसे परिवार से संवाद, और व्यावसायिक कारणों से प्रेरित है, जिनमें विधि, ऐतिहासिक शोध, यात्रा एवं पर्यटन, अनुवाद तथा ब्राज़ील, पुर्तगाल, मोज़ाम्बिक, अंगोला और शेष सी.पी.एल.पी. (पुर्तगाली भाषी देशों का समुदाय) से जुड़े व्यापार के अवसर सम्मिलित हैं। गोवा में पुर्तगाली भाषा के अल्प संख्यक भाषी अपनी अस्मिता की पुष्टि करने तथा पुर्तगाली भाषा के साथ अपने दीर्घकालिक संसर्ग के बन्धनों को सुदृढ़ करने की आकांक्षा से एकजुट हैं। आज भी यह भाषा प्रतिष्ठा और सामाजिक स्तर के प्रतीक रूप में कार्य करती है- पुर्तगाली बोलने वाले अच्छे परिवारों से आए हुए समझे जाते हैं। वर्तमान में २०२६ तक, पुर्तगाली गोवा बोर्ड के विद्यालयों में ८वीं कक्षा से १२वीं कक्षा तक एक वैकल्पिक भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है। यद्यपि राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० (एन.ई.पी.) के कारण गोवा बोर्ड के विद्यालयों में इस भाषा का भविष्य अनिश्चित है, क्योंकि एन.ई.पी. २०२० का त्रिभाषा सूत्र विद्यार्थियों को केवल एक ‘विदेशी भाषा’ के विकल्प की अनुमति देता है (यहाँ अंग्रेज़ी भाषा को भी विदेशी भाषा की श्रेणी में रखा गया है)। गोवा में २०२६-२०२७ के लिए इन मानकों में शिथिलता प्रदान की गई है, जिससे अभी के लिए विद्यालयों में पुर्तगाली भाषा को वैकल्पिक विषय के रूप में जारी रखा जा सका है।https://www.hindustantimes.com/india-news/goa-relaxes-nep-norms-lets-schools-offer-portuguese-french-for-now-101773934347264.html Goa relaxes NEP norms, lets schools offer Portuguese, French for now Souza Gerard de 2026-03-19 Hindustan Times en 2026-04-23 सम्बन्धित विषय कोंकणी भाषा भारत-पुर्तगाल सम्बन्ध पुर्तगाली साम्राज्य सन्दर्भ बाह्य कड़ियाँ A língua portuguesa está a ter uma morte lenta na Índia (अर्थात् पुर्तगाली भाषा भारत में मन्द मृत्यु को प्राप्त हो रही है, पुर्तगाली भाषा में) श्रेणी:गोवा की संस्कृति