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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

बैअते रिज़वान

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बैयत-ए-रिज़वान (ar بيعة الشَّجَرَة पेड़ की शपथ) एक शपथ या प्रतिज्ञा थी जिसे इस्लामी पैगंबर मुहम्मद के समक्ष उनके साथियों में एक पेड़ के नीचे वचन के रूप में लिया था। यह शपथ उस्मान की मृत्यु का बदला लेने के लिए ली गयी थी हालाँकि, उस्मान की मृत्यु एक आशंका अथवा भ्रम की स्थिति मात्र थी।Mihaylov Dimitar 2015-01-02 Cracks in the Crescent: The Looming Sectarian Clash between Khilafah and Imamah http://www.tandfonline.com/doi/abs/10.1080/23739770.2015.1003455 Israel Journal of Foreign Affairs en 9 1 49–61 10.1080/23739770.2015.1003455 2373-9770 144788678 subscriptionhttp://www.usc.edu/schools/college/crcc/engagement/resources/texts/muslim/maududi/mau48.html CRCC: Center For Muslim-Jewish Engagement: Resources: Religious Texts www.usc.edu https://web.archive.org/web/20090502050158/http://www.usc.edu/schools/college/crcc/engagement/resources/texts/muslim/maududi/mau48.html 2009-05-02 dead तारीख़ मार्च 628 ईस्वी (6 हिजरी) में, पैगंबर मुहम्मद उमरा की रस्म अदा करने के लिए मक्का की ओर रवाना हुए। उस समय मक्का पर कुरैशी लोगों का शासन था और कुरैशी लोगों ने मुसलमानों को मक्का शहर में प्रवेश की इजाजत देने से इंकार कर दिया और उन्हें रोकने के लिये मक्का के बाहर लड़ाई का मोर्चा सँभाल लिया, जबकि मुसलमानों का युद्ध करने का न तो इरादा था और न ही कोई तैयारी। मुहम्मद ने मक्का के बाहर हुदैबियाह में डेरा डाला जो मक्का से लगभग नौ मील की दूरी पर है और आजकल शुमैसी के नाम से जाना जाता है। उन्होंने मक्का के कुरैश लोगों को समझाने की कोशिश की कि उनका मक़सद युद्ध करना नहीं, बल्कि केवल उमरा करना है, लेकिन कुरैश के साथ सभी बातचीत विफल रही। अंततः पैगंबर ने उस्मान को अपना दूत बनाकर कुरैश के नेताओं से मिलने और शहर में प्रवेश की अनुमति के लिए बातचीत करने भेजा। कुरैश लोगों ने उस्मान को मक्का में उम्मीद से अधिक समय तक रोक लिया और मुसलमानों को उनके ठिकाने के बारे में कोई जानकारी देने से इंकार कर दिया। इससे मुसलमानों को ऐसा विश्वास हुआ कि कुरैश के लोगों ने उस्मान की हत्या कर दी है। इस स्थिति में, मुहम्मद ने अपने लगभग 1,400 सहाबा (साथियों) को एकत्र किया और उनसे मृत्यु तक लड़ने तथा उस्मान की मौत का बदला लेने की शपथ लेने का आह्वान किया। मुहम्मद ने हर एक से यह वचन लिया कि वे तब तक वहां से नहीं हटेंगे जब तक उस्मान के खून का बदला नहीं ले लेते, और मृत्यु तक उनका साथ देंगे। यह शपथ एक पेड़ के नीचे ली गई, इसलिए इसे “पेड़ की प्रतिज्ञा” कहा गया। शपथ लेते समय प्रत्येक सहाबी मुहम्मद के सामने आया और उनके हाथ पर अपना हाथ रखकर प्रतिज्ञा की। क़ुरआन में क़ुरआन-ए-करीम ने इस वाक़िआ को इस्लामी तारीख़ में अहम तौर पर ज़िक्र किया है, जिसके पीछे बारी तआला का यह इरशाद है: {لَّقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا}[सूरा अल-फ़तह आयत 18] तर्जुमा: ''18. जिस वक्त मोमिनीन तुमसे दरख्त के नीचे (लड़ने मरने) की बैयत कर रहे थे तो ख़ुदा उनसे इस (बात पर) ज़रूर ख़ुश हुआ ग़रज़ जो कुछ उनके दिलों में था ख़ुदा ने उसे देख लिया फिर उन पर तस्सली नाज़िल फरमाई और उन्हें उसके एवज़ में बहुत जल्द फ़तेह इनायत की।''"Al-Fath [48:18] - फ़ारूक़ ख़ान & नदवी - Tanzil Quran Navigator" https://tanzil.net टिप्पणी सन्दर्भ श्रेणी:शपथ श्रेणी:इस्लाम श्रेणी:मुहम्मद