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411 समाचार
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जैन धर्म में भगवान

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जैन धर्म में भगवान अरिहन्त (केवली) और सिद्ध (मुक्त आत्माएँ) को कहा जाता है। जैन धर्म इस ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखाव के लिए जिम्मेदार किसी निर्माता ईश्वर या शक्ति की धारणा को खारिज करता है।शास्त्री २००७ ८७ जैन दर्शन के अनुसार, यह लोक और इसके छह द्रव्य (जीव, पुद्गल, आकाश, काल, धर्म, और अधर्म) हमेशा से है और इनका अस्तित्व हमेशा रहेगा। यह ब्रह्माण्ड स्वयं संचालित है और सार्वभौमिक प्राकृतिक क़ानूनों पर चलता है। जैन दर्शन के अनुसार भगवान, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) का निर्माण नहीं कर सकती। जैन ग्रंथों में देवों (स्वर्ग निवासियों) का एक विस्तृत विवरण मिलता है, लेकिन इन प्राणियों को रचनाकारों के रूप में नहीं देखा जाता है; वे भी दुखों के अधीन हैं और अन्य सभी जीवित प्राणियों की तरह, अपनी आयु पूरी कर अंत में मर जाते है। जैन धर्म के अनुसार इस सृष्टि को किसी ने नहीं बनाया। देवी, देवताओं जो स्वर्ग में है वह अपने अच्छे कर्मों के कारण वहाँ है और भगवान नहीं माने जा सकते। यह देवी, देवता एक निश्चित समय के लिए वहाँ है और यह भी मरण उपरांत मनुष्य बनकर ही मोक्ष जा सकते है। जैन धर्म के अनुसार हर आत्मा का असली स्वभाव भगवंता है और हर आत्मा में अनंत दर्शन, अनंत शक्ति, अनंत ज्ञान और अनंत सुख है। आत्मा और कर्म पुद्गल के बंधन के कारण यह गुण प्रकट नहीं हो पाते। सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र के माध्यम से आत्मा के इस राज्य को प्राप्त किया जा सकता है। इन रतंत्रय के धारक को भगवान कहा जाता है। एक भगवान, इस प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जाता है - दुख से मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म और अंत में शरीर से भी मुक्ति। इसे निर्वाण या मोक्ष कहा जाता है। इस प्रकार, जैन धर्म में अनंत भगवान है, सब बराबर, मुक्त, और सभी गुण की अभिव्यक्ति में अनंत हैं।  जैन दर्शन के अनुसार, कर्म प्रकृति के मौलिक कण होते हैं। जिन्होंने कर्मों का हनन कर केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उन्हें अरिहन्त कहते है। तीर्थंकर विशेष अरिहन्त होते है जो 'धर्म तीर्थ' की रचना करते है, यानी की जो अन्य जीवों को मोक्ष-मार्ग दिखाते है।जैन धर्म किसी भी सर्वोच्च जीव पर निर्भरता नहीं सिखाता। तीर्थंकर आत्मज्ञान के लिए रास्ता दिखाते है, लेकिन ज्ञान के लिए संघर्ष ख़ुद ही करना पड़ता है।  भगवान का स्वरुप आचार्य समन्तभद्र विरचित रत्नकरण्ड श्रावकाचार के दो श्लोक आप्त (भगवान) का स्वरुप बताते हैं: आप्तेनो च्छिनदोषेण सर्वज्ञेनागमेशिना। भवितव्यं नियोगेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत्।।५। नियम से दोषों से रहित, सर्वज्ञ, हितोपदेशी पुरुष ही सच्चे देव होना चाहिए, अन्य किसी प्रकार देवत्व नहीं हो सकता।जलज २००६ ८ क्षुत्पिपासाजराजरातक्ड जन्मान्तकभयस्मयाः। न रागद्वेषमोहाश्च यस्याप्तः स प्रकीर्त्यते।। ६।। भूक, प्यास, बुढापा, रोग, जन्म, मरण, भय, घमण्ड, राग, द्वेष, मोह, निद्रा, पसीना आदि १८ दोष नहीं होते वही वीतराग देव कहें जाते हैं।जलज २००६ ८ पंच परमेष्ठी पंच परमेष्ठी जैन धर्म में, पंच परमेष्ठी धार्मिक अधिकारियों का पंच पदानुक्रम हैं, जो पूजनीय हैं। वे पाँच सर्वोच्च जीव निम्नलिखित हैं - अरिहंत सिद्ध आचार्य (मुनि संघ के प्रमुख) उपाध्याय (मनीषी गुरु) मुनि केवली केवली thumb|भरत चक्रवर्ती भी अरिहन्त हुए जिन्होंने चार घातिया कर्मों का क्षय कर दिया वह, अरिहन्त कहलाते है।प्रमाणसागर २००८ १४८ समस्त कशायों (जैसे क्रोध, मान, माया, लोभ) को नाश कर केवल ज्ञान प्राप्त करने वाले व्यक्ति अरिहन्त कहलाते है। इन्हें केवली भी का जाता है। अरिहन्त दो प्रकार के होते है: तीर्थंकर- २४ महापुरुष जो अन्य जीवों को मोक्ष मार्ग का उपदेश देते है। सामान्य केवली- जो अपना कल्याण करते है। तीर्थंकर (अरिहन्त) तीर्थंकर तीर्थंकर का अर्थ होता है जो धर्म तीर्थ को प्रवर्त करें। तीर्थंकर संसार सागर से पार करने वाले धर्म तीर्थ (मोक्ष मार्ग) को प्रवर्त करते है। तीर्थंकर चतुर्विध संघ की स्थापना भी करते है।प्रमाणसागर २००८ १६ तीर्थंकर की तुलना अन्य किसी देवी-देवता से नहीं की जा सकती, क्योंकि वे कषायरहित मुक्त जीवात्मा हैं। ततः मुक्त होने की वजह से, ब्रह्माण्ड में किसी की प्रार्थना के जवाब में हस्तक्षेप नहीं करते।Thrower (1980), p.93 सिद्ध सिद्ध (जैन धर्म) thumb|250px|सिद्धशिला जहाँ सिद्ध परमेष्ठी (मुक्त आत्माएँ) विराजती है सभी अरिहंत अपने आयु कर्म के अंत होने पर सिद्ध बन जाते है। सिद्ध बन चुकी आत्मा जीवन मरण के चक्र से मुक्त होती है। अपने सभी कर्मों का क्षय कर चुके, सिद्ध भगवान अष्टग़ुणो से युक्त होते है।प्रमाणसागर २००८ १४८ वह सिद्धशिला जो लोक के सबसे ऊपर है, वहाँ विराजते है। अनंत आत्माएँ सिद्ध बन चुकी है। जैन धर्म के अनुसार भगवंता किसी का एकाधिकार नहीं है और सही दृष्टि, ज्ञान और चरित्र से कोई भी सिद्ध पद प्राप्त कर सकता है। सिद्ध बन चुकी आत्मा लोक के किसी कार्य में दख़ल नहीं देती। सिद्ध देहरहित होते हैं।शास्त्री २००७ ८२ पूजा  जैनों द्वारा इन वीतरागी भगवानो की पूजा किसी उपकार या उपहार के लिए नहीं की जाती। वीतरागी भगवान की पूजा कर्मों को क्षय करने और भगवंता प्राप्त करने के लिए की जाती है। इन्हें भी देखें गुणस्थान सन्दर्भ सन्दर्भ ग्रन्थ प्रमाणसागर मुनि जैन तत्त्वविद्या २००८ भारतीय ज्ञानपीठ https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s 978-81-263-1480-5 10 जनवरी 2016 https://web.archive.org/web/20150925201536/https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s 25 सितंबर 2015 live Sangave Vilas Adinath Aspects of Jaina religion http://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC 3rd 2001 Bharatiya Jnanpith 81-263-0626-2 28 सितंबर 2015 https://web.archive.org/web/20160506083824/https://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC 6 मई 2016 live शास्त्री प. कैलाशचन्द्र जैन धर्म २००७ आचार्य शंतिसागर 'छाणी' स्मृति ग्रन्थमाला 81-902683-8-4 आचार्य समन्तभद्र कृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार जलज जयकुमार 2006 81-88769-04-5 बाहरी कड़िया जैन धर्म में तीर्थंकर कौन होते है ? श्रेणी:जैन धर्म श्रेणी:ईश्वर श्रेणी:जैन धर्म में भगवान