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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

आत्माराम अमृतसरी

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पंडित आत्माराम अमृतसरी (1866 - 1938) एक आर्यसमाजी विद्वान, समाजसुधारक एवं महान दलितोद्धारक थे। समय-समय पर उन्होंने पौराणिकों और मौलवियों से शास्त्रार्थ किए। 'शूद्र' कहकर तिरस्कृत लोगों को उन्होंने वैदिकधर्मी बनाकर भरी सभा में उनके हाथ से अन्न और जल ग्रहण किया था। आत्माराम अमृतसरी के अनुरोध पर ही भीमराव आम्बेडकर को कोल्हापुर नरेश ने इंग्लैंड जाकर आगे की पढाई करने के लिए छात्रवृति दी। बड़ोदरा राज्य की ओर से न्याय विभाग के लिए विविध भाषाओं में कोश बनाये गये थे। उसके हिन्दी विभाग की जिम्मेदारी आपको ही सौंपी गई थी। यह ग्रन्थ 'श्री सयाजी शासन कल्पतरु' के नाम से प्रकाशित हुआ था।डॉ0 बाबासाहेब अम्बेडकर ; लेखक- डॉ0 सूर्यनारायण रणसुभे ; राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली संस्करण/1992। जीवनी आत्माराम अमृतसरी का जन्म 1866 में एक राजस्थानी माहेश्वरी परिवार में अमृतसर में हुआ था। आपके पिता राधाकृष्ण जी लुधियाने के संपन्न तहसीलदार थे। जब आत्माराम केवल पाँच वर्ष के थे तभी पिता का देहान्त हो गया और माता की संरक्षता में विद्याभ्यास आरम्भ हुआ। मैट्रिक (१०वीं कक्षा) उतीर्ण कर आप लाहौर चले गए और गवर्नमेन्ट कॉलेज में प्रविष्ट हुए। जब एफ० ए० के फॉर्म जमा हो रहे थे तभी उनकी माताजी का गम्भीर बीमारी से देहान्त हो गया। कॉलेज जाने से पूर्व ही आप आर्यसमाज में प्रविष्ट हो चुके थे। 1891 में डिप्टी कमिश्नर मिस्टर लेन ने आपका तहसीलदारी के लिये चुना और नियुक्ति करा दी। इन्हीं दिनों में आर्यसमाज के पं० गुरुदत्तजी विद्यार्थी अमृतसर आये आपने सुने । आपकी विद्वत्ता से प्रभावित और उन्होंने इन्हें सरकारी नौकरी को त्याग कर आर्यसमाज के विशाल क्षेत्र में आने का आमंत्रण दिया। गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने ही उन्हें समझाया कि जाति लिखना रूढ़ि है, यह गुण-कर्म का बोधक नहीं है। उन्हीं के प्रभाव से आपने अपने गोत्र 'महेश्वरी' को हटाकर उसके स्थान पर 'अमृतसरी' कर दिया था। आपने गवर्नमेंट की समृद्ध सेवा से त्यागपत्र दे दिया और तहसीलदारी को अस्वीकार कर लाहौर पहुंचे। वहां पर आपने पाणिनि की अष्टाध्यायी का अध्ययन किया और इसे भाष्य सहित कण्ठस्थ भी कर लिया। गीतासार सन् १८९१ में उन्होंने दयानन्द हाईस्कूल लाहौर में अध्यापन किया और उसी समय (1894) वे पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा, लाहौर के उपमन्त्री भी बने। सन् 1897 में पंडित लेखराम का बलिदान हो जाने के पश्चात् पं० आत्माराम ने स्वामी दयानन्द विषयक जीवन-सामग्री को सूत्रबद्ध कर एक बृहद् ग्रन्थ का रूप प्रदान किया। यह सामग्री पंडित लेखराम ने पूरे भारवर्ष में घूमकर संकलित की थी। रहतियों की शुद्धि पंजाब के रहतिये कहने को सिख थे किन्तु 'अछूत' समझे जाते थे। आर्यसमाज ने जब उन्हें शुद्ध किया तो आत्माराम जी ने सबसे आगे बढ़कर अपने हाथ से उन्हें जल ग्रहण करवाया। इस कारण मास्टर जी (आत्माराम) की अपनी जाति वालों ने उनका बहिष्कार भी कर दिया था। पर वे अडिग रहे। जीवन के आरम्भ काल से ही शुद्धि का काम, अछूतोद्धार, विधवा विवाह तथा सामाजिक कुरीतियों का प्रतिवाद उनके जीवन का महत्वपूर्ण अंग था। इसीलिए आपने अपनी संतानों के विवाह सम्बन्ध भी बिना किसी जातिबन्धन के किये। दलितोद्धार के कार्य सितम्बर 1909 में आत्माराम पत्नी के संग पंजाब से चलकर वडोदरा पहुंच गए। वडोदरा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ प्रगतिशील विचारधारा के नरेश थे। आप स्वामी दयानन्द के क्रांतिकारी चिंतन से प्रेरित होकर दलितों के उद्धार के लिए प्रयासरत रहते थे। दलितों को विधर्मी बनते देख बड़ोदरा नरेश ने जब अपनी रियासत में दलितोद्धार के कार्य को प्रभावशाली बनाने का संकल्प किया, तब उन्होंने स्वामी दयानन्द के शिष्य आर्य सन्यासी स्वामी नित्यानन्द ब्रह्मचारी (1860-1914) से ऐसे व्यक्ति की माँग की जो उच्चवर्णीय होते हुए भी दलितों में ईमानदारी से कार्य कर सके। उस समय स्वामी नित्यानन्द जी ने मास्टर आत्माराम जी से अनुरोध किया। तदनुसार पं० आत्मारामजी ने सन् 1908 से 1917 तक बड़ोदरा रियासत में और तत्पश्चात् कोल्हापुर रियासत में दलितोद्धार का कार्य किया। दलितों में उनके द्वारा किये गये कार्य की महात्मा गाँधी, कर्मवीर विट्ठल रामजी शिंदे, श्री जुगल किशोर बिड़ला, इन्दौर नरेश तुकोजीराव होल्कर आदि ने मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। आदर्श दम्पत्ति : सुश्री सुशीला पण्डिता बड़ोदरा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ को दलितोद्धार के कार्य में सफलता उस समय से प्राप्त हुई जब उन्होंने पं0 आत्मारामजी को अपनी रियासत के छात्रावासों का अध्यक्ष और पाठशालाओं का निरीक्षक नियुक्त किया था। बड़ोदरा रियासत में शूद्रातिशूद्रों के लिए जो सैकड़ों पाठशालाएँ स्थापित की गई थीं, उनमें लगभग बीस हजार बालक बालिकाओं ने शिक्षा ग्रहण की थी। बड़ोदरा में उन्होंने आर्य कन्या महाविद्यालय की भी स्थापना की थी। महाराजा छत्रपति शाहू कोहलापुर बरोडा के महाराज के सम्बन्धी थे। कोल्हापुर नरेश शाहू महाराज जब बड़ोदरा पधारे तो पं0 आत्मारामजी के कार्यों से बहुत ही प्रभावित हुए और उन्हें शीघ्र ही कोल्हापुर आने का निमंत्रण दे गये। 1918 में जब पं0 आत्माराम कोल्हापुर पधारे तो शाहू महाराज ने उन्हें अपना मित्र ही नहीं, अपितु धर्मगुरु भी माना और अपनी रियासत को आर्यधर्मी बनाने के लिए उनके कर-कमलों से जनवरी 1918 में आर्यसमाज की स्थापना की। कोल्हापुर के राजाराम महाविद्यालय आदि शिक्षण संस्थाओं को भी उन्होंने संचालन हेतु आर्य संस्थाओं को सौंप दिया। दलितों के महान उद्धारक: मास्टर आत्माराम अमृतसरी इस प्रकार गुजरात की बड़ोदरा और महाराष्ट्र की कोल्हापुर रियासत के माध्यम से पं0 आत्माराम जी ने सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्र में कार्य करते हुए दलितोद्धार की दृष्टि से उल्लेखनीय भूमिका निभायी थी। दलितोद्धार के कार्य के लिये पंडित आत्माराम अमृतसरी को अत्यन्त विरोध और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। जब १९०९ में वडोदरा आये तो आप गुजरात में नये थे। यहाँ के रहन-सहन, रीति रिवाज, भाषा से अनभिज्ञ थे और आपको काम मिला अनेक वर्षों से पीड़ित और दबाये जा रहे समाज के अंग का पुनरुद्धार। यह कार्य बरोडा के शहर में नहीं अपितु ग्रामों में करना था जहाँ पर निरक्षरता और सामाजिक पतन शहरों से अधिक था। लेकिन स्वामी दयानन्द का यह शिष्य बिना निराशा के अपने कार्यों में लग गया। कार्य करते समय अंधविश्वास से ग्रसित लोग इन्हें सरकारी धर्मशाला में भी ठहरने नहीं देते थे। इनके कर्मचारियों को कुएँ से पानी नहीं भरने देते थे। इन पर पत्थर फेंके जाते और कोई इनसे व्यवहार नहीं करता था। इतनी परेशानियों के बाद भी आपने महाराज से कभी इसकी शिकायत नहीं की। वडोदरा में आपने वहाँ आश्रम खोला जो पहले "भूतिया बंगले" के नाम से प्रसिद्ध था। कोई इस स्थान पर जाता नहीं था। इसलिए मास्टर जी ने इसी स्थान पर आश्रम खोलने का विचार बनाया। महान पुरुषार्थ से मास्टर जी ने वडोदरा राज्य में चार बड़े आश्रम और 300 शालाएं खोली। आप स्वयं वडोदरा स्थित आश्रम के सुपरिटेंडेंट और 300 शालाओं के 'एजुकेशनल इंस्पेक्टर फॉर डिप्रेस्ड क्लास' नियुक्त हुए। पढ़ने वाले बच्चे आपको 'पिताजी' और आपकी पत्नी को 'माताजी' कहकर सम्बोधित करते थे। सयाजीराव ने अपनी पाठशालाओं में हिंदी को अनिवार्य किया था। यह उनका राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम था। मास्टर जी के प्रेम से बालकों ने गुजराती भाषी होते हुए भी शीघ्र ही हिंदी को अपना लिया। मास्टर जी द्वारा खोले गए अत्यंज वसतिगृह में मुख्य रूप से जुलाहे समाज के बच्चे बड़ी संख्या में प्रविष्ट हुए थे। कुछ वर्षों के पश्चात 'भंगी' कहलाने वाले समाज की एक कन्या प्रविष्ट हुई। इसका ऐसा प्रभाव और परिणाम हुआ कि सब छात्र-छात्राओं तथा रसोइयों ने विरोध किया और खाना बंद कर दिया। मास्टर जी उनके ऐसे रवैये को देखकर तनिक भी विचलित नहीं हुए और उस कन्या को अपने घर में रख लिया। फिर उन्हें समझाया कि स्वच्छता मनुष्य के अछूतपन को दूर करती है। किसी के माथे पर जन्म से ऊंच-नीच का भेदभाव या जाति लिखी नहीं आती। उनकी पाठशालाओं में सभी सेवक अछूत समाज से ही होते थे। प्रभु भक्ति, नित्य संध्या, हवन प्रार्थना, भजन आदि आपके जीवन के अभिन्न अंग थे। इसलिए आपने इनको दलित बालकों में खूब प्रचारित किया। जब लोग यह मानते थे कि स्त्री और शूद्र वेद मंत्र न पढ़े , न सुने और न ही बोले तब आपने दलित लड़के-लड़कियों को वेद मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण और गीता पाठ सिखाया। बड़े-बड़े विद्वान, सनातनी पंडित उच्चारण सुनकर दंग रह जाते थे। आपके समान ही आपकी संतान भी दलितों के उद्धार कार्य में लगी। आपके अनेक दलित शिष्य पढ़कर बड़े बड़े पदों पर आसीन हुए। स्वयं महात्मा गाँधी ने बरोडा स्थित अत्यंज वसतिगृह को जब देखा तो उनके कार्यक्रम में दलितोद्धार शामिल हो गया। मास्टर जी को वडोदरा महाराज ने पहले 'पंडितजी', फिर 'राज्यरत्न' और बाद में 'राजमित्र' की उपाधि से सम्मानित किया था। ग्रन्थरचना मौलिक और अनूदित कुल मिलाकर उन्होंने लगभग बीस ग्रन्थ लिखे थे। सृष्टिविज्ञान, अर्थात पुरुषसूक्त के आदि सृष्टि तथा वेदोत्पत्ति सम्बन्धी मन्त्रों की वैज्ज्यानिक व्याख्यासृष्टिविज्ञान गीतासार संस्कार-चन्द्रिका, तुलनात्मक धर्म-विचार, दिग्विज्ञान ब्रह्मयज्ञ, शरीर-विज्ञानं, वैदिकविवाहादर्श सामान्यधर्म, आत्मस्थान-विज्ञान, आर्य-धर्मेन्द्र जीवन बड़ोदरा राज्य की ओर से न्याय विभाग के लिए विविध भाषाओं में कोश बनाये गये थे। उसके हिन्दी विभाग की जिम्मेदारी आपको ही सौंपी गई थी। यह ग्रन्थ ’श्री सयाजी शासन कल्पतरु‘ के नाम से प्रकाशित हुआ था। डॉ0 बाबासाहेब अम्बेडकर : लेखक-डॉ0 सूर्यनारायण रणसुभे ; राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली संस्करण/1992। सन्दर्भ इन्हें भी देखें आर्यसमाज पण्डित लेखराम आर्य गुरुदत्त विद्यार्थी बाहरी कड़ियाँ मास्टर आत्माराम अमृतसरी और डॉ0 अम्बेडकर https://web.archive.org/web/20210417192453/http://aryamantavya.in/master-aatmaram-aur-dr-ambedkar/ 17 अप्रैल 2021 श्रेणी:आर्य समाज श्रेणी:समाज सुधारक