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श्रीविजय पर चोलों का आक्रमण
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श्रीविजय साम्राज्य पर चोल राजा का आक्रमण राजेंद्र चोल प्रथम का दक्षिण-पूर्व एशिया अभियान 1025–1026 ADMiksic John N. Ancient Southeast Asia Goh Geok Yian 2017 Routledge London 394, 402 पालेमबांग (सुमात्रा) और केदाह (मलय प्रायद्वीप), श्रीविजय चोल विजय
श्रीविजय मेंचोल का प्रभाव
संग्राम विजयतुंगगवर्मन पर कब्ज़ा कर लिया गया
श्रीविजय मण्डल का विघटन 22px चोल साम्राज्य 23px|border श्रीविजय साम्राज्य 22px राजेन्द्र चोल प्रथम22px बीमासीनन22px अमरबुजंगन दिवाकर 22pxकरुणाकरण 23px|border संग्राम I23px|border समारा विजयतुंगगवर्मन चोल नौसेनाचोल सेना श्रीविजय नौसेनाश्रीविजय सेना
1025 ईस्वी में चोल सम्राट राजेंद्र प्रथम ने समुद्री दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध एक व्यापक नौसैनिक अभियान आरम्भ किया। इस आक्रमण के परिणामस्वरूप श्रीविजय के शक्तिशाली शैलेन्द्र राजवंश का पतन आरम्भ हुआ और क्षेत्र की राजनीतिक तथा व्यापारिक संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ा।Munoz Paul Michel Early Kingdoms of the Indonesian Archipelago and the Malay Peninsula Editions Didier Millet 2006 Singapore https://books.google.com/books?id=NqwuAQAAIAAJ 981-4155-67-5
राजेंद्र प्रथम का यह विदेशी अभियान भारतीय इतिहास में एक अत्यंत विशिष्ट घटना माना जाता है, क्योंकि दक्षिण-पूर्व एशियाई राज्यों के साथ भारत के संबंध सामान्यतः सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक सहयोग पर आधारित रहे थे। चोल साम्राज्य के इस अभियान के दौरान वर्तमान इंडोनेशिया और मलय प्रायद्वीप के अनेक महत्त्वपूर्ण बंदरगाहों तथा समुद्री केंद्रों पर आक्रमण किए गए।Nagapattinam to Suvarnadwipa: Reflections on the Chola Naval Expeditions to Southeast Asia by Hermann Kulke, K Kesavapany, Vijay Sakhuja p.170Trade and Trade Routes in Ancient India by Moti Chandra p.214 यह केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि समुद्री व्यापार मार्गों पर प्रभाव स्थापित करने का भी प्रयास था।
इस अभियान के बाद दक्षिण पूर्व एशिया में तमिल व्यापारी संघों—जैसे मणिग्रामम्, अय्यावोले और ऐन्नूरुवर—की गतिविधियों और प्रभाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।Buddhism, Diplomacy, and Trade: The Realignment of Sino-Indian Relations 600-1400 by Tansen Sen p.159Power and Plenty: Trade, War, and the World Economy in the Second Millennium by Ronald Findlay, Kevin H. O'Rourke p.69Wink, André, Al-Hind: The Making of the Indo-Islamic World, Vol. I, Early Medieval India and the Expansion of Islam: 7th-11th centuries, p.325, 978-0391041738Ancient Indian History and Civilization by Sailendra Nath Sen p.564 इन व्यापारिक समुदायों ने भारतीय संस्कृति, भाषा, व्यापारिक परंपराओं और धार्मिक विचारों को समुद्री मार्गों के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चोलों का यह अभियान महान बंगाली बौद्ध विद्वान अतीश के जीवनकाल से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। लगभग 982 से 1054 ईस्वी के मध्य जीवित रहे अतीश उसी समय सुमात्रा से भारत और तिब्बत की ओर लौट रहे थे।Atisa and Tibet: Life and Works of Dipamkara Srijnana by Alaka Chattopadhyaya p.91
सन्दर्भ
श्रेणी:सागर-पार साम्राज्य