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निर्मल वर्मा
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निर्मल वर्मा Nirmal Verma (1929 - 2005).jpg 250px yes 1929 4 3 शिमला, ब्रिटिश भारत yes 2005 10 25 1929 4 3 नई दिल्ली, भारत भारतीय उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, अनुवादक वे दिन, रात का रिपोर्टर, परिंदे यथार्थवाद, साहित्य * साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985)
* ज्ञानपीठ पुरस्कार (1999)
निर्मल वर्मा (3 अप्रैल 1929- 25 अक्तूबर 2005) हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। शिमला में जन्मे निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार (1995), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985) उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। परिंदे से प्रसिद्धि पाने वाले निर्मल वर्मा की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं। ब्रिटिश भारत सरकार के रक्षा विभाग में एक उच्च पदाधिकारी श्री नंद कुमार वर्मा के घर जन्म लेने वाले आठ भाई बहनों में से पाँचवें निर्मल वर्मा की संवेदनात्मक बुनावट पर हिमाचल की पहाड़ी छायाएँ दूर तक पहचानी जा सकती हैं। हिन्दी कहानी में आधुनिक-बोध लाने वाले कहानीकारों में निर्मल वर्मा का अग्रणी स्थान है। उन्होंने कम लिखा है परंतु जितना लिखा है उतने से ही वे बहुत ख्याति पाने में सफल हुए हैं। उन्होंने कहानी की प्रचलित कला में तो संशोधन किया ही, प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर उसके भीतर पहुँचने का भी प्रयत्न किया है।मेरी प्रिय कहानियाँ, निर्मल वर्मा, राजपाल एंड सन्ज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली, संस्करण-2014, अंतिम आवरण पर उल्लिखित। हिन्दी के महान साहित्यकारों में से अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे कुछ ही साहित्यकार ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर भारतीय और पश्चिम की संस्कृतियों के अन्तर्द्वन्द्व पर गहनता एवं व्यापकता से विचार किया है।निर्मल वर्मा के चिंतन में भारत और यूरोप का द्वन्द्जून 2020 InternetArchiveBot । सृजन शिल्पी। ७ अक्टूबर २००६
प्रारंभिक जीवन
इनका जन्म 3 अप्रैल 1929 को शिमला में हुआ था।साहित्यकार निर्मल वर्मा का निधन https://web.archive.org/web/20090501205338/http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2005/10/051026_nirmalverma_obit.shtml 1 मई 2009 । बीबीसी-हिन्दी। २६ अक्टूबर २००५ दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कालेज से इतिहास में एम ए करने के बाद कुछ दिनों तक उन्होंने अध्यापन किया। इन्हें वर्ष 1949 से 1972 तक यूरोप में प्रवास करने का अवसर मिला था और इस दौरान उन्होंने लगभग समूचे यूरोप की यात्रा करके वहाँ की भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का नजदीक से परिचय प्राप्त किया था। 1959 से प्राग (चेकोस्लोवाकिया) के प्राच्य विद्या संस्थान में सात वर्ष तक रहे। उसके बाद लंदन में रहते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया के लिये सांस्कृतिक रिपोर्टिंग की। 1972 में स्वदेश लौटे। 1977 में आयोवा विश्व विद्यालय (अमरीका) के इंटरनेशनल राइटर्स प्रोग्राम में हिस्सेदारी की। उनकी कहानी माया दर्पण पर फिल्म बनी जिसे 1973 का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म का पुरस्कार प्राप्त हुआ।भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र, निर्मल वर्मा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण-2001, अंतिम आवरण फ्लैप पर लेखक-परिचय के अंतर्गत उल्लिखित। वे इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ एडवांस स्टडीज़ (शिमला) के फेलो रहे (1973) और मिथक-चेतना पर कार्य किया,परिंदे, निर्मल वर्मा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पेपरबैक संस्करण-1999, पृष्ठ-1. निराला सृजनपीठ भोपाल (1981-83) और यशपाल सृजनपीठ (शिमला) के अध्यक्ष रहे (1989)। 1988 में इंगलैंड के प्रकाशक रीडर्स इंटरनेशनल द्वारा उनकी कहानियों का संग्रह द वर्ल्ड एल्सव्हेयर प्रकाशित। इसी समय बीबीसी द्वार उनपर डाक्यूमेंट्री फिल्म प्रसारित हुई थी। फेफड़े की बीमारी से जूझने के बाद 76 वर्ष की अवस्था में 26 अक्तूबर, 2005 को दिल्ली में उनका निधन हो गया।
अपनी गंभीर, भावपूर्ण और अवसाद से भरी कहानियों के लिए जाने-जाने वाले निर्मल वर्मा को आधुनिक हिंदी कहानी के सबसे प्रतिष्ठित नामों में गिना जाता रहा है, उनके लेखन की शैली सबसे अलग और पूरी तरह निजी थी। निर्मल वर्मा को भारत में साहित्य का शीर्ष सम्मान ज्ञानपीठ 1999 में दिया गया। 'रात का रिपोर्टर', 'एक चिथड़ा सुख', 'लाल टीन की छत' और 'वे दिन' उनके बहुचर्चित उपन्यास हैं। उनका अंतिम उपन्यास में 1990 प्रकाशित हुआ था--अंतिम अरण्य। उनकी एक सौ से अधिक कहानियाँ कई संग्रहों में प्रकाशित हुई हैं जिनमें 'परिंदे', 'कौवे और काला पानी', 'बीच बहस में', 'जलती झाड़ी' आदि प्रमुख हैं। 'धुंध से उठती धुन' और 'चीड़ों पर चाँदनी' उनके यात्रा वृतांत हैं जिन्होंने लेखन की इस विधा को नए मायने दिए हैं। निर्मल वर्मा को सन 2002 में भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
अपने निधन के समय निर्मल वर्मा भारत सरकार द्वारा औपचारिक रूप से नोबेल पुरस्कार के लिए नामित थे।शताब्दी के ढलते वर्षों में, निर्मल वर्मा, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, चतुर्थ संस्करण-2006, अंतिम आवरण फ्लैप पर उल्लिखित।
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास
वे दिन -1964
लाल टीन की छत -1974
एक चिथड़ा सुख -1979
रात का रिपोर्टर -1989
अंतिम अरण्य -2000
ठंडा गोशत -1969
कहानी संग्रह
परिन्दे -1959
जलती झाड़ी -1965
पिछली गर्मियों में -1968
बीच बहस में -1973
कव्वे और काला पानी -1983
सूखा तथा अन्य कहानियाँ -1995
थिगालियां -2024
यात्रा-संस्मरण एवं डायरी
चीड़ों पर चाँदनी -1963
हर बारिश में -1970
धुंध से उठती धुन -1997
निबन्ध संग्रह
चीड़ो पर चाँदनी –1964
हर बारिश में –1970
शब्द और स्मृति -1976
कला का जोखिम -1981
ढलान से उतरते हुए -1985
भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र -1991
इतिहास, स्मृति, आकांक्षा -1991
शताब्दी के ढलते वर्षों में –1995
दूसरे शब्दों में –1997
आदि, अन्त और आरम्भ -2001
सर्जना पथ के सहयात्री -2005
साहित्य का आत्म-सत्य -2005
संचयन
मेरी प्रिय कहानियाँ -1973
दूसरी दुनिया -1978
प्रतिनिधि कहानियाँ -1988
शताब्दी के ढलते वर्षों में (प्रतिनिधि निबन्ध) -1995
ग्यारह लम्बी कहानियाँ -2000
नाटक
तीन एकान्त -1976
संभाषण/साक्षात्कार/पत्र
दूसरे शब्दों में -1999
प्रिय राम (अवसानोपरांत प्रकाशित) -2006
संसार में निर्मल वर्मा (अवसानोपरांत प्रकाशित) -2006
अनुवाद
कुप्रिन की कहानियाँ -1955
रोमियो जूलियट और अँधेरा -1964
कारेल चापेक की कहानियाँ -1966
इतने बड़े धब्बे -1966
झोंपड़ीवाले -1966
बाहर और परे -1967
बचपन -1970
आर यू आर -1972
एमेके एक गाथा -1973
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
निर्मल वर्मा की कृतियाँ - पुस्तक.ऑर्ग पर
निर्मल वर्मा - गद्यकोश पर
निर्मल का लेखन चित्रमय ही नहीं, चलचित्रमय भी – गाँधी। सृजनगाथा। निर्मल वर्मा स्मृति व्याख्यान। १२ मई २००७
'स्वस्थ साहित्य किसी की नक़ल नहीं करता'- निर्मल वर्मा के प्रेमचंद पर विचार (बीबीसी-हिन्दी)
इन्हें भी देखें
हिन्दी गद्यकार
हिन्दी साहित्य
श्रेणी:पद्म भूषण
श्रेणी:ज्ञानपीठ सम्मानित
श्रेणी:निर्मल वर्मा
श्रेणी:साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी भाषा के साहित्यकार
श्रेणी:शलाका सम्मान
श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना
श्रेणी:मूर्तिदेवी पुरस्कार प्राप्तकर्ता
श्रेणी:साहित्य अकादमी फ़ैलोशिप से सम्मानित