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411 समाचार
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सरणा धर्म

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सरणा धर्म भारत के झारखंड राज्य तथा पड़ोसी क्षेत्रों में निवास करने वाली आदिवासी जनजातियों का पारंपरिक आस्था-आधारित धर्म है। यह मुख्यतः संथाल, मुंडा, उरांव, हो, और अन्य आदिवासी समुदायों द्वारा मान्य है। सरणा शब्द का अर्थ है – पवित्र वन या साल वृक्ष का स्थान। परिचय सरणा धर्म प्रकृति-आधारित आस्था प्रणाली है, जिसमें जंगल, वृक्ष, जल, सूर्य, चन्द्रमा और प्रकृति की शक्तियों की पूजा की जाती है। इस धर्म के अनुयायी साल वृक्ष को पवित्र मानते हैं और गाँवों में सरना स्थल (साल वृक्ष का उपवन) सामूहिक पूजा का मुख्य केंद्र होता है। मान्यताएँ और अनुष्ठान सरना धर्म में सर्वोच्च देवता को धरती बाबा कहा जाता है, जो सृष्टि और जीवन के रक्षक माने जाते हैं। प्राकृतिक शक्तियों की पूजा, फसल उत्सव, और ऋतु-चक्र आधारित त्यौहार इस धर्म का मुख्य अंग हैं। पूजा-अर्चना जनजातीय पुजारी (पाहन) या गाँव के बुजुर्गों द्वारा की जाती है। त्योहार सारण पर्ब – फसल और प्रकृति की उर्वरता से जुड़ा प्रमुख पर्व। सरहुल – वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला फूलों और पेड़ों का पर्व। करम – करम वृक्ष की पूजा और नृत्य-गीतों से मनाया जाने वाला त्यौहार। वर्तमान स्थिति झारखंड राज्य में सरना धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में हैं। 2021 में झारखंड विधानसभा ने भारत सरकार से आग्रह किया कि जनगणना प्रपत्र में सरना धर्म को अलग से धर्म के रूप में मान्यता दी जाए। फिलहाल, अनुयायी स्वयं को प्रायः "अन्य" या "जनजातीय धर्म" के अंतर्गत दर्ज करते हैं। महत्व सरणा धर्म केवल धार्मिक प्रणाली नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का भी प्रतीक है। यह पर्यावरण संरक्षण, सामूहिक जीवन और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है। इन्होंने भी देखें झारखंड के धार्मिक स्थल आदिवासी धर्म झारखंड संदर्भ श्रेणी:झारखंड के धर्म श्रेणी:भारत के धर्म श्रेणी:आदिवासी धर्म