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411 समाचार
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कोणार्क

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कोणार्क Konarkକୋଣାର୍କ Konark Surya Temple.jpg कोणार्क का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर कोणार्क India Odisha 19.89 86.10 inline, title ओड़िशा में स्थिति देश प्रान्त ओड़िशा ज़िला पुरी ज़िला 16779 2011 भाषा प्रचलित ओड़िया भारतीय मानक समय +5:30 thumb|280px|रात्रि में कोणार्क सूर्य मंदिर thumb|280px|कोणार्क सूर्य मंदिर की बाहरी दीवार पर बना एक रथचक्र कोणार्क (Konark) भारत के ओड़िशा राज्य के पुरी ज़िले में स्थित एक नगर है। यहाँ से राष्ट्रीय राजमार्ग ३१६ए गुज़रता है। यह जगन्नाथ मन्दिर से 21 मील उत्तर-पूर्व समुद्रतट पर चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित है। यहाँ का सूर्य मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है। इस मंदिर की कल्पना सूर्य के रथ के रूप में की गई है। रथ में बारह जोड़े विशाल पहिए लगे हैं और इसे सात शक्तिशाली घोड़े तेजी से खींच रहे हैं। जितनी सुंदर कल्पना है, रचना भी उतनी ही भव्य है। मंदिर अपनी विशालता, निर्माणसौष्ठव तथा वास्तु और मूर्तिकला के समन्वय के लिये अद्वितीय है और उड़ीसा की वास्तु और मूर्तिकलाओं की चरम सीमा प्रदर्शित करता है। एक शब्द में यह भारतीय स्थापत्य की महत्तम विभूतियों में है। "Orissa reference: glimpses of Orissa," Sambit Prakash Dash, TechnoCAD Systems, 2001"The Orissa Gazette," Orissa (India), 1964"Lonely Planet India," Abigail Blasi et al, Lonely Planet, 2017, ISBN 9781787011991 कोणार्क का सूर्य मंदिर यह विशाल मंदिर मूलत: चौकोर (865न्540 फुट) प्राकार से घिरा था जिसमें तीन ओर ऊँचे प्रवेशद्वार थे। मंदिर का मुख पूर्व में उदीयमान सूर्य की ओर है और इसके तीन प्रधान अंग - देउल (गर्भगृह), जगमोहन (मंडप) और नाटमंडप - एक ही अक्ष पर हैं। सबसे पहले दर्शक नाटमंडप में प्रवेश करता है। यह नाना अलंकरणों और मूर्तियों से विभूषित ऊँची जगती पर अधिष्ठित है जिसकी चारों दिशाओं में सोपान बने हैं। पूर्व दिशा में सोपानमार्ग के दोनों ओर गजशार्दूलों की भयावह और शक्तिशाली मूर्तियाँ बनी हैं। नाटमंडप का शिखर नष्ट हो गया है, पर वह नि:संदेह जगमोहन शिखर के आकार का रहा होगा। उड़ीसा के अन्य विकसित मंदिरों में नाटमंडप और भोगमंदिर भी एक ही अक्ष में बनते थे जिससे इमारत लंबी हो जाती थी। कोणार्क में नाटमंडप समानाक्ष होकर भी पृथक् है और भोगमंदिर अक्ष के दक्षिणपूर्व में है; इससे वास्तुविन्यास में अधिक संतुलन आ गया है। नाटमंडप से उतरकर दर्शक जगमोहन की ओर बढ़ता है। दोनों के बीच प्रांमण में ऊँचा एकाश्म अरूणस्तंभ था जो अब जगन्नाथपुरी के मंदिर के सामने लगा है। जगमोहन और देउल एक ही जगती पर खड़े हैं और परस्पर संबद्ध हैं। जगती के नीचे गजथर बना है जिसमें विभिन्न मुद्राओं में हाथियों के सजीव दृश्य अंकित हैं। गजथर के ऊपर जगती अनेक घाटों और नाना भाँति की मूर्तियों से अलंकृत है। इसके देवी देवता, किन्नर, गंधर्व, नाग, विद्याधरव्यालों और अप्सराओं के सिवा विभिन्न भावभंगियों में नर नारी तथा कामासक्त नायक नायिकाएँ भी प्रचुरता से अंकित हैं। संसारचक्र की कल्पना पुष्ट करने के लिये जगती की रचना रथ के सदृश की गई है और इसमें चौबीस बृहदाकार (9 फुट 8 इंच व्यास के) चक्के लगे हैं जिनका अंगप्रत्यंग सूक्ष्म अलंकरणों से लदा हुआ है। जगती के अग्र भाग में सोपान-पंक्ति है जिसके एक ओर तीन और दूसरी ओर चार दौड़ते घोड़े बने हैं। ये सप्ताश्व सूर्यदेव की गति और वेग के प्रतीक हैं जिनसे जगत् आलोकित और प्राणन्वित है। देउल का शिखर नष्ट हो गया है और जंघा भी भग्नावस्था में है, पर जगमोहन सुरक्षित है और बाहर से 100 फुट लंबा चौड़ा और इतना ही ऊँचा है। भग्नावशेष से अनुमान है कि देउल का शिखर 200 फुट से भी अधिक ऊँचा और उत्तर भारत का सबसे उत्तुंग शिखर रहा होगा। देउल और जगमोहन दोनों ही पंचरथ और पंचांग है पर प्रत्येक रथ के अनेक उपांग है और तलच्छंद की रेखाएँ शिखर तक चलती है। गर्भगृह (25 फुट वर्ग) के तीनों भद्रों में गहरे देवकोष्ठ बने हैं जिनमें सूर्यदेव की अलौकिक आभामय पुरूषाकृति मूर्तियाँ विराजमान हैं। जगमोहन का अलंकृत अवशाखा द्वार ही भीतर का प्रवेशद्वार है। जगमोहन भीतर से सादा पर बाहर से अलंकरणों से सुसज्जित है। इसका शिखर स्तूपकोणाकार (पीढ़ा देउल) है और तीन तलों में विभक्त है। निचले दोनों तलों में छह छह पीढ़ हैं जिनमें चतुरंग सेना, शोभायात्रा, रत्यगान, पूजापाठ, आखेट इत्यादि के विचित्र दृश्य उत्कीर्ण हैं। उपरले में पाँच सादे पीढ़े हैं। तलों के अंतराल आदमकद स्त्रीमूर्तियों से सुशोभित हैं। ये ललित भंगिमों में खड़ी बाँसुरी, शहनाई, ढोल, मृढंग, झाँझ और मजीरा बजा रही हैं। उपरले तल के ऊपर विशाल घंटा और चोटी पर आमलक रखा है। स्त्रीमूर्तियों के कारण इस शिखर में अद्भुत सौंदर्य के साथ प्राण का भी संचार हुआ है जो इस जगमोहन की विशेषता है। वास्तुतत्वज्ञों की राय में इससे सुघड़ और उपयुक्त शिखर कल्पनातीत है। (कृ. दे। ) इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के प्रतापी नरेश नरर्सिह देव (प्रथम) (1238-64 ई.) ने अपने एक विजय के स्मारक स्वरूप कराया था। इसके निर्माण में 1200 स्थपति 12 वर्ष तक निरंतर लगे रहे। अबुल फजल ने अपने आइने-अकबरी में लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के बारह वर्ष की समुची आय लगी थी। उनका यह भी कहना है कि यह मंदिर नवीं शती ई. में बना था, उस समय उसे केसरी वंश के किसी नरेश ने निर्माण कराया था। बाद में नरसिंह देव ने उसको नवीन रूप दिया। इस मंदिर के आस पास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं, ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर के निर्माण के लिये पत्थर कहाँ से और कैसे लाए गए यह एक अनुत्तरित जिज्ञासा है। इस मंदिर के निर्माण के संबंध में एक दंतकथा प्रचलित है कि संपूर्ण प्रकार के निर्माण हो जाने पर शिखर के निर्माण की एक समस्या उठ खड़ी हुई। कोई भी स्थपति उसे पूरा कर न सका तब मुख्य स्थपति के धर्मपाद नामक 12 वर्षीय पुत्र ने यह साहसपूर्ण कार्य कर दिखाया। उसके बाद उसने यह सोचकर कि उसके इस कार्य से सारे स्थपतियों की अपकीर्ति होगी और राजा उनसे नाराज हो जाएगा, उसने उस शिखर से कूदकर आत्महत्या कर ली। एक अन्य स्थानीय अनुश्रुति है कि मंदिर के शिखर में कुंभर पाथर नामक चुंबकीय शक्ति से युक्त पत्थरलगा था। उसके प्रभाव से इसके निकट से समुद्र में जानेवाले जहाज और नौकाएँ खिंची चली आती थीं और टकराकर नष्ट हो जाती थीं। कहा जाता है कि काला पहाड़ नामक प्रसिद्ध आक्रमणकारी मुसलमान ने इस मंदिर को ध्वस्त किया किंतु कुछ अन्य लोग इसके ध्वंस का कारण भूकंप मानते हैं। इस स्थान के एक पवित्र तीर्थ होने का उल्लेख कपिलसंहिता, ब्रह्मपुराण, भविष्यपुराण, सांबपुराण, वराहपुराण आदि में मिलता है। उनमें इस प्रकार एक कथा दी हुई है। कृष्ण के जांबवती से जन्मे पुत्र सांब अत्यन्त सुंदर थे। कृष्ण की स्त्रियाँ जहाँ स्नान किया करती थीं, वहाँ से नारद जी निकले। उन्होंने देखा कि वहाँ स्त्रियाँ सांब के साथ प्रेमचेष्टा कर रही है। यह देखकर नारद श्रीकृष्ण को वहाँ लिवा लाए। कृष्ण ने जब यह देखा तब उन्होंन उसे कोढ़ी हो जाने का शाप दे दिया। जब सांब ने अपने को इस संबंध में निर्दोष बताया तब कृष्ण ने उन्हें मैत्रये बन (अर्थात् जहाँ कोणार्क है) जाकर सूर्य की आराधना करने को कहा। सांब की आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिया। दूसरे दिन जब वे चंद्रभागा नदी में स्नान करने गए तो उन्हें नदी में कमल पत्र पर सूर्य की एक मूर्ति दिखाई पड़ी। उस मूर्ति को लाकर सांब ने यथाविधि स्थापना की और उसकी पूजा के लिये अठारह शाकद्वीपी ब्राह्मणों को बुलाकर वहाँ बसाया। पुराणों में इस सूर्य मूर्ति का उल्लेख कोणार्क अथवा कोणादित्य के नाम से किया गया है। कहते है कि रथ सप्तमी को सांब ने चंद्रभागा नदी में स्नानकर उक्त मूर्ति प्राप्त की थी। आज भी उस तिथि को वहाँ लोग स्नान और सूर्य की पूजा करने आते हैं। निर्माण इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में उड़ीसा के राजा नरसिंहदेव-I ने करवाया था। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण के बारह वर्षों से लकवाग्रस्त पुत्र संबा को सूर्य देव ने ठीक किया था। इस कारण उन्होंने सूर्य देव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण किया था। आंतरिक मंदिर के भीतर एक नृत्यशाला और दर्शकों के लिए एक हॉल है। कई नक्काशियां, विशेषकर मुख्य प्रवेश-द्वार पर पत्थरों से निर्मित हाथियों को मारते दो बड़े सिंह आपको मंदिर निर्माण के उस काल में ले जाकर आश्चर्य और भावुकता से भर देंगे। निर्माण कार्य में बहुत विचार-विमर्श किया गया है। प्रत्येक मूर्ति बनाने में हाथ के कौशल और दिमाग की चतुराई का इस्तेमाल किया गया है। सूर्य देव की तीन सिरों वाली आकृति आपको इस बात का उदाहरण देगी। सूर्य देव के तीनों सिर विभिन्न दिशाओं में हैं, जो सूर्योदय, उसके चमकने और सूर्यास्त का आभास देते हैं। आपको इस मूर्ति के बदलते भावों को देखना चाहिए। सुबह के समय की स्फूर्ति और सायंकाल होत-होते दिखने वाली थकान के भाव देखने योग्य हैं। देवता मंदिर परिसर के दक्षिण-पूर्वी कोने में सूर्य देव की पत्नी माया देवी को समर्पित एक मंदिर है। यहां नव ग्रहों वाला अर्थात् : सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, जूपिटर, शुक्र, शनि, राहू और केतू को समर्पित मंदिर भी है। पर्यटक मंदिर के समीपवर्ती समुद्र-तट पर आराम कर सकते हैं। इन्हें भी देखें कोणार्क सूर्य मंदिर पुरी ज़िला बाहरी कड़ियाँ युनेस्को सूची में कोणार्क कोणार्क सूर्य मंदिर कोणार्क सूर्य मंदिर के चित्र सरकारी जालस्थल कोणार्क सूर्य मंदिर कोणार्क सूर्य मंदिर पर लेख कोणार्क यात्रा वृतांत सन्दर्भ श्रेणी:पुरी ज़िला श्रेणी:ओड़िशा के शहर श्रेणी:पुरी ज़िले 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