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दसम ग्रंथ
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दसम ग्रन्थ (शाब्दिक अर्थ : 'दसवें गुरु द्वारा रचित ग्रन्थ') , सिखों का धर्मग्रन्थ है जो गुरु गोविन्द सिंह जी की पवित्र वाणी एवं रचनाओं का संग्रह है। ये रचनाएँ पद्य रूप में हैं।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवनकाल में अनेक रचनाएँ की जिनकी छोटी-छोटी पोथियाँ बना दीं। उनके देह त्यागने के बाद उनकी धर्मपत्नी माता सुन्दरी की आज्ञा से भाई मणी सिंह खालसा और अन्य खालसा भाइयों ने गुरु गोबिंद सिंह जी की सारी रचनाओं को एकत्र किया और एक जिल्द में चढ़ा दिया जिसे आज "दसम ग्रन्थ" कहा जाता है। सीधे शब्दों में कहा जाये तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने रचना की और खालसे ने सम्पादना की। दसम ग्रन्थ का सत्कार सारे सिक्ख करते हैं।
दसम ग्रंथ की वानियाँ जैसे की जाप साहिब, तव परसाद सवैये और चोपाई साहिब सिखों के दैनिक प्रार्थना, नितनेम, का हिस्सा है और ये वानियाँ खंडे बाटे की पहोल, जिस को आम भाषा में अमृत छकना कहते हैं, को बनाते समय पढ़ी जाती हैं। तखत हजूर साहिब, तखत पटना साहिब और निहंग सिंह के गुरुद्वारों में दसम ग्रन्थ का गुरु ग्रन्थ साहिब के साथ प्रकाश होता है और रोज़ हुक्मनामे भी लिया जाता है।
center|450px|thumb|१९वीं शताब्दी के आरम्भिक काल की श्री दसम ग्रन्थ साहिब की पाण्डुलिपि का प्रथम पृष्ठ
दसम ग्रन्थ में सम्मिलित बानियाँ
दसम ग्रन्थ में गुरु गोबिंद सिंह जी की निम्लिखित वाणी दर्ज हैं:
जाप साहिब
अकाल उसतति (अकाल स्तुति)
बचित्र नाटक (विचित्र नाटक)
चंडी चरित्र उक्ति बिलास
चंडी चरित्र भाग दूसरा
चंडी की वार
ज्ञान परबोध (ज्ञान प्रबोध)
चौबीस अवतार
ब्रह्मा अवतार रूद्र अवतार
शब्द हजारे
३३ सवैये
सवैये
शास्त्र नाम माला
अथ पख्यान चरित्र लिख्यते
ज़फरनामा
हिकायतें
नीचे चंडी चरित्र का प्रसिद्ध शबद देखिये। इसमें गुरुजी चण्डी की स्तुति करते हुए उनसे वरदान मांगते हैं कि मैं कभी भी शुभ कर्मों को करने से पीछे न हटूँ। यह शबद ब्रजभाषा में है।
देह सिवा बरु मोहि इहै सुभ करमन ते कबहूं न टरों। न डरों अरि सो जब जाइ लरों निसचै करि अपुनी जीत करों ॥
अरु सिख हों आपने ही मन कौ इह लालच हउ गुन तउ उचरों। जब आव की अउध निदान बनै अति ही रन मै तब जूझ मरों ॥
अर्थ
हे शिवा (परम् पिता परमात्मा)! मुझे यह वर दें कि मैं शुभ कर्मों को करने से कभी भी पीछे न हटूँ।
जब मैं युद्ध करने जाऊँ तो शत्रु से न डरूँ और युद्ध में अपनी जीत पक्की करूँ।
और मैं अपने मन को यह सिखा सकूं कि वह इस बात का लालच करे कि आपके गुणों का बखान करता रहूँ।
जब अन्तिम समय आये तब मैं रणक्षेत्र में युद्ध करते हुए मरूँ।
संक्षिप्त इतिहास
दशम ग्रंथ का इतिहास
सतगुर गोबिंद सिंह के ऊपर गुरमत विचारधारा का असर बचपन से ही था। गुरमत विचारधारा के साथ साथ उन्होंने अनेक भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त किया और वेद, पुराण, उपनिषद, कुरान, शास्त्रों और अन्य धर्मो के ग्रन्थों को भी पढ़ा समझा।
पाओंटा साहिब में गोबिंद सिंह ने रचना का कार्य शुरू किया। पूर्व सत्गुरुओं की वाणी का निचोड़, सतगुर गोबिंद सिंह जी ने जाप साहिब बानी में ढाला, जिसमे निरंकार के अनेक नाम लिखे। फिर अकाल पुरख की उसतति में बानी लिखी।
आनंदपुर साहिब में, बचित्र नाटक रचना, में गुरु साहिब ने अपनी ज़िन्दगी के कुछ अंश लिखे और प्रथम सत्गुरुओं की और अपनी आत्मिक वंशावली का ज़िक्र किया।
चंडी को "आदि शक्ति" रूप में समझा और इस्त्री एवम मूर्ती रूप की मान्यता को खत्म करने के लिए चंडी चरित्र नामक चार रचनाए की जो दसम ग्रंथ में दर्ज हैं। एक रचना मार्कण्डेय पुराण को आधार बना कर किया। यही नहीं, उस समे के पंडित/विदवान नीची जाती को ज्ञान नहीं देते थे, इस चीज़ को दृष्टि में रखते हुए, विष्णु, ब्रह्मा और रूद्र के अवतारों की कथा सतगुर ने पाओंटा साहिब में लिखी और कुछ आनंदपुर साहिब में लिखी और इन कथाओं को गुरमत के दृष्टिकोण में सांचा। इन कारणों के चलते पहाड़ी राजे (क्षत्रिय) और ब्रह्मिन, सतगुर गोबिंद सिंह से इर्षा करने लग पढ़े और सरकार को उन के खिलाफ भडकाना शुरू कर दिया। कटड़ मुसलमानों को भी पता चला की गोबिंद सिंह ने अपनी वाणी में मुसलमानों के ऊपर भी टिप्णी की है वो भी खिलाफ हो गए।
अथ पख्यान चरित्र लिख्यते में चतुर महिलाओं और पुरुषों के चरित्र लिखे की कैसे यह संसार इर्षा, द्वेष, काम और अन्य विकारों से ग्रसित है। यह वाणी आनंदपुर साहिब में समाप्त की। औरंगजेब को उसकी सचाई का ज्ञान गुरु साहिब ने ज़फरनामा में दिलाया की वेह एक बुधिमान राजा नहीं है और न्याय करने में सक्षम नहीं है यही नहीं वो कुरान शरीफ की झूटी कसमे खाना वाला गैर मुसलमान है। यह पत्र सतगुर ने दीना, मालवा पंजाब में लिखा। इसके इलावा शास्त्र नाम माला में शस्त्रों को अध्यात्मिक शैली में सींचा और ३३ सवैये में रस्मो और मान्यताओं पर चोट मारी।
अपनी रचनाओ की पोथियाँ बनाई और लिखारिओं ने इन रचनाओ की कई नकले तैयार कीं और आम संगत में यह रचनाए फ़ैल गईं। तद पश्चात आनंदपुर की जंग, चमकौर की जंग, मुक्तसर की जंग और बहादुर शाह की मदत के बाद हजुर साहिब, नांदेड में शरीर त्याग दिया।
बाद में उन की धर्म पत्नी माता सुन्दरी के कहने पर भाई मनी सिंह खालसा और अन्य खालसा साथियों ने गुरु साहिब की पोथियों को इकठा कर एक सांचे में ढाला जिसको आज दसम ग्रंथ कहा जाता है।
दसम बानियों का उल्लेख
इतिहास के पन्नो में दसम ग्रन्थ के संकलन का जिक्र इस प्रकार है :
१) रेहतनामा में भाई नन्द लाल (1633–1713) का कहना है की जाप साहिब सिख शुरू से पढ़ते आए हैं।
२) रेहतनामा चोपा सिंह छिब्बर में बचित्र नाटक, ३३ सवैये, चोपाई साहिब और जाप साहिब का उल्लेख है।
३) १७११, में सतगुरु गोबिंद सिंह के कवि सेनापति ने, सतगुरु गोबिंद सिंह और अकाल पुरख के बीच में हुई बातचीत का ज़िक्र किया है जिस को सतगुरु गोबिंद सिंह जी ने बचित्र नाटक में खुल कर बताया है।
४) १७४१ में, भाई सेवादास रचित पर्चियां सतगुर गोबिंद सिंह दुआरा रचित राम अवतार, २२ सवैये, ज़फरनामा और हिकय्तों का ज़िक्र करती है।
५) १७५२ में, गुर्बिलास पातशाही १० में कोएर सिंह कलाल जी ने जिक्र किया है की गुरु गोबिंद सिंह जी ने बचित्र नाटक, कृष्ण अवतार, विष्णु अवतार, अकाल उसतति, जाप साहिब, ज़फरनामा, हिकायतें लिखी हैं और यह पहला इतिहासक ग्रन्थ है जिसमे आदि ग्रन्थ जी को गुरु पद देने की बात दर्ज है।
६) १७६६ में, केसर सिंह छिब्बर जी ने अपनी किताब बन्सवालिनामा में ज़िक्र किया है की कैसे माता सुन्दरी ने और खालसा भैओं ने दसम ग्रन्थ का संकलन किया। यह पहली किताब है जिस में गुरु गोबिंद सिंह की मौत के बाद हुए घटना कर्म का ज़िक्र है।
७) १७६६ में, सरूप चाँद भल्ला जी दुआरा रचित महिमा परकाश में सतगुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित बचित्र नाटक अंकित है। यही नहीं, चरित्रोपख्यान और अवतारों का भी ज़िक्र है।
८) १७९० में, गुरु कीं सखियाँ रचित सरूप सिंह कोशिश ने भी बताया है कि गुरु साहिब ने बचित्र नाटक, कृष्ण अवतार, शास्त्र नाम माला, आदिक वाणी खुद लिखी है।
८) १७९७ में, गुरबिलास पातशाही १० में सुखा सिंह जी ने गुरु गोबिंद सिंह की वाणी का ज़िक्र किया है।
९) १८१२ में, अंग्रेजी विद्वान् जे० बी० मल्कोम ने 'स्केच ऑफ़ सिख्स' में दसम बानी का वर्णन किया है और बताया है की यह ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब के साथ प्रकाशित होता था और सिख इसमें बराबर श्रद्धा रखते थे।
यही नहीं, अन्य बहुत से स्रोत हैं जिसमे दसम ग्रन्थ साहिब के बारे में उल्लेख है।
पाण्डुलिपियाँ
दसम ग्रन्थ का दर्शन
दशम गुरु ने लोक-मंगल (सरबत्त के भले) के लिए न केवल कलम का ही सहारा लिया, वरन् आवश्यकता पड़ने पर विवश होकर अपनी तलवार से आततायियों के सिर भी क़लम किए दशम गुरु अपनी समस्त गतिविधियों का एक मात्र उद्देश्य 'धरम जुध्ध' बताते हैं:-
अवर बासना नाहि प्रभ धरम जुद्ध के चाइ।
प्रतीत होता है कि गुरु जी ने नव समाज (शोषण उत्पीडन विहीन समाज) की संरचना के लिए धर्म अनुप्राणित एक सम्पूर्ण मानव का संकल्प
प्रस्तुत किया। यह सम्पूर्ण मानव था, 'खालसा' । गुुरु जी लिखते हैं:
याही काज धरा हम जनम, समझि लेहु साधु सभ मनम,
धरम चलावन, संत उबारन, दुसट सभन को मूल उपारन।
इस संसार के समूचे कार्यकलाप को दशम गुरु जी-एक बीतराग
सन्यासी की भांति मात्र एक 'तमाशा' ही समझते थे। वे लिखते हैं:-
मैं हौं परम पुरुख को दासा।
देखन आयो जगत तमासा॥ -- (बचित्र नाटक)
परन्तु जगत् के उतार-चढ़ाव, उठा-पटक और घृणित पाखंड आडंबर
समूह को लक्षित कर वे चुप नहीं रह सके और इस अनर्थ परम्परा का
पर्दाफाश करने के लिए उन्होंने शब्द-ब्रह्म की साधना की। वे लिखते हैं:-
जिह जिह बिधि मैं लखे तमासा,
''चाहत तिन को कियो प्रकासा। -- (बचित्र नाटक)
दस ग्रन्थी
दस ग्रन्थी (ਦਸ ਗ੍ਰੰਥੀ) दसम ग्रन्थ के कुछ चुने हुए छन्दों का लघु संग्रह है।
इन्हें भी देखें
गुरु ग्रंथ साहिब
सर्बलोह ग्रंथ
दसम ग्रंथ का इतिहास
बाहरी कड़ियाँ
श्री दशम ग्रन्थ साहिब (देवनागरी लिपि में, हिन्दी अर्थ सहित)
श्री दशम ग्रन्थ साहिब (गुरुमुखी और देवनागरी में, अर्थ सहित)
श्री दशम ग्रन्थ साहिब (गुरुमुखी में)
संस्कृति की स्याही, संघर्ष की कलम (प्रशान्त बाजपेयी)
श्री दसम ग्रंथ दर्शन
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Compilation of Dasam Granth -A scientific Analysis
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Sachkhoj Academy on Dasam Granth
Report, Sodhak (Revision) Committee
श्रेणी:सिख धर्म