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अदिला खानुम
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अदिला खानुम عادلة خانم 1879 ई॰ इस्तांबुल, उस्मानी साम्राज्य 12 जुलाई 1929 ई॰ (आयु 50 वर्ष) लारनाका, साइप्रस हाला सुल्तान टेक्के, लारनाका हुसैन बिन अली राजकुमारी साराराजकुमारी फातिमा उस्मानी कुलीन वर्ग इस्लाम (सुन्नी)
अदिला खानुम (अरबी: عادلة خانم; 1879 ई॰ – 12 जुलाई 1929 ई॰) उस्मानी साम्राज्य (Ottoman Empire) की एक अत्यंत प्रतिष्ठित, कुलीन और ऐतिहासिक महिला थीं। वे मक्का के पूर्व शरीफ और हेजाज़ के राजा हुसैन बिन अली की तीसरी धर्मपत्नी थीं। उस्मानी साम्राज्य के सर्वोच्च कुलीन और शक्तिशाली राजनीतिक वर्ग से गहरा संबंध रखने के कारण, उनका जीवन मध्य पूर्व के आधुनिक इतिहास, विशेषकर ऐतिहासिक 'अरब विद्रोह' (Arab Revolt) और उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों के साथ अत्यंत गहराई से जुड़ा हुआ था।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
अदिला खानुम का जन्म 1879 ई॰ में इस्तांबुल (Istanbul) के एक अत्यंत संभ्रांत और प्रभावशाली उस्मानी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सलाह बे (Salah Bey) था। अदिला खानुम के दादा उस्मानी साम्राज्य के एक अत्यंत विख्यात राजनेता और भव्य वज़ीर (Grand Vizier), मुस्तफा रेशिद पाशा (Mustafa Reşid Pasha) थे।Taha Öztürk (March 2017). "Şerif Hüseyin'in Mekke Emirliği'ne Atanma Sürecinde Ailesiyle İstanbul'da Geçirdiği Yıllar" [The years Sharif Hussein spent in Istanbul with his family during his appointment to the Emirate of Mecca]. Vakanüvis (in Turkish). 2 (1). Archived from the original on 27 November 2020.
भव्य वज़ीर के परिवार से ताल्लुक रखने के कारण, उनका लालन-पालन इस्तांबुल के शाही महलों के अत्यंत करीब और एक उच्च सुसंस्कृत वातावरण में हुआ था। इस कुलीन पृष्ठभूमि ने उन्हें न केवल एक परिष्कृत जीवन शैली प्रदान की, बल्कि साम्राज्य की सत्ता के केंद्र में एक प्रभावशाली महिला के रूप में भी स्थापित किया। उन्होंने अपने समय की बेहतरीन शिक्षा प्राप्त की थी और उस्मानी दरबार की जटिल राजनीतिक एवं कूटनीतिक बारीकियों से वे भली-भांति परिचित थीं।
विवाह और इस्तांबुल का जीवन
वर्ष 1898 ई॰ में, इस्तांबुल में उनका विवाह हुसैन बिन अली के साथ अत्यंत भव्यता और शाही परंपराओं के साथ संपन्न हुआ। उस समय हुसैन बिन अली को तत्कालीन उस्मानी सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय (Abdul Hamid II) द्वारा राजनीतिक कारणों और संदेह के चलते इस्तांबुल में ही अनिवार्य निवास पर रखा गया था।
अदिला खानुम का यह विवाह केवल एक पारिवारिक गठबंधन नहीं था, बल्कि यह अरब और तुर्क उच्च वर्गों के बीच एक सशक्त कूटनीतिक गठजोड़ का भी प्रतिनिधित्व करता था। अदिला खानुम से विवाह के माध्यम से, हुसैन बिन अली को उस्मानी साम्राज्य के सर्वोच्च राजनीतिक कुलीन वर्ग (Elite class) के भीतर एक महत्वपूर्ण समर्थन और प्रवेश प्राप्त हुआ।https://www.sothebys.com/de/auctions/ecatalogue/2017/20th-century-art-middle-east-l17228/lot.15.html zeid, fahrelnissa towards a sky zeitgenössiche arabische, iranische & t zeitgenössiche arabische, iranische & türkische kunst sotheby's l17228lot844qpde www.sothebys.com de 2026-03-21 इस सुखद विवाह से उन्हें दो पुत्रियों की प्राप्ति हुई, जिनके नाम राजकुमारी सारा और राजकुमारी फातिमा थे। इस्तांबुल में निवास के दौरान, अदिला खानुम ने अपने पति के लिए उस्मानी अधिकारियों और अरब नेताओं के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक और सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया।
मक्का की यात्रा और अरब विद्रोह
वर्ष 1908 ई॰ में हुई 'युवा तुर्क क्रांति' (Young Turk Revolution) के पश्चात्, उस्मानी सुल्तान ने हुसैन बिन अली को मक्का का 'शरीफ' (अमीर) नियुक्त कर दिया। इस ऐतिहासिक नियुक्ति के बाद, अदिला खानुम अपने पति और पूरे परिवार के साथ इस्तांबुल छोड़कर पवित्र शहर मक्का चली गईं। मक्का में उन्होंने शरीफ की प्रमुख पत्नी के रूप में अत्यंत सम्मानजनक जीवन व्यतीत किया।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, जब 1916 ई॰ में उनके पति ने उस्मानी साम्राज्य की नीतियों के विरुद्ध अरब विद्रोह (Arab Revolt) का नेतृत्व किया, तो अदिला खानुम के लिए यह एक अत्यंत जटिल और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण स्थिति थी, क्योंकि उनका अपना परिवार उस्मानी कुलीन वर्ग का अभिन्न हिस्सा था। इसके बावजूद, उन्होंने हर कठिन और संकटग्रस्त परिस्थिति में अपने पति का निष्ठापूर्वक समर्थन किया। जब उनके पति ने स्वयं को हेजाज़ का राजा (King of Hejaz) घोषित किया, तो वे हेजाज़ की रानी बन गईं।
साइप्रस में निर्वासन और निधन
वर्ष 1924 ई॰ में राजनीतिक परिस्थितियों में एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित बदलाव आया। इब्न सऊद की सउदी सेनाओं के भीषण आक्रमण के कारण राजा हुसैन को अपनी सत्ता और राज्य गंवानी पड़ी। सत्ता छिनने के बाद, उन्हें अपने परिवार के साथ हेजाज़ छोड़कर भागना पड़ा। निर्वासन का यह अत्यंत कठिन समय अदिला खानुम के लिए भारी शारीरिक और मानसिक पीड़ा लेकर आया। कुछ समय विभिन्न स्थानों पर व्यतीत करने के पश्चात्, यह शाही परिवार वर्ष 1925 ई॰ में साइप्रस (Cyprus) में आकर बस गया।Strohmeier Martin 2019-09-03 The exile of Husayn b. Ali, ex-sharif of Mecca and ex-king of the Hijaz, in Cyprus (1925–1930) https://www.tandfonline.com/doi/full/10.1080/00263206.2019.1596895 Middle Eastern Studies en 55 5 733–755 10.1080/00263206.2019.1596895 0026-3206
ब्रिटिश प्रशासन के अधीन साइप्रस में निर्वासित जीवन जीना एक पूर्व रानी के लिए अत्यंत कष्टदायक था, फिर भी उन्होंने अपनी शाही मर्यादा और पारिवारिक गरिमा को अंत तक बनाए रखा। साइप्रस के इस निर्वासित जीवन में, उन्होंने अपने पति के साथ अत्यंत संयम और साहस के साथ समय बिताया। अंततः 12 जुलाई 1929 ई॰ को लारनाका (Larnaca), साइप्रस में उनका दुखद निधन हो गया। उनके पार्थिव शरीर को लारनाका में स्थित अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक 'हाला सुल्तान टेक्के' (Hala Sultan Tekke) के परिसर में पूरे इस्लामी सम्मान के साथ दफनाया गया।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
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