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जुज़ॅप्पे गारिबाल्दि
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thumb|जुज़ॅप्पे गारिबाल्दि
जुज़ॅप्पे गारिबाल्दि (इतालवी: Giuseppe Garibaldi, जन्म: 4 जुलाई 1807, देहांत: 2 जून 1882) इटली के एक राजनैतिक और सैनिक नेता थे जिन्होने इटली के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। कावूर, विक्तर एमानुएल द्वितीय तथा मेत्सिनी के साथ गारिबाल्दि का नाम भी इटली के 'पिताओं' में सम्मिलित है।
गारिबाल्दि जब पैदा हुए तब इटली कई राज्यों में खंडित था और यूरोप की बाकी शक्तियों के रहम-ओ-करम पर था। पहले उन्होंने "कारबोनारी" नाम के गुप्त राष्ट्रवादी क्रन्तिकारी संगठन के साथ नाता जोड़ा लेकिन एक असफल विद्रोह के बाद उन्हें इटली छोड़ना पड़ा। फिर उन्होंने दक्षिण अमेरिका में कई विद्रोहों और लड़ाइयों में हिस्सा लिया। उसके बाद वे वापस इटली आए और इटली को एक करने की लड़ाई में मुख्य रणनीतिकार रहे। आधुनिक युग में इतालवी लोग उन्हें एक देशभक्त नेता मानते हैं और आदर से देखते हैं।Garibaldi, Giuseppe (1807–1882) – Encyclopedia of 1848 Revolutions http://www.ohiou.edu/~chastain/dh/gari.htm 5 जुलाई 2011 https://web.archive.org/web/20090129085329/http://www.ohiou.edu/~chastain/dh/gari.htm 29 जनवरी 2009 dead
परिचय
thumb|बायें से दायें : पुत्री क्लेलिया, पत्नी फ्रांसेस्का आर्मोसिनो, जुज़ॅप्पे गारिबाल्दि, पौत्र मानलिओ तथा पुत्र मेनोत्ति
गुइसेप्पे गारीबाल्दी का जन्म नोके में 4 जुलाई 1807 को हुआ था। इटली दीर्घकाल तक विदेशी सत्ता की क्रीड़ाभूमि रही और उसके देशभक्तों ने विशेषकर 19वीं सदी में उसे विदेशियों के चंगुल से मुक्त करने का निरंतर प्रयास किया। उस आजादी की लड़ाई में अग्रणी मात्सीनी और गारीबाल्दी थे। दोनों ने आस्ट्रियनों के खिलाफ षड्यंत्र किया और यह तय हुआ कि जब मात्सीनी का दल पीदमोंत में प्रवेश करे तभी गारीबाल्दी अपने साथियों के साथ यूरीदीचे नामक लड़ाकू जहाज पर कब्जा कर ले। इस षड्यंत्र का भेद खुल जाने से गारीबाल्दी को 1836 में दक्षिणी अफ्रीका भागना पड़ा। उधर इटली के तत्कालीन विधाताओं ने उसे प्राणदंड की घोषणा कर दी। दक्षिण अफ्रीका के उरुगुवे में उसने इतालवी सेना का निर्माण कर वहाँ के विद्रोह में सफल भाग लिया। इटली में जब विद्रोह का आंदोलन चला तब वह स्वदेश लौटा और अपनी सेवाएँ चार्ल्स अलबर्ट को समर्पित कर दीं। वहाँ उसने एक स्वयंसेवक सेना प्रस्तुत की पर शीघ्र ही हारकर उसे स्विटजरलैंड भागना पड़ा। अगले ही साल वह फिर स्वदेश लौटा और रोम की ओर से लड़ता हुआ उसने फ्रांसीसियों से सान पान कात्सिमों की लड़ाई जीती। अनेक स्थानों पर युद्ध जीतने के बाद रोम की पराजय पर उसे भी भागना पड़ा। फ्रांस, आस्ट्रिया, स्पेन और नेपुल्स की सेनाएँ पीछा करती जा रही थीं और वह मध्य इटली से पीछे हटता जा रहा था। उसका वह मार्च इतिहस प्रसिद्ध हो गया है। गारीबाल्दी को फिर अमरीका में शरण लेनी पड़ी पर स्वदेश को विदेशियों के कब्जे में न देख सकने के कारण 1854 में वह फिर इटली लौटा। पाँच साल बाद जो देश के दुश्मनों से युद्ध छिड़ा तो उसने बार बार आस्ट्रिया की सेनाओं को परास्त किया। शीघ्र ही उसने ब्रिटिश जहाजों की सहायता से सालेनी जीत ली जहाँ उसे डिक्टेटर घोषित किया गया। नेपुल्स की सेनाओं को गारीबाल्दी ने बार बार परास्त किया और विजयी के विक्रम से उसने नेपुल्स में भी प्रवेश किया जहाँ एमेनुएल को प्रतिष्ठित कर वह स्वयं फ्रांसीसियों की बची खुची सेना को नष्ट करने में लग गया।
इटली में जो नई सरकार बनी उसका विधाता कावूर था। उसके सैनिकों के प्रति कावूर और उसकी सरकार की अरुचि तथा उदासीनता के कारण गारीबाल्दी उनसे चिढ़ गया। शीघ्र ही रोम पर उसने चढ़ाई की पर वह कैद कर लिया गया, यद्यपि उस कैद से उसका तत्काल छुटकारा हो गया। अब तक गारीबाल्दी के बलिदानों की ख्याति सर्वत्र पहुँच गई थी और सर्वत्र उसका शौर्य सराहा जाने लगा था। 1864 में वह इंग्लैंड पहुँचा जहाँ उसका भव्य स्वागत हुआ। 1866 में जब आस्ट्रिया के साथ फिर युद्ध छिड़ा तब वह इटली लौटा और उसने स्वयंसेवक सेना की कमान अपने हाथ में ली और शीघ्र ही अपनी विजयों का ताँता बाँध लिया। पर जब वह अपनी विजयों की चोटी छू रहा था और ट्रेंट पर हमला करने ही वाला था कि जनरल लामारमोरा की आज्ञा से उसे पीछे लौटना पड़ा। इस आज्ञा ने उसका जी तोड़ दिया पर अपने मन को मथकर उसने इस आदेश का जो उत्तर दिया-‘ओबेदिस्को’-मैं आज्ञा के प्रति आत्मसमर्पण करता हूँ-वह इतिहास सप्रसिद्ध हो गया है। इसके बाद वह काप्रेरा लौट गया जहाँ उसने अपना स्थान बना लिया था।
रोम पर अभी तक इतावली जनता का अधिकार नहीं हुआ था जिसे संपन्न करने की अब गारीबाल्दी ने तैयारी की। 1867 में उसने रोम में प्रवेश करने का प्रयत्न किया पर वह पकड़ लिया गया। अब गारीबाल्दी फ्लोरेंस भागा और रातात्सी कैबिनेट की सहायता से फिर रोम की ओर लौटा, पर फ्रांस और पोप की संमिलित सेनाओं ने उसकी सेना को नष्ट कर दिया। गारीबाल्दी पकड़कर काप्रेरा भेज दिया गया। 1870 में उसने अपनी सेना द्वारा फ्रांस की मदद कर जर्मनी को हराया। पहले वह वर्साई की विधान सभा का प्रतिनिधि चुना गया पर फ्रेंच अपमान से चिढ़कर वह काप्रेरा लौटा और 1874 में रोम की विधान सभा का प्रतिनिधि चुन लिया गया। उपकृत इतालवी कैबिनेट ने अंत में उसे एक भारी पेंशन दी। गारीबाल्दी 2 जून 1882 को मरा और इतावली क्रांति के युद्धों में देशभक्त योद्धा के रूप में विख्यात हुआ।
इन्हें भी देखें
इतालवी एकीकरण
इटली
केमिल बेंसो कावूर
ज्यूसेपे मेत्सिनी
बाहरी कड़ियाँ
फ़ोन्दात्ज़ियोने जुज़ॅप्पे गारिबाल्दि, जुज़ॅप्पे गारिबाल्दि संस्थान का जालपृष्ठ (वेबपेज)
सन्दर्भ
जी. एम. ट्रेवेलियन : गैरिबाल्डीज़ डिफ़ेंस ऑव द रोमन रिपब्लिक (1907);
गैरिबाल्डी ऐंड द थाउज़ेंड (1909);
गैरिबाल्डी ऐंड द मेकिंग ऑव इटली (1911)।
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