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गुरु जम्भेश्वर
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गुरुजम्भेश्वर संत बीकानेर, राजस्थान , भारत Jambheshwar painting, Jambheshwar photo.jpg श्री गुरु जम्भेश्वर का चित्रण बिश्नोई मुकाम, समराथल धोरा, जाम्भोलाव धाम, पीपासर, सालासर, जांगलू, रोटू, लालासर साथरी, रामड़ावास, लोदीपुर आदि। "विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी" सभी तरह के वन्यजीव जंतु पशु पक्षी जम्भेश्वर महाराज जन्माष्टमी प्रत्येक माह अमावस्या व्रत एवं प्रमुख (होली पाहल) जाम्भोजी लोहट पंवार हंसा देवी
गुरु जांभेश्वर, जिन्हें जाम्भोजी के नाम से भी जाना जाता है (1451–1536), बिश्नोई समाज के महान संस्थापक और एक दूरदर्शी संत थे। उन्होंने विक्रमी संवत् 1542 (1485 ई.) में बिश्नोई पंथ की स्थापना कर समाज को एक नई नैतिक और आध्यात्मिक दिशा प्रदान की।https://www.bishnoi.co.in/2021/01/about-jambheshwar-bhagwan-in-hindi.html गुरु जम्भेश्वर का जीवन परिचय Biography of Guru Jambheshwar Bishnoi - Encyclopedia of Bishnoi Caste and Bishnoi Movement en 2025-05-26 वे ‘हरि’ नाम का निरंतर स्मरण करते थे, जो भगवान विष्णु का ही एक पावन नाम है। ‘बिश्नोई’ शब्द ‘बीस’ और ‘नौ’ से मिलकर बना है, जिसका आशय उन 29 नियमों से है, जिनका पालन इस पंथ के अनुयायी करते हैं।
गुरु जांभेश्वर का मूल विश्वास था कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है और प्रत्येक जीव में उसी का अंश विद्यमान है। इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने प्रकृति और समस्त जीव-जंतुओं की रक्षा का सशक्त संदेश दिया। वे पेड़-पौधों, वन-वन्यजीवों और समस्त चराचर जगत के संरक्षण को धर्म का अभिन्न अंग मानते थे। उनका प्रसिद्ध उपदेश “जीव दया पालनी, रूख लीलो नहीं घावै” इसी करुणा और पर्यावरण-प्रेम की भावना को प्रकट करता है।
उन्होंने समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों—जैसे स्त्री-पुरुष में भेदभाव, नशे की प्रवृत्ति, जीव हत्या तथा पेड़ों की अंधाधुंध कटाई—का विरोध किया और स्वच्छता, संयम तथा सादगीपूर्ण जीवन पर बल दिया। वे हरे वृक्षों को काटना और किसी भी जीव की हत्या को गंभीर पाप मानते थे तथा शुद्ध शाकाहारी जीवन शैली अपनाने की प्रेरणा देते थे।
thumb|250px| गुरु जम्भेश्वर का मन्दिर मुकाम, बीकानेर, राजस्थान
जीवन परिचय
जाम्भोजी का जन्म विक्रमी संवत् 1508 (1451 ई.) भाद्रपद वदी अष्टमी, जन्माष्टमी को अर्धरात्रि कृतिका नक्षत्र में राजस्थान के नागौर परगने के पीपासर गांव में पंवार राजपुत https://books.google.co.in/books?newbks=1&newbks_redir=0&id=ONYXAAAAIAAJ&dq=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A5%80&focus=searchwithinvolume&q=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0 Rājasthāna kā rājanaitika evaṃ sāṃskr̥tika itihāsa Gupta Krishna Swaroop Ojhā Je Ke 1986 Rājasthānī Granthāgāra hi परिवार में हुआ था।https://books.google.co.in/books?newbks=1&newbks_redir=0&id=ye8dAAAAIAAJ&dq=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A5%80&focus=searchwithinvolume&q=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0 Rājasthāna kī bhakti-paramparā tathā saṃskr̥ti Śukla Dineśa Candra Siṃha Oṅkāra Nārāyaṇa 1992 Rājasthānī Granthāgāra hihttps://books.google.co.in/books?id=2zOAAAAAMAAJ&q=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A5%80&dq=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A5%80&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&source=gb_mobile_search&sa=X&ved=2ahUKEwjFufHB5beNAxVYUPUHHT4hB3w4ZBDoAXoECAoQAw Rājasthāna kā bhūgola 1993 Rājasthāna Hindī Grantha Akādamī 978-81-7137-110-5 hi इनके पिताजी का नाम ठाकुर लोहट जी पंवार तथा माता का नाम हंसा देवी था, जो कि भाटी कुल से थी।https://books.google.co.in/books?newbks=1&newbks_redir=0&id=aTwhAAAAMAAJ&dq=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A5%80&focus=searchwithinvolume&q=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BF+%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0+ Jāmbhojī, Vishṇoī sampradāya, aura sāhitya: Jambhavāṇi ke pāṭha-sampādana sahita Maheshwari Hiralal 1970 Bī. Āra. Pablikeśansa hi इनके पिता एक सम्पन्न व्यक्ति थे और उनका नाम लोहटजी रहा तथा इनकी माता हांसा देवी भाटी कुल की थी।https://www.bishnoi.co.in/2021/01/about-jambheshwar-bhagwan-in-hindi.html गुरु जम्भेश्वर का जीवन परिचय Biography of Guru Jambheshwar Bishnoi - Encyclopedia of Bishnoi Caste and Bishnoi Movement en 2025-05-26 यह अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थे। जाम्भोजी अपने जीवन के शुरुआती 7 वर्षों तक कुछ भी नहीं बोले थे तथा न ही इनके चेहरे पर हंसी रहती थीं । 7 वर्ष बाद इन्होंने विक्रमी संवत् 1515 सन 1458 को भादवा वदी अष्टमी के दिन ही अपना मौन तोड़ा और सबसे पहला शब्द (गुरू चिन्हों गुरु चिन्ह पुरोहित गुरुमुख धर्म बखानी) उच्चारण किया। इन्होंने 27 वर्ष तक गौपालन किया। इसी बीच इनके पिता लोहाट जी पंवार और उनकी माता हंसा कंवर की मृत्यु हो गई तो इन्होंने अपनी सारी संपत्ति जनहित में दान कर दी और आप निश्चित रूप से समराथल धोरे पर विराजमान हो गए गुरु श्री जम्भेश्वर भगवान ने विक्रमी संवत 1542 सन 1485 में 34 वर्ष की अवस्था में बीकानेर राज्य के समराथल धोरे पर कार्तिक वदी अष्टमी को पाहल बनाकर बिश्नोई पंथ की स्थापना की थी।इन्होंने शब्दवाणी के माध्यम से संदेश दिए थे, इन्होंने अगले 51 वर्ष तक में पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया और ज्ञानोपदेश दिया।गुरु जंभेश्वर भगवान ने छुआछूत ,जात पात ,स्त्री पुरुष में भेदभाव, पेड़ पौधों की कटाई ,जीव हत्या एवं किसी प्रकार कि नशे क प्रवृत्ति जैसी सामाजिक कुरीतियोंं को दूर किया वर्तमान में गुरु उपदेश दिये वो शब्दवाणी में 120 शब्द के रूप में मौजूद है।बिश्नोई समाज के लोग 29 धर्मादेश (नियमों) का पालन करते है यह धर्मादेश गुरु श्री जम्भेश्वर भगवान ने ही दिए थे। इन 29 नियमों में से 8 नियम जैव वैविध्य तथा जानवरों की रक्षा के लिए है , 7 धर्मादेश समाज कि रक्षा के लिए है। इनके अलावा 10 उपदेश खुद की सुरक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के लिए है और बाकी के चार धर्मादेश आध्यात्मिक उत्थान के लिए हैं जिसमें भगवान को याद करना और पूजा-पाठ करना। बिश्नोई समाज का हर साल मुक्तिधाम मुकाम में मेला भरता है जहां लाखों की संख्या में बिश्नोई समुदाय के दर्शनार्थी लोग आते हैं। गुरु जी ने जिस बिश्नोई धर्म समाज कि स्वतंत्र स्थापना की थी उस 'बिश' का मतलब 20 और नोई का मतलब 9 होता है इनको मिलाने पर 29 होते है बिश+नोई=बिश्नोई/अर्थात बिश्नोई यानी 29 नियमों को मानने वाला। बिश्नोई संप्रदाय के लोग खेजड़ी (Prosopis cineraria) को अपना पवित्र पेड़ मानते हैं।
हर अमावस के दिन जंभेश्वर भगवान के मंदिर में और बिश्नोई समाज के घरों में हर रोज सुबह गाय के शुद्ध देसी घी, नारियल, हवन सामग्री के द्वारा हवन किया जाता हैं।इससे वातावरण शुद्ध होता है वायुप्रदूषण कम होती है और यह वायु में उपस्थित हानिकारक तत्वों को कम करता है।
जीवन
इनके बूढ़े पिता लोहट जी की 50 वर्ष की आयु तक कोई संतान नहीं थीं इस कारण वे दुखी थे।लोहट जी के 51वें वर्ष में भगवान विष्णु नेे बाल संत के रूप में आकर लोहट की तपस्या से प्रसन्न होकर उनको पुत्र प्राप्ती का वचन दिया। जाम्भोजी ने अपने जन्म के बाद अपनी माँ का दूध नहीं पिया था। साथ ही जन्म के बाद 7 वर्ष तक मौन रहे थे। और 7 वर्ष बाद भादवा वदी अष्टमी के दिन हीअपना मौन तोड़ा। और जाम्भोजी ने अपना पहला शब्द (गुरु चिंहो गुरु चिन्ह पुरोहित) बोला था जम्भदेव सादा जीवन वाले थे लेकिन काफी प्रतिभाशाली थे साथ ही संत प्रवृति के कारण अकेला रहना पसंद करते थे। जाम्भोजी ने विवाह नहीं किया, इन्हें गौपालन प्रिय लगता था इन्होंने 27 वर्षों तक गायों की सेवा की थी इसी बीच इनके माता-पिता की मृत्यु हो गई और उन्होंने अपनी संपत्ति जनकल्याण में लगा दी की और खुद समराथल धोरा पर निश्चित रूप से विराजमान हो गए इन्होने 34 वर्ष की आयु में समराथल धोरा नामक जगह पर उपदेश देने शुरू किये थे। ये समाज कल्याण की हमेशा अच्छी सोच रखते थे तथा हर दुःखी की मदद किया करते थे । इन्होंने स्त्री पुरुष में भेदभाव, पेड़ पौधोंं की कटाई, जीव हत्या, नशे पते जैसी सामाजिक कुरीतियों को दूर किया मारवाड़ में 1585 में अकाल पड़ने के कारण यहां के लोगों को अपने पशुओं को लेकर मालवा जाना पड़ा था, इससे जाम्भोजी बहुत दुःखी हुए। फिर जाम्भोजी ने उन दुःखी किसानों को यहीं पर रुकने को कहा बोलें कि मैं आप की यहीं पर सहायता करूँगा। इसी बीच गुरु जम्भेश्वरजी ने दैवीय शक्ति से सभी को भोजन तथाआवास स्थापित करने में सहायता की। हिन्दू धर्म के अनुसार वो काल निराशाजनक काल कहलाया था। उस वक़्त यहां पर आम जनों को बाहरी आक्रमणकारियों का बहुत भय था साथ ही लोग हिन्दू धर्म संस्कृति में विभिन्न देवी अनेकों देवताओं की मुर्तियां कि पूजा करते थे। इसलिए दुःखी लोगों की सहायता के लिए ईश्वर एक है के सिद्धांत पर गुरु जम्भेश्वर नेें विक्रमी संवत 1542 सन 1485 मेंं बीकानेर जिले के समराथल धोरे पर कार्तिक बदी अष्टमी को पाहल बनाकर स्वतंत्र बिश्नोई धर्म की स्थापना की।
श्री गुरु जंभेश्वर भगवान विक्रमी संवत् 1593 सन 1536 मिंगसर वदी नवमी ( चिलत नवमी ) को लालासर में निर्वाण को प्राप्त हुए ।श्री गुरु जंभेश्वर भगवान का समाधि स्थल मुकाम है।
शिक्षा
जाम्भोजी ने अपने जीवनकाल में अनेक वचन कहे किन्तु अब 120 शब्द ही प्रचलन में हैं जो वर्तमान में शब्दवाणी के नाम से जाने जाते हैं।https://jambhvani.bishnoism.org/ श्री गुरु जम्भेश्वर शब्दवाणी श्री गुरु जम्भेश्वर शब्दवाणी 2020-10-23 गुरु जम्भेश्वरजी द्वारा स्थापित बिश्नोई पंथ में 29 नियमhttps://www.29rules.bishnoism.org/ 29 Principles of Bishnoi Religion (29 Rules) en 2020-10-23 प्रचलित हैं जो धर्म, नैतिकता, पर्यावरण और मानवीय मूल्यों से संबंधित हैं।
बिश्नोई समुदाय
बिश्नोई
बिश्नोई धर्म स्वतंत्र रूप से एक अच्छे विचार वाला समुदाय है, इनका मुख्य व्यवसाय खेती है एवं पशु पालन हैं,बिश्नोई समाज की स्थापना गुरु जम्भेश्वर भगवान ने विक्रमी संवत 1542 सन 1485 में 34 वर्ष की अवस्था में बीकानेर जिले के समराथल धोरे पर कार्तिक वदी अष्ट को पाहल बनाकर की थी। गुुरू जंभेश्वर भगवान द्वारा बनाये गये 29 नियम का पालन करने पर इस समाज के 20 + 9 लोग = 29 (बीस+नौ) बिश्नोई कहलाये। अर्थात बिश्नोई समाज का अर्थ है '29 नियमों को धारण करने वाला' यह समाज वन्य जीवों को अपना सगा संबधी जैसा मानते है तथा उनकी रक्षा करते है। वन्य जीव रक्षा करते-करते कई लोग वीरगति को प्राप्त भी हुए है। यह समाज प्रकृति प्रेमी भी है। अधिकांश बिश्नोई जाट जाति से है।www.google.com/amp/s/www.hindustantimes.com/punjab/bishnoi-faces-bumpy-ride-in-jat-vs-non-jat-contest/story-O67GzOTye68l3Af2h99d3L_amp.html
खेजड़ली का बलिदान
खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है
अंगूठाकार|खेजड़ली वृक्षार्थ बलिदान स्थल
खेजड़ली एक गांव है जो राजस्थान के जोधपुर ज़िले में स्थित है यह दक्षिण-पूर्व से जोधपुर शहर से 26 किलोमीटर दूर है। खेजड़ली गांव का नाम खेजड़ी (Prosopis cineraria) पर रखा गया। तत्कालीन जोधपुर महाराजा अभय सिंह(1724-1749 ईसवीं) जी के मंत्री गिरधरदास जी ने अपने सैनिकों को चुना पकाने के लिए लकड़ी लाने का आदेश दिया वह सैनिक लकड़िया लेने के लिए खेजडली गाँव पहुंचे।
12 सितम्बर विक्रमी संवत 1787 सन 1730 में इस गांव में खेजड़ी को बचाने के लिए अमृता देवी बिश्नोई व उनके पति रामोजी वह उनकी तीन बेटियों सहित कुल 363 बिश्नोई समाज के लोगों ने (भगवान जांभोजी के बताए गए 29 नियमों में वर्णित एक नियम हरा वृक्ष नहीं काटना का अनुसरण करते हुए ) बलिदान दिया था। अमृता देवी ने कहा था कि " सिर साटे रुख रहे तो भी सस्ता जान" यह चिपको आंदोलन की पहली घटना थी जिसमें पेड़ों की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया गया।।चोरासी गांव के बिश्नोई समाज के लोग खेजड़ली बलिदान में शहीद होने के लिए शामिल हुए थे।चोरासी गांव की सूची,सामाजिक न्यायिक मुख्यालय। बिश्नोई समाज के चोरासी गांवों का सामाजिक न्यायिक मुख्यालय खैजड़ली शहीद स्थल हैं।
यह एक ऐसा उदाहरण है जब लोग पर्यावरण का प और ग्लोबल वार्मिंग का ग नहीं जानते थे तब विश्नोई समाज ने पेड़ों को बचाने लिए इतनी बड़ी संख्या में बलिदान दिया।
363 शहीदों की याद में भाद्रपद शुक्ल दशमी को विशाल वन मेला भरता है ।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
बिश्नोई
मुकाम
जाम्भोलाव धाम
समराथल
लालासर साथरी
जांगलू
रामवड़ा वास
श्रेणी:पर्यावरण प्रेमी