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नन्दराम टिक्कू
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पण्डित नन्दराम टिक्कू (1775 - 1850) अफगानिस्तान में जमान शाह के शासन के दौरान वहाँ के प्रधानमंत्री के पद पर जा पहुंचने वाले कश्मीरी पण्डित थे।First Kashmiri Prime Minister ofAfghanistan-Dewan Nand Ram Tikku लगातार युद्ध में उलझे रहने, विद्रोहों और अन्य कई कारणों से जमान शाह का खजाना खाली हो गया था। ऐसे में प्रधानमंत्री नंद राम टिक्कू ने अपने पास जमा सोने से अपने नाम पर सिक्के बनवाए। यह सिक्का 1910 तक अफगानिस्तान और कश्मीर में चलता रहा। इन सिक्कों पर फारसी में लिखा था-
सिक्का-ए-जद्दूर मुल्क-ए-काबुल नंद राम
अज मुसलमान बागोयद राम राम
(भावार्थ अर्थ - नन्दराम ने काबुल देश में यह सिक्का ढलवाया है। मुसलमान भी राम-राम कहने लगे हैं।)
आज नंद राम के कुल के कुछ लोग अवध क्षेत्र और लखनऊ में रहते हैं। तालिबान के अफगानिस्तान में कभी चलता था कश्मीरी नंद राम का सिक्का
नंद राम टिक्कू के दादा पंडित रामनाथ टिक्कू श्रीनगर में हब्बाकदल क्षेत्र के टिक्कू मोहल्ले में रहते थे। रामनाथ के दो बेटे थे भास्कर राम टिक्कू व विश्वनाथ टिक्कू। दोनों ने उर्दू और फारसी में शिक्षा प्राप्त की। भास्कर राम वर्ष 1780 में कश्मीरी पंडितों के काफिले को लेकर लखनऊ चले गए। उस समय वहां नवाब असफुद्दौला का शासन था। वहां वह अपने स्वजन के साथ कश्मीरी मोहल्ले में बस गए। उन्होंने वहां कारोबार शुरू किया।
विश्वनाथ टिक्कू श्रीनगर में ही रहे और अपने पिता के कारोबार को संभाला। उसके तीन बेटे थे - नंद राम, हरि दास और रामचंद्र। नंदराम टिक्कू का जन्म 1775 में हुआ था। उन्होंने भी शुरुआती शिक्षा फारसी और उर्दू में प्राप्त की। इसके बाद वह राजस्व विभाग में करदार नियुक्त हो गए।
उस समय कश्मीर पर अफगानिस्तान के शासक तैमूर शाह का शासन था। तैमूर ने कश्मीर का सूबेदार आमिर खान जानशेर को बना रखा था। तैमूर शाह, अहमद शाह अब्दाली का पुत्र था। आमिर कुछ समय तक तैमूर शाह का वफादार रहा, लेकिन बाद में बागी हो गया। उसने खुद को कश्मीर का बादशाह घोषित करते हुए काबुल को कर देने से मना कर दिया। इस पर तैमूर ने हाजी करीम को बगावत कुचलने कश्मीर भेजा था। हाजी करीम दाद खान 1776 में कश्मीर का सूबेदार बना और उसने पंडित दिला राम को कश्मीरी पंडितों के लिए अपना साहिबकार नियुक्त किया। 1787 में तैमूर शाह की मौत हो गई। 21 बेटों में एक जमान शाह ने खुद को बादशाह घोषित कर दिया।
जमान ने मीर हुजूर खान को 1792 में कश्मीर का सूबेदार बनाया। मीर हुजूर खान भी कुछ समय बाद बागी हो गया और उसने खुद को कश्मीर का बादशाह घोषित करते हुए कश्मीरी पंडितों पर जुल्म शुरू कर दिया। उसकी बगावत कुचलने के लिए जमान शाह ने अपने खास सिपहसालार अहमद खान को भेजा। अहमद खान ने मीर हुजूर खान को हराया और कश्मीर में नया सूबेदार नियुक्त करने के बाद काबुल लौटा, लेकिन अपने साथ वह पंडित नंद राम टिक्कू को ले गया। काबुल में पंडित नंद राम ने अपनी समझदारी और प्रशासनिक कार्यकुशलता से दरबार में अपनी जगह बना ली और कुछ दिन में दीवान बन गए। जमान के प्रधानमंत्री वफादार खान ने पंडित नंद राम की योग्यता को देखते उन्हेंं अपना साहिबकार नियुक्त किया। 1804 में जमान ने पंडित नंद राम के कामकाज, ईमानदारी और निष्ठा को देखकर उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया।
सन्दर्भ
श्रेणी:कश्मीरी पंडित