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411 REFERENCE · Wikipedia

थिएटेटस

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थिएटेटस (संवाद) प्लेटो के 'थिएटेटस' का एक प्राचीन ग्रीक पांडुलिपि संस्करण। प्लेटो प्राचीन यूनानी एथेंस (प्राचीन यूनान) ज्ञानमीमांसा, दर्शनशास्त्र सुकराती संवाद 399 ईसा पूर्व (सुकरात के मुकदमे से ठीक पहले) थिएटेटस (Theaetetus, Θεαίτητος) प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो (Plato) द्वारा रचित सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली 'सुकराती संवादों' में से एक है। यह संवाद प्लेटो के मध्य-उत्तरार्ध काल की रचना मानी जाती है। इसमें सुकरात, गणितज्ञ थियोडोरस और एक होनहार युवा गणितज्ञ थिएटेटस के बीच एक गहरी दार्शनिक चर्चा होती है। यह पूरा ग्रंथ दर्शनशास्त्र के सबसे मौलिक प्रश्नों में से एक पर केंद्रित है: "ज्ञान क्या है?"। इस ग्रंथ को पश्चिमी 'ज्ञानमीमांसा' का संस्थापक दस्तावेज़ माना जाता है।Theaetetus, in a collection of Plato's Dialoguesअगस्त 2026 InternetArchiveBot संवाद की शुरुआत में सुकरात अपनी दार्शनिक पद्धति की तुलना एक दाई के काम से करते हैं। सुकरात की माँ, फेनारेटे, एक दाई थीं। सुकरात कहते हैं कि वे स्वयं ज्ञान को जन्म नहीं देते (वे स्वयं को अज्ञानी मानते हैं), बल्कि वे एक 'बौद्धिक दाई' की तरह युवाओं के दिमाग में पल रहे विचारों को जन्म लेने में मदद करते हैं। उनकी इस पूछताछ और परीक्षण की पद्धति को दर्शनशास्त्र में माइएयूटिक्स कहा जाता है। सुकरात थिएटेटस को प्रोत्साहित करते हैं कि वह अपने भीतर छिपे ज्ञान को बाहर लाए, ताकि वे मिलकर यह परख सकें कि वह विचार "जीवित रहने योग्य" है या केवल एक भ्रम है।Burnyeat Myles The Theaetetus of Plato https://archive.org/details/theaetetusofplat0000burn Hackett Publishing 1990 978-0915144815 2-8The Middle Platonists, 80 B.C. to A.D. 220 ज्ञान की तीन परिभाषाएँ संवाद के दौरान, थिएटेटस 'ज्ञान' की तीन अलग-अलग परिभाषाएँ प्रस्तुत करता है, जिनका सुकरात एक-एक करके तार्किक रूप से परीक्षण और खंडन करते हैं: 1. ज्ञान 'प्रत्यक्ष' है थिएटेटस की पहली परिभाषा यह है कि ज्ञान वह है जो हम अपनी इंद्रियों से महसूस करते हैं। सुकरात इसे तुरंत प्रसिद्ध सोफिस्ट प्रोटागोरस के 'सापेक्षवाद' और हेराक्लिटस के 'निरंतर परिवर्तन' के सिद्धांत से जोड़ देते हैं। सुकरात तर्क देते हैं कि यदि ज्ञान केवल इंद्रियगत धारणा है, तो हर व्यक्ति का ज्ञान उसके लिए सत्य होगा (जैसे, अगर मुझे हवा ठंडी लगती है और आपको गर्म, तो दोनों सही हैं)। यदि सब कुछ सापेक्ष है और निरंतर बदल रहा है, तो कोई भी वस्तुनिष्ठ सत्य या ज्ञान संभव नहीं है। अतः यह परिभाषा विफल हो जाती है। 2. ज्ञान 'सत्य विश्वास' है इसके बाद थिएटेटस सुझाव देता है कि ज्ञान सत्य विश्वास है। सुकरात इसे भी खारिज कर देते हैं। वे कहते हैं कि कोई व्यक्ति तुक्के या संयोग से किसी सही बात पर विश्वास कर सकता है, या किसी चतुर वकील द्वारा उसे कोई बात मनवाई जा सकती है। भले ही उसका विश्वास संयोग से सच हो जाए, लेकिन चूँकि उसके पास उस विश्वास का कोई ठोस आधार नहीं था, इसलिए उसे सच्चा 'ज्ञान' नहीं कहा जा सकता।Chappell Timothy Reading Plato's Theaetetus https://archive.org/details/readingplatosthe0000chap Hackett Publishing 2004 978-0872207608 130-145 3. ज्ञान 'सकारण सत्य विश्वास' है अंत में, थिएटेटस सबसे प्रसिद्ध परिभाषा प्रस्तुत करता है, जिसे आधुनिक दर्शन में Justified True Belief (JTB) कहा जाता है: ज्ञान वह सत्य विश्वास है जिसके साथ एक उचित स्पष्टीकरण या कारण जुड़ा हो। सुकरात इस परिभाषा के 'लोगोस' शब्द का अर्थ खोजना शुरू करते हैं। क्या इसका अर्थ तत्वों का वर्णन करना है? या केवल विचार को व्यक्त करना है? सुकरात दिखाते हैं कि 'लोगोस' की कोई भी व्याख्या ज्ञान की संतोषजनक परिभाषा नहीं दे पाती, क्योंकि स्पष्टीकरण देने के लिए स्वयं उस चीज़ का पूर्व-ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे तर्क एक चक्र में फँस जाता है। संवाद किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता। यह अपोरिया (उलझन या गतिरोध) की स्थिति में समाप्त होता है। थिएटेटस की तीनों परिभाषाएँ गलत साबित होती हैं। हालाँकि, सुकरात बताते हैं कि यह चर्चा व्यर्थ नहीं गई; थिएटेटस अब इस बात को लेकर अधिक बुद्धिमान हो गया है कि वह "यह जानता है कि वह क्या नहीं जानता।" अज्ञानता का यह अहसास ही सच्चे ज्ञान की ओर पहला कदम है।McDowell John Plato: Theaetetus (Clarendon Plato Series) Oxford University Press 1973 978-0198720836 230-240 सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग पर थिएटेटस श्रेणी:ज्ञानमीमांसा श्रेणी:दार्शनिक साहित्य