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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

लोलिम्बराज

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जुलाई 2016 जुलाई 2016 लोलिम्बराज १६वीं शताब्दी के प्रतिष्ठित कवि एवं विद्वान् थे। आयुर्वेद, गांधर्ववेद, तथा काव्यकला में इन्हें विशेष नैपुण्य प्राप्त था। ये महाराष्ट्र के पुणे प्रांत में स्थित जुन्नर नगर के निवासी थे। लोलिम्बराज की पत्नि मुरासा जुन्नर के एक मुसलमान शासक की कन्या थी जिसका नाम विवाह के पश्चात रत्नकला रखा गया। इनके पिता का नाम दिवाकर जोशी था। लोलिम्बराज के अग्रज नि:संतान थे। उन्होंने इनका पुत्रवत् लालन पालन किया। फलत: यौवनागम तक ये निरक्षर ही रहे। आवारों की भाँति दिन भर इधर उधर घूमते रहते, केवल भोजनवेला में घर पर आते। एक बार जब बड़े भाई वृत्ति उपार्जन के लिए परदेश गए हुए थे, इन्होंने अपनी भाभी के हाथ से झपटकर भोजनपात्र छीन लिया। पतिवियोग से संतप्त भाभी ने लोलिम्ब की इस अविनयपूर्ण अशिष्टता से क्रुद्ध होकर इन्हें दुत्कारा, जिससे लोलिंब के हृदय पर गहरा धक्का लगा। तुरंत सभी विषयों से विमुख हो इन्होंने नाशिक के 'सप्तशृंग' नामक पर्वत पर विराजमान अष्टादश भुजाओंवाली भगवती महिषासुरमर्दिनी, की पूर्ण विश्वास के साथ सेवा की, और स्वल्प समय में ही जगदंबा की प्रसन्नता का वर प्राप्त कर लिया। फलत: एक घड़ी में सौ उत्तम श्लोकों की रचना की सामर्थ्य प्राप्त कर ली। इसका उल्लेख उन्होंने स्वयं इस प्रकार किया है : रत्नं वामदृशां दृशां सुखकरं श्रीसप्तशृङगास्पदं स्पष्टाष्टादशबाहु तद्भगवतो भर्गस्य भाग्यं भजे। यद्भक्तेन मया घटस्तनि घटीमध्ये समुत्पाद्यते पद्यानां शतमंगनाधरसुधा स्पर्धाविधानोद्धुरम्॥ (वैद्यजीवन) इनकी अनुपम काव्यप्रतिभा से पूर्ण दो वैद्यक ग्रंथ मिलते हैं, 'वैद्यजीवन' तथा 'वैद्यावतंस' और पाँच सर्गों का एक अतिशय मधुर काव्य 'हरिविलास', जिसमें श्रीकृष्णभगवान् की नंदगृह में स्थिति से कंसवध तक की लीला का वर्णन हुआ है। इस काव्य की रचना लोलिम्ब ने अपने आश्रयदाता श्री सूर्यपुत्र हरि (या हरिहर) नरेश के अनुरोध से की थी- नाना गुणैरवनिमंडल-मंडनस्य श्रीसूर्यसूनुहरि-भूमिभुजो नियोगात्। काव्यामृतं हरिविलास इति प्रसिद्धं लोलिंबराजकविना कविनायकेन॥ -- (हरिविलास २.३५) काव्यकला की दृष्टि से इस काव्य में कोई वैशिष्ट्य नहीं प्रतीत होता है। रीति वैदर्भी तथा कहीं-कहीं यमक एवं अनुप्रास की छटा अवश्य देखने को मिलती है। पूर्ववर्ती कवियों में कालिदास तथा भारवि का प्रभाव अत्यधिक प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ, रघुवंश के प्रसिद्ध श्लोक 'कुसुमजन्म ततो नवपल्लवास्तदनु षट्पदकोकिलकूजितम्' की छाया इन पंक्तियों में स्पष्ट दिखाई पड़ती है-'पुष्पाणि प्रथमं तत: प्रकटिता, स्वान्तोत्सवा:पल्लवा:। पश्चादुन्मदकोकिलालिललना कोलाहला: कोमला' आदि। कहीं कहीं कुछ अपाणिनीय प्रयोग भी मिलते हैं, जैसे- 'प्रिय इति पतिनोक्ता सा सुखाब्धौ ममज्ज (ह. वि. ४.२७) में पतिशब्द का, 'पतिना' तृतीयान्त प्रयोग। लोलिम्बराज ने मराठी भाषा में रत्नकला चरित और वैद्यजीवन का पद्यानुवाद ऐसे अन्य ग्रंथ भी लिखे है। बाहरी कड़ियाँ LOLIMBARAJA AND HIS CONTRIBUTION TO MEDICINE LOLIMBARAJA AND HIS CONTRIBUTION TO MEDICINE Vaidyajivanam: Contributions of Lolimbaraja to Ayurvedic Materia Medica– A Review (K. Nishteswar) श्रेणी:संस्कृत कवि