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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

धौम्य

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धौम्य नाम के कई व्यक्ति हुए हैं जिनमें एक धर्मशास्त्र के ग्रंथ के लेखक हैं। पर सबसे प्रसिद्ध हैं देवल के छोटे भाई जो पांडवों के कुलपुरोहित थे। ये अयोद ऋषि के पुत्र थे। इसलिये वे बहुधा आयोद धौम्य के नाम से जाने जाते हैं। आज से ५००० वर्ष पूर्व द्वापरयुग में हुए ऋषि धौम्य पांडवो के पुरोहित, कृष्ण प्रेमी और महान शिवभक्त थे। उन्होंने उत्कोचक तीर्थ में निवास करके सालों तक तपश्चर्या की थी। वे प्रजापति कुशाश्व और धिषणा के पुत्र थे और इस सम्बन्ध से प्रसिद्ध ऋषि देवल, वेदशिरा आदि के भाई थे। उनको देवगुरु बृहस्पति के समतुल्य सम्मान दिया जाता हैं। वे पांडवो के कुलगुरु तथा उपमन्यु, आरुणि, पांचाल और वैद के गुरु थे। धौम्य पांडवो के परम हितैशी ही नहीं, उनके समस्त कार्यों से जुडे़ हुये थे, ऐसा माना जाता है। अभी के बिहार समस्तीपुर में एक धमौन नाम का गांव है जहां की धौम्य ऋषि ने गंगा किनारे अपना आश्रम बनाया था । धौम्य और पांडव महाभारत में वर्णित विविध प्रसंगो के अनुसार धौम्य ऋषि पांडवो के जीवन के विविध प्रसंगो में जुडे़ हुये थे। वनवास के दौरान पांडवो ने धौम्य को अपने पुरोहित के रूप में स्वीकार किया था। पांडव दुर्योधन और शकुनि द्वारा बनवाये गये लाक्षागृह से बचकर आगे बढ़ रहे थे। उन्हीं दिनों एक ब्राह्मण से पांचालराज द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर के विषय में सुना। वे स्वयंवर में उपस्थित होने के विचार से जा रहे थे। गंगा पार करके आगे बढ़ते समय चित्ररथ नामक गंधर्व से अर्जुन का युद्ध हुआ। अर्जुन ने चित्ररथ को पराजित किया। बादमें वह पांडवो का परम मित्र बन गया। उसने पांडवो को समझाया कि पुरोहित के अभाव में ही पांडवो की दुर्दशा होती आ रही है। उसीने उत्कोचक तीर्थ पर रहते धौम्य को अपना पुरोहित बना लेने का सुझाव दिया तो पांडवोने सहर्ष धौम्य को अपना पुरोहित बना लिया।महाभारत , आदिपर्व १८२/२-६ मुनि ने अपने अंत:चक्षु से संपूर्ण महाभारत की घटनाएँ देखीं तो वे सहर्ष उनके पुरोहित रहने को तैयार हुए। पांडवों के वनवास के लिए धौम्य उनके आगे-आगे यम सामगान और रुद्र सामगान गाते हुए चले थे। उन्हीं को पुरोहित बना कर वे पांचाली के स्वयंवर को गये थे। यंत्र पाणिग्रहण हुआ। घर के द्वार पर ही उन्होंने माता को सूचना दी कि आज एक नयी चीज़ ले आये हैं तो कुंती ने पाँचों भाइयों में बाँट कर भोगने का आग्रह किया। तब धौम्य ने ही युधिष्ठिर से सहदेव तक पाँच पांडवों के साथ द्रौपदी का विवाह कर्मानुष्ठान कराया। यही नहीं, पांडव-पुत्रों का जात कर्म, उपनयन आदि संस्कार उन्हीं ने पूरा किया था। पांडव घूतक्रीड़ा में हार कर बारह वर्ष के वनवास के लिए गये तो धौम्य भी उनके साथ संतुष्ट करने तथा अक्षय पात्र प्राप्त करने का उपदेश दिया था।। युधिष्ठिर तीर्थों की यात्रा पर निकले तो धौम्य उनके साथ थे। धौम्य ने चारों दिशाओं के तीर्थों का सविस्तार उन्हें परिचय दिया। तभी लोमश मुनि ने अर्जुन के दूत बन कर उन्हें यह समाचार दिया था कि वे भगवान् शिव को प्रसन्न करके पाशुपतास्त्र जैसे दिव्याख प्राप्त कर चुके हैं और अविलंब वापस आने वाले हैं। उसके उपरांत लोमश ने उनके साथ तीर्थयात्रा पर जाने की अपनी इच्छा प्रकट की। वनवास-काल में पांडवों पर बकासुर के भाई किर्मीर ने धावा बोल दिया और वह मायाप्रयोगों द्वारा उन्हें पराजित करने का प्रयास कर रहा था। तब धौम्य ने उसके माया-प्रयोगों को विफल कर दिया। वनवास काल में सिंधुदेश का राजा तथा दुर्योधन का बहनोई जयद्रथ एक बार पांडवों की अनुपस्थिति में द्रौपदी के पास आया। द्रौपदी ने उसका स्वागत-सत्कार किया। द्रौपदी के रूपसौन्दर्य पर मुग्ध जयद्रथ ने उससे साथ चलने का आग्रह किया। द्रौपदी के तिरस्कार पर उसने द्रौपदी का अपहरण किया तो धौम्य ने जयद्रथ की भत्सना की तथा उसे जयद्रथ के चंगुल से मुक्त करने का प्रयास भी किया। पांडवों के अज्ञातवास के समय विराट देश में अज्ञातवास का विधि-विधान धौम्य ने ही समझाया। उनके अज्ञातवास के समय धौम्य ने असिष्टोम कर्म का अनुष्ठान किया। उनकी सार्वभौम उन्नति एवं राज्य-प्राप्ति हेतु वेद-मंत्रोच्चारण किया। पांडवों के अज्ञातवास पर निकलते समय मंत्रपूत अग्नि हाथ में लिये वे पांचाल देश को गये। कुरुक्षेत्र युद्ध में मृत पांडव-बंधुओं का दाह-कर्म धौम्य ने कराया। महाराज युधिष्ठिर के राजतिलक पर धौम्य ने उन्हें राजधर्म के उपदेश दिये। शर-शय्या पर पड़े भीष्म से मिलने युधिष्ठिर धौम्य के साथ गये थे। वे युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित थे तथा यज्ञ के लिए वातापि को उपयुक्त स्थान उन्हींने बताया था। धौम्य ही होता थे और उन्हीं ने युधिष्ठिर का राज्याभिषेक किया। भगवान् राम रावण-वध के पश्चात् अयोध्या लौटे तो उनसे मिलने कई ऋषि-मुनि आये। पश्चिम दिशा से आये मुनियों में धौम्य भी थे। द्वारकाधीश भगवान् कृष्ण कुरुक्षेत्र युद्ध के संदर्भ में कई दिन तक हस्तिनापुर में रहे। अब उन्हें द्वारका जाना था। उन्होंने पांडवों तथा संबंधियों से जाने की अनुमति माँगी तो पांडवों के साथ धौम्य भी श्रीकृष्ण-विरह-ताप से मूच्छित हुए थे। धौम्य का आश्रम आयोदधौम्य के आश्रम में ओपवेशिक गौतम का पुत्र आरुणि, वसिष्ठ कुलोत्पन्न व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु तथा वैद शिक्षा पाते थे। धौम्य बड़े परिश्रमी थे और शिष्यों से भी खूब काम लेते थे। पर उनके शिष्य गुरु के प्रति इतना आदर एवं श्रद्धा रखते थे कि वे कभी उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते थे। धौम्य ने प्रथम दिन ही आरुणि की परीक्षा ली। उस दिन खूब वर्षा हो रही थी। तभी धौम्य ने आरुणि से कहा कि वर्षा में खेत की मेंड बाँध आओ ताकि वर्षा का पानी खेत में ही रहे, बाहर न आए। आरुणि गुरु की आज्ञा पाकर बाँध देखने गया। उसने देखा कि मेंड टूट गयी है और पानी तेज़ी से बह रहा है। पानी रोकने के उसके सारे प्रयास व्यर्थ गये तो वह स्वयं पानी को रोकने के लिये लेट गये थे। धौम्य ऋषि का आश्रम आज के बिहार समस्तीपुर में था जो की आज धमौन नाम के गांव से जाना जाता है । सन्दर्भ इन्हें भी देखें बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:ऋषि मुनि श्रेणी:पौराणिक पात्र श्रेणी:हिन्दू धर्म