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हिमाचल प्रदेश की जलवायु
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जलवायु
हिमाचल में तीन ऋतुएं होती हैं। हिमाचल प्रदेश की समुद्रतल से ऊँचाई की विविधता के कारण जलवायु में भी भिन्नता है। कहीं सारा वर्ष बर्फ गिरती है, तो कहीं गर्मी होती हे। हिमाचल में गर्म पानी के चशमें भी हैं और हिमनद भी है। ऐसा समुद्रतल से ऊँचाई की भिन्नता की वजह से है।
ऋतुओं का वर्णन इस प्रकार से है…
ग्रीष्म ऋतु: इस ऋतु को स्थनीय भाषा में तौंदी भी कहते हैं। यह अप्रैल से जून तक होती है। कांगड़ा, ब्यास घाटी, शिवालिक पर्वत शृंखला, मंडी, बिलासपुर, ऊना आदि क्षेत्रों में गर्मी होती है। ऊपरी हिमाचल में गर्मी सुहावनी होती है। किन्नौर और लाहुल-स्पीति में जलवायू अर्द्धआर्कटिक है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ पिघलने से नदियों का पानी जल से भर जाता है। प्रदेश में सबसे उच्चतम तापमान जून महीने में 45 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता है।
शरद ऋतु: इस ऋतु को स्थानीय भाषा में हयूंद भी कहते हैं। यह अक्टूबर से मार्च तक होती है। प्रदेश के ऊपरी क्षेत्र जैसे धौलाधार, पीरपंजाल और जांस्कर पर्वत शृंखला में भारी हिमपात होता है। इस ऋतु में तापमान शून्य से 15 सेंटीग्रेड तक कम हो जाता है। इस समय संचार माध्यम शेष आदि से कट जाते है। प्रदेश के उच्च भागों में जीवन कष्टमय हो जाता है। समुद्रतल से 4,500 मीटर तक ऊंचे क्षेत्रों में सारा साल हिमपात होता ही रहता है।
वर्षा ऋतु: इस ऋतु में मौसम आर्द्र रहता है। प्रदेश में औसत वर्षा 160 सेंटीमीटर होती है। धर्मशाला में सबसे अधिक वर्षा 340 सेंटीमीटर होती है। मेघालय के बाद देश में दूसरा सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान धर्मशाला में है। गत वर्षा से कासिनराम में चेरापूंजी से भी अधिक वर्षा हुई है। भारी वर्षा से नालो व नदियों में भूअपरदन और भूमि कटाव हो जाता है। प्रदेश में सबसे कम वर्ष लाहुल-स्पीति में तीस से पचास सेंटीमीटर तक होती है। भारी वर्ष से नदियो में बाढ़ आ जाती है, जिससे हर क्षेत्र में नुकसान ही नुकसान होता है। ऊना जिले में तो स्वां नदी में बाढ़ आ जाने से भारी तबाही हो जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में हर जगह रास्ते बंद हो जाते हैं और यातायात व संचार माध्यम ठप्प हो जाते हैं।
श्रेणी:हिमाचल प्रदेश